सतीश चौबे की रचनाएँ

रोशन हाथों की दस्तकें

प्राची की सांझ
और पश्चिम की रात
इनकी वय:संधि का
जश्न है आज

मज़ारों पर चिराग बालने वाले हाथ
(जो शायद किसी रुह के ही हों)
ठहर जाएँ।

नदियों पर दिये बहाने वाले हाथ
(जो शायद किसी नववधू के ही हों)
ठहर जाएँ।

और खानों में लालटेनें ले जाने वाले हाथ
(जो शायद किसी मज़दूर के ही हों)
ठहर जाएँ।

सभी
रोशनी देने वाले हाथ मिलें
और कसकर बांध लें एक-दूसरे को आज
ताकि यहीं से मारना शुरू करें दस्तकें
विश्व के अंधेरे कपाटों पर

मिले-जुले
कसकर बंधे
रोशन हाथ।

कारट के फूल

कारट के फूल
वहाँ गिरते तो होंगे ना।

शाम की सलामी का बिगुल
मर गए किसी सोल्जर की याद दिलाता
बजता तो होगा वहाँ।

मेहंदी की डालें
कट तो चुकी होंगी जलाने के लिए

और
शाम से पहले ही
ढलाव उतरती सर्द हवा
आती तो होगी ना।

कारट के फूलों के महक भरे भाव
और शाम की सलामी के बिगुल का
कसक भरा दर्द
मेहंदी की हसीन कटी डालियों के लिए सम्वेदना
और शाम से पहले की सर्द हवा की सिहरन

मेरे कवि
क्यों जूझते हो
आसमाँ से, जमीं से, संसार से
जियोगे ना।

नई बदली के इश्तिहार

गर्मी में अचानक नम हो गए
मौसम के लचीले काग़ज़ पर
अगली नई बदली के इश्तहार निकलेंगे
कर्क की दिशा में बढ़ते सूरज के दिनों
वर्षा के आगामी सीजन की ख़ातिर
नई बदली के रिलीज होने की
अग्रिम बुकिंग होगी
सूचना उन्हें है ख़ास तौर से
जो सूखे खेत-खलिहानों में
मनहूस मायूस बैठे हों
या जिनकी आँखें प्यासी हों
एक अरसे की प्यास से
या वे जो ऊब-ऊब गए से हैं
रंगमंच के लगातार एक ही जैसे रूपक से
और नए परिवर्तन के लिए
अकुला से उठे हों, सही में
रंगीन-दिल लोगों से निवेदन है
कि नई बदली की बिजली की पायल
एक बार-
बस, केवल एक बार ही सुनें
और नई बदली की पहली फुहार पर
उदघाटन-समारोह का मज़ा लें
गड़गड़ाहट की ताल पर लोग
बदली की बूंदों की
उंगलियों का थिरकन देखें
मौसम की तब्दीली के स्वरों पर
आधी गर्मी आधी बरसात की
नई बदली के अर्ध नारी पुरुष
नाचेंगे रंगमंच पर
तब नए जवान दर्शकों की हुल्लड़
निश्चित ही मचेगी वहाँ पर
तालियाँ तो पिटेंगी ही
हर्ष की सीटियाँ तक बजेंगी
और बड़े-बूढ़े
वर्षा रानी का छुकड़पन समझ इसे
अवहेलना करेंगे ही
फिर स्थानीय मौसम की समताल पर
एक और ही बदली
उछलेगी, कूदेगी और आकाश पर
नौसिखिया नर्तकी-सी
कभी तो एकदम द्रुतलय पर नाचती
और कभी बेमौक़े
बेसुरी विलम्बित हो चुप रह जाएगी
तब यारों रंग होगा- समाँ होगा
सामयिक हवाओं की ताल पर
अपेक्षाकृत प्रौढ़ अनुभवी बदलियों का
जो एक दिन ठहरेंगी
और तूफ़ान मचा कर चल देंगी
बदली नर्तकी का ‘क्लाईमेक्स’
अनुभव करोगे लोगों,
मानसून के स्थाई ताल, लयबद्ध नर्तन पर
जब भरी-पूरी बदली आ खड़ी होगी रंगमंच पर
मदमाता बाँकुरा, मज़ा लोगे तब छक कर
मानसून के अंग-प्रत्यंग के संचालन का
बेपर्द परिवर्तन और सधे-सधाए प्रदर्शन का
सुनोगे तब ‘आर्टीफ़ीशियल रेन’ की बदली
की बात लोगो,
जो पाश्चात्य विज्ञान के आर्केस्ट्रा पर
बाल-डांस किया करती है
और डालरों के निजी आमंत्रण पर
घर के आंगन में नाचती-थिरकती है
नई बदली की अग्रिम बुकिंग है अगले दिनों
लोग आएँ और अपनी सीट रिजर्व करा डालें।

लाल खपरों पर का चांद

वहाँ लाल खपरों के ऊपर
चंदा चढ़ आया रे !

आज टेकड़ी के सीने पर दूध बिखर जाएगा
आज बड़ी बेडौल सड़क पर रूप निखर आएगा
आज बहुत ख़ामोश रात में अल्हड़ता सूझेगी
आज पहर की निर्जनता में मादकता बूझेगी
वहाँ किसी ऊदे आँचल पर मोती जड़ आया रे !

वहाँ लाल खपरों के ऊपर
चंदा चढ़ आया रे !

आज वहाँ नदिया के जल में चांद छन चुका होगा
नदियों पर बहते दियों का रूप मर चुका होगा
आज घाट पर बेड़ों का जमघट भी लहराएगा
आज सैर के दीवानों पर नशा रंग लाएगा
नदिया के रेशों पर जैसे रेशम कढ़ आया रे !

वहाँ लाल खपरों के ऊपर
चंदा चढ़ आया रे !

आज दूर तक फैले खेतों पर चांदी उग आई
आज गाँव की टालों तक जैसे एक डोर खिंच आई
आकाश पर आज बुन गया एक दूधिया जाला
मिट्टी पर ज्यों लुढ़क गया हो भरे दूध का प्याला
धरती के चेहरे पर जैसे शीशा मढ़ आया रे !

वहाँ लाल खपरों के ऊपर
चंदा चढ़ आया रे !

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