सरस्वती माथुर की रचनाएँ

नव स्वर देने को

आओ, इस नववर्ष पर
खोलें वातायन परिचय के
और निस्तरंग जीवन में
हवा के बिखरे पन्नों को समेट कर
खोजें पाँव लक्षित पथ के
और नव-स्वर देने को
कुछ इधर चलें कुछ उधर चलें
फिर मिल जाएँ
एकजुट हो शक्ति के उद्गम पर

गुलाबी अल्हड़ बचपन

मैंने बचपन के सामान को
अपनी स्मृति के कोटर में डाल दिया है
ताला लगा कर समय का
चाबी को सँभाल लिया है
बचपन के घर आँगन की
हवाओं में बिखरी किलकारियों
गुलाबी रिश्तों की बिखरी बातों
दीवारों पर टँगी
बुज़ुर्गों की
तस्वीरों को
सतरंगी बीते दिनों को
बिखरी यादों के मौसम को
बचपन की धुरी के चारों ओर
चक्कर काटते माँ बाबूजी
भाई भावज और उपहार से मिले
अल्हड मीठे दिनों को
अमूल्य पुस्तक-सा सहेज लिया है
और संचित कर जीवन कोश में
इंद्रधनुषी सतरंगी चूनर में
बाँध दिया है
अब यह पोटली मेरी धरोहर है
जिसे मैं किसी से बाँट नही सकती
कभी भी बचपन की चीज़ों को
कबाड़ की चीज़ों की तरह
छाँट नहीं सकती क्योंकि
यह पूँजी है
मैरे विश्वास की
कृति है श्रम की
जहाँ सें मैं
आरंभ कर सकती हूँ
यात्रा मन की
गुलाबी बचपन की

खेलत गावत फाग

फागुनी धूप में
होली के रंग
भीगे आँगन में
बज रहे हैं चंग
होली आ गई रे
बज रहे हैं चंग
गाँव ताल चौपाल
भू से नभ तक
उड़ रही गुलाल
होली आ गई रे
मकरंद-सी चारों ओर
फाग की पतंग से
बँधी अबीर की डोर
होली आ गई रे
खेलत गावत फाग
फागुन के बासंती राग
बज रहे हैं मस्ती के मृदंग
मस्ती छा गई रे
होली आ गई रे

मन के पलाश 

झर गए सपने आँगन के नीम से
जाग उठे मौसम सपेरों की बीन से

ओढ़ मधुर सुधियों को
अनुरागी छवियों को
खिल उठे जमुहाते
मन के पलाश
मौसमी ज़मीन से
झर गए सपने आँगन के नीम से
जाग उठे मौसम सपेरों की बीन से

उड़ाते हवाओं में एक भीगी शाम
ओढ़ कर चूनरी चाँदनी के नाम
आ गए गुलमोहरी मधुमास
खोलते अनुरक्त पाँखें
गुलमोहरी नीड़ से
झर गए सपने आँगन के नीम से
जाग उठे मौसम सपेरों की बीन से

महक फूलों की

बसंत के आते ही
मैं भर लाती हूँ
अपनी सहज अनुभूति के आँचल में
महक फूलों की
बसंत के आते ही
मैं मंडराती हूँ
उन पर तितली-सी
गुनगुन करती
मैं काव्य रूप के पुष्प भी
बिन लाती हूँ
राग, रंग, छंदों के
ललछौने बासंती मौसम की
देहरी के द्वार खोल
मैं जब तब
सृजन के क्षण भी
चुन लाती हूँ
सच पूछो तो
मेरे मन के गुलशन
अपने आप में
राग, रंग, छंदों के
फूलों से
महके वातास हैं
बासंती मौसम में
सुगंधित मधुमास हैं

माँ तुझे प्रणाम

मृदुल थपकियाँ देकर सुलाती
मधुर स्वर में लोरी गाती
हाथों के झूलों पर जो
दिन रात शिशु को झुलाती
वही नारी वही नारी हाँ
वही नारी तो माँ कहलाती
संस्कारों की खनि से निकाल
जो शिशु को रत्न बनाती हाँ
वही नारी वही नारी हाँ
वही नारी तो माँ कहलाती
धन्य है माँ के प्रयास
बच्चों को देती अहसास
मधुसरिता-सी खुद बह कर
बच्चों में प्रेम रस बरसाती
वही नारी वही नारी हाँ
वही नारी तो माँ कहलाती

आओ आज मातृ दिवस पर
हाथ जोड़ कर अंतरमन से
इस पुनीत अवसर पर
हम उस माँ को शत शत
प्रणाम करें!

मन की वीणा के तार छेड़
उसकी महिमा का
हम गुणगान करें।

बासंती मौसम में

बासंती मौसम में
फागुन की चिड़िया है
गंध गंध आखर भये
रंगों की पुड़िया है
रसवंती कामिनी
गंधन घेरी कंत
सतरंगी फूलों पर
उड़ रहे हैं मकरंद
डोल रहे बदरा से
छितराये गंधित रंग
गाँव, घर, ताल चौपाल
बज रहे मृदंग
गुलाल अबीर से
भीग गया देखो
फागुनी आँगन

बसंत!

बसंत!
तुम मेरे समक्ष रख दो फूलों की गंध
और सौंप दो इंद्रधनुषी आकाश को
एक नया वर्तमान
इस सतरंगी वर्तमान को
मैं कल्पना की सीमाओं में आबद्व कर
आकांक्षाओं के पुष्प चढाऊँगी
फिर
मथ कर सागर मन का
इस बदलती दुनिया में
रम जाऊँगी
क्योंकि अभी तो मैं निर्वासित हूँ
शंकित भी हूँ
अपने भीतर की चुप्पी से
इसलिए निरुद्देश्य अहर्निश
भटक रही हूँ
तलाशती
अपने बसंती सपनों के घरौंदे

नन्ही चिड़िया 

वह नन्ही चिड़िया थी
धूप का स्पर्श ढूँढती
फुदक रही थी
अपने अंग प्रत्यंग समेटे
सर्दी में ठिठुर रही थी
रात भर अँधेरे में
सिकोड़ती रही अपने पंख
पर रही
प्रफुल्लित, निडर और तेजस्वी
जैसे ह़ी सूरज ने फेंकी
स्नेह की आंच
पंख झटक कर
किरणों से कर अठखेलियाँ
उड़ गयी फुर्र से
चह्चहाते हुए
नई दिशा की तलाश में!

तुम मौसम बुला लो 

तुम मौसम बुला लो
में बादल ले आऊं
थोड़ी सी भीगी शाम में
फूलों से रंग चुराऊं
तुम देर तक गुँजाओ
सन्नाटे में नाम मेरा
मैं पहाड़ पर धुआं बन
साये सी लहराऊं
वक्त रुकता नहीं
किसी के लिये
यह सोच कर
मैं जीवन का काफिला बढ़ाऊं
तुम लहरों की तरह बनो बिगडो
मैं चिराग बन आंधी को आजमाऊं
तुम मौसम बुला लो
मैं बादल ले आऊं
तुम परात में भरो पानी
मैं चाँद ले आऊं!
तुम मौसम बुला लो
मैं बादल ले आऊं !

नव स्पर्श से!

मेरे सपनों के जंगल में
मैं लगातार देख रही थी
झुण्ड के झुण्ड झरे पत्ते
यूँ लग रहे थे
मानों हार गये हों युद्ध
अपनी चरमराती आवाज में
उड़ जाने को तैयार
पार्श्व में दिख रहा था
अभिलाषाओं से भरा जीवन
और तभी नींद टूट गयी
अपने नव स्पर्श से
छू रही थी मुझे भोर
और फिर एकाएक
मेरे सपने पृथ्वी हो गये
चक्कर काटने लगे
अभिलाषाओं के उदित होते
सूर्य के चारों ओर!

रिश्तों के पन्ने पलटते हुए 

हस्ताक्षर न बन पाए हम तो
अंगूठे बन कर रह गये
सत्य ने इतनी चुराई आँखे कि
झूठे बन कर रह गये
बेबसी के इस आलम को क्या कहें
बांध नहीं सके जब किसी को
तो खुद खूंटे बन कर रह गये
रिश्तों के पन्ने पलटते हुए
दर्द कि तलवारों के हम
बस मूढे बन कर रह गये
सत्य ने चुराई इतनी आँखें
कि बस झूठें बन कर रह गये
कांच की दीवारें खींच कर
रिश्तों के पन्ने पलटते रहे
अपनों ने मारे जब पत्थर
तो किरचों के साथ
टूटे फूटे बनकर रह गये
लहुलुहान भावनाओं से
ज्वारभाटे उठने लगे
हम शांत समुंदर
बन कर रह गये
सत्य ने चुराई इतनी आँखें
बस झूठे बन कर रह गये!

खिल उठते हैं फूल 

चिरैया वाह!
सुबह की
अंगड़ाई के साथ ह़ी
कुनमुनाती तुम भी
उठ जाती हो
चहकती हो
पेड़ों के इर्द गिर्द
फुदकती हो
तोड़ती हो रात के
पसरे सन्नाटे को
तुम्हारी तान से
खिल उठते हैं
फूल सो जाते है
रात के चौकीदार
झिलमिलाते तारे और
तुम्हारे गीतों की प्यास
सोख लेती है
हमारे दिलों का समुंदर!

अक्षरों का संगीत लेकर

आओ ठीक करें
रिश्तों कि तहें
तितली, गिलहरी गुलाब
धूप की बातें करें
पतीसे थोड़ी सी
हरीतिमा उधार लेकर
चह्कते पक्षियों से
अक्षरों का संगीत लेकर
खिड़की की तरह खोल दे
दिल के दरवाज़े
अपनी आभा
अपनी गंध मिला कर
सुखद सूर्य की कामना करें
धूप से लेकर रोशनी सपनो की
कर दे रूपाभ
रिश्तों की दीपशिखा से
और भर लें
अपना आकाश ख्वाइशों के
कलरव करते पक्षियों से !

सृज़न 

एक छोटी सी कोशिश
मेरे सपनो की डायरी में
मंदिर की
घंटियों सी बजती रही
पखारती चली गयी
अपने हिस्से के
स्मृति कण
जो कुछ पल
अठखेलियां करते
मेरे आसपास दर्ज हो
पल्लवित्-पुष्पित होते रहे
और मैं सृजन करती रही
उन पलों से झरते अहसासों का
जो कैदी पंछी के
व्याकुल मौन सा
मेरे भीतर छिपा था
उन पलों के अहसासों का
वह अनवरत सुर
मेरे अंतर्मन को
स्पर्श करता चला गया
और मैंने पहली बार देखा
अपनी छोटी कोशिश को
बड़ी कोशिश में बदलते हुए
और सृजन की कोख से
सपनो को झरते हुए
खुले आकाश में
उन्मुक्त हुये
पक्षी सा उड़ते हुवे देखा और
मैं खुश थी की
मेरे सपने कठपुतली नहीं थे

स्वागत सर्दी का !

गुनगुनी धूप में
धुआँ-धुआँ-सी
घूम रही है
मुखरित-सी पुरवाई
… नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन-सी
सर्दी आई

अलाव की लहरों पर
पिघलती कोहरे की परछाई
तितली-तितली मौसम पर
गीत सुनाती
शरद ऋतु की शहनाई
नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन-सी सर्दी आई

प्रकृति की नीरवता में
आसमान है जमा-जमा-सा
पुष्पित वृक्षों पर सोया है
सुबह का कोहरा घना-घना-सा
उनींदे सूर्य से गिरती ओस की
बूँदों से लिपटा
सुरमई-सा थमा-थमा-सा
जाग उठा मुक्त भाव से
मौसम ने कसमसा कर
अमराई में ली अंगडाई
नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन-सी सर्दी आई ।

बर्फ़ हवाएँ

1.

सर्द-सी धूप
पहाड़ों पे उतरी
धरा पे रुकी
फूलों को सहला के
पाखी-सी उड़ गई

2.

सर्द-सा सूर्य
धरती पे उतरा
सुर मिला के
चिड़िया संग डोला
सागर जा उतरा

3.

बर्फ़ हवाएँ
सर्द धरती पर
धूप रस पी
तितली बन घूमें
नर्म फूलों को चूमें

जीवन के मंच पर

शहर की रोशनियों पर
टपक रही थी रात
दूर तक पसरे से पेड़ों पर
हरी परछाईयां समेटती
स्मृतियों की रेलगाड़ी
गुजर रही थी
अतीत के पहाड़ों पर
फेंकती हुई ताम्बई रंग
कुछ उन्मुक्त सी मैं
आकाश में
पंछियों को देखती रही
जो परियों की तरह
उड़ रहे थे
सोचती रही मैं
अतीत अपना रहस्य
कभी नहीं खोलता
क्यों हम फ़िज़ूल ही
स्मृतियों को बुलाते हैं
एक आँगन ले आते हैं
भूले बिसरे लोग बिठा कर
उनके साथ ,बतियाते, हँसते हैं
गाहे- बगाहे यादों के झरोखे
खोलते बंद करते रहते हैं
जीवन के अनखुले मंच पर
चेहरे दर्ज कराते हैं
ठहरी हुई जिंदगी में
न जाने क्यो
अपनी तसल्ली के लिये
कठपुतलियां नचाते हैं !

नीला मौसम!

हवाओं के संगीत में
जब सर्दियों की शाम ने
अंगड़ाई ली तो
एक गहरे अचम्भे से
चिडिया उड़ गयी पेड़ से
जाने किसे ढूँढने
तभी एक तारा टिमटिमाया
और समुंद्री पक्षी सा
आकाश के पानी में
तैरने लगा
बहती नदी सी
रात धीरे से आई
जलती रही मोमबती सी
गिरती रही धरती के
झुरियों भरे हाथों पर
ओस की तरह
मेरे मन ने कहा कि
कुछ ऐसा हो कि
सुबह ताज़ी
मौसम और गीला हो
यह आसमान और नीला हो!

क्षणिका

आगाही

एक चट्टान

अब लौटते हैं चलो
सब कुछ खोकर
आत्म चैतन्य के प्रकाश में
क्योंकि हमें
ज्ञान है
दूर मन के बीचों बीच
उतरने के लिए
एक चट्टान है।

एक चट्टान

आगाही

आओ
हम तुम बाँटें
एक दूसरे को गुलाबी रोशनी में
जो एक हस्ताक्षर की तरह
छोड़ जाती है अपनी पहचान
और
जल कर दीये की लौ सी
कातर हथेलियों से अंगोरती रहती है
अंधेरे।

हाइकु

हाइकु

1
तारा टूटा तो
आसमां से दूर हो
अनाथ हुआ ।
2
अँधेरी रात
पीली चाँदनी बनी
रोशनदान ।

ऊँची पहाड़ी
बर्फ जड़ी -पिघली
नदिया बनी ।
4
धरा महकी
पुष्प अगरबत्ती
जब जलाई ।
5
छोड़ तरु को
पतझड़ी पात भी
संत से लगे ।
-0-

हाइकु 1-20

1
चिरैया उड़ी
तेज आँधी से लड़ी
बिखरे पंख l
2
नींद नदी -सी
लहरों-सा सपना
बहता रहा l
3
दूर है नाव
लहराता-सा पाल
हवा उदास l
4
भीगे हैं तट
पदचाप बनाती
बिखरी रेत l
5
नदी -सा मन
बहता लहरों-सा
सागर हुआ l
6
डूबती साँझ
जीवन -सी उतरी
विदा के रंग
7
धूप पंखुरी
खिली फागुन बन
बजे मृदंग
8
मौसम टेसू
मन हुआ फागुन
होली के संग
9
महकी हवा
रसपगी होली सी
बिखरे रंग
10
होली के रंग
उमंग नवरंग
भंग के संग
11
भीगते मन
फगुनाया मौसम
होली के रंग
12
भीगी सी होली
फागुनी बयार में
रसपगी सी
13
पीत पराग
आँगन में गुलाल
होली तो होली
14
रंग गुलाल
अक्षत चन्दन में
भीगे से तन
15
भीगा सा तन
अबीर गुलाल से
हरषे मन
16
फागुनी रंग
चंग मृदंग भंग
आगई होली
17
भंग के संग
फागुन का मौसम
होली के चंग
18
परिणीता- सी
सजी धजी चाँदनी
चाँद की प्यास ।
19
मन का फूल
बादलों के जूड़े में
दिया है टाँक
20
खिला चाँद
झील के आईने में
पीले गुलाब- सा ।
-0-

हाइकु 21-44

21
भूली सी यादें
दिल की किताब में
पीले पन्ने -सी
22
कच्चे ख्वाब- सा
आता -ज़ाता मौसम
धूप -छाँव- सा
23
भूरी पत्तियां
पतझर लायी है
पेड ठगा -सा
24
झरना बहा
पहाड़ी पगडंडी
फैला नदी सा
25
प्रवासी पक्षी
ठंडी झील में आये
मौसम बदला
26
हाथ हिलाता
चौखट पर सूर्य
जागी चिड़िया
27
पीले से पात
ऋतु के द्वार पे
रुका बसंत
28
झाँकते तारे
नभ के कँगूरे से
टॉर्च फेंकते
29
बंद मुट्ठी से
अनमने रिश्ते हैं
खुलते नहीं
30
मेहँदी लगी
साँझ- हथेली पर
रंग ले आई
31
तारों की रात
अमावस की बेला
भीगी रजनी
32
कोयला दिन
अँगीठी में सुलगा
राख़ हो गया ।
33
खुली मुंडेर
ऋतु से बतियाता
अमलतास
34
धूप -लहरें
माणिक बरसाता
गुलमोहर
35
श्वेत चूड़ियाँ
भरके कलाइयाँ
सजी शेफाली
36
सूरजमुखी
पौधे के झरोखे से
सूर्य निहारे
37
हवा में घुल
गुलाब के फूल भी
‘खुशबू बने
38
मोगरे दाने
चुनता हवा पाखी
चोंच मारके
39
उनींदा दिन
सफ़ेद गुलाब से
रंग ले भागा
40
हवा तितली
मोगरे का रस पी
गंध ले उडी
41
खोल सी गयी
सूरजमुखी धूप
सूर्य की आँखें
42
कच्चे घड़े से
पारिजात टूटे थे
पाखी से उड़े
43
चाँदनी आई
शेफाली को ओढ़ाई
श्वेत चूनर
44
सफ़ेद चोला
ओढ़ हरसिंगार
खिला महका
-0-

यादें-धूप

11
धूप -सी यादें
सूरज से उतरी
मन धरा पे
12
मन -तितली
यादों के फूलों पर
मँडराती -सी
13
मन लहरें
दरिया के पानी-सी
बहती यादें
14
यादें बहकीं
छलकते जाम -सी
मन छलका
15
मन आकाश
चमकती हैं यादें
चाँद तारों -सी
16
यादें अंकित
मन कैनवास पे
तस्वीरों जैसी
17
खामोश यादें
आँखों में आँसू बन
शाम -बरसीं
18
यादों के लम्हें
साथ-साथ चलते
दोस्त हो गए
19
स्वेटर बुना
यादों -भरी ऊन से
मन -सलाई
20
शहनाई -सी
मन की दुनिया में
गूँजती यादें

यादें-काँकर

1
मन मंदिर
यादें अगरबत्ती
जलती हुई
2
यादों के पाखी
देर तक विचरे
मन -आकाश
3
शीशा-ए- दिल
यादों के पत्थर से
टकरा -टूटे
4
यादें काँकर
गिरें मन -सागर
अक्स डोलते
5
मन -सागर
छ्प-छप तिरती
यादों की नाव
6
यादों की नाव
मझधार पहुँची
भंवर घिरी
7
यादें उड़ीं
अतीत नभ तक
घटा -सी तैरी

यादों के पात
मन में डोलते- से
पाखी -से उड़े
9
हवा यादों की
पतझरी पात-सी
सरसरायी
10
सहेजे यादें
मन की एल्बम को
खोल रही हूँ

यादें-पलकों-सजी

21
यादें गरजें
सावन की घटा- सी
मन- बरसे
22
भटकी यादें
आवारा बादल -सी
बिन बरसे
23
यादों का चाँद
खोये -खोये मन सा
गगन चढ़ा
25
आँसू के जैसी
यादें -पलकों सजीं
थिर हो गईं
26
हौले से आईं
पतझड़ -सी यादें
मन उदास
27
मन पाखी- सा
यादों के पिंजरे में
फड़फड़ाए
28
मन- डोर पे
पतंग -सी यादें
गगन उड़ीं
29
भीगा मौसम
बीज-सी दबी यादें
अँखुवा गईं
30
विकल प्राण
यादों की आहट है
उल्कापात -सी
31
भीगी यादें हैं
मधुर पल बीते
मन हैं रीते
32
यादें रेशमी
नीर बहते हुए
जल बिन्दु- से
33
यादों की डोरी
बिस्तरबंद- मन
बँधा ही रहा
34
यादों के पथ
मन की पगडण्डी
भटके हम
35
यादों- भरे हैं
मधु-घट मन के
फिर भी प्यासा
36
तारों भरी है
यादों की रजनी भी
मन भी दीप्त
37
गरजता है
यादों -भरा अंधड़
उड़ा मन भी

धूप

1
चंचल धूप
हवा घोड़े पे बैठ
उड़ती फिरे

2
जागा सूर्य तो
धोया था सुबह ने
धूप से मुंह

3
धूप गोरैया
फुदक आंगन में
चढ़ी मुंडेर


धूप किरणें
फेनिल लहरों में
स्नान करतीं

5
तपा आकाश
नभ से छिड़कता
धूप की बूँदें

6
धूप पतंग
साँझ के कंधे पर
अटक गयी

7
रात स्याही
भोर के कागज पे
धूप कलम

8
धूप की कूची
चित्रकारी करता
गर्मी का दिन

9
निठूर बड़े
गर्मी के दिन आये
धूप करारी

१०
धूप के मोती
तरु गले लटके
माला के जैसे

भोर किरण!

cccc1
भोर किरण
सूरज का सृजन
धूप जीवन

2
नभ सागर
तैरती चांदनी सी
भोर किरण

3
धूप उड़ान
सूर्य की पहचान
भोर किरण

4
सूर्य कमल
भंवरे सी है बंद
भोर किरण

5
भोर किरण
तितलियों सी आती
पंख पसारे

6
स्व्सृजित सी
ज्वलित मशाल ले
धूप बनाती

7
पाखी सी उड़े
नव अरुणोदय
भोर किरण

8
सूर्य डाल पे
कोयल सी कूकती
भोर किरण

9
श्वेत वस्त्रों में
सजधज के निकले
भोर किरण

10
सूर्य गोद में
नवजात शिशु सी
भोर किरण

ताँका

नारी की आभा (ताँका)

1
नारी की आभा
सृष्टि के सूर्य- सी है
उजास लाती
चिड़िया-सी उड़ती
पंख फैला नभ में ।
2
सुधि- सपने
नींद नदी में बहे
बिना रुके ह़ी
अविराम बहते
सागर जा ठहरे ।
3
सुबह सूर्य
धूप भरी नदी में
तैरता रहा
साँझ जब वो रुका
सागर लाल हुआ ।
4

ऋतु थी प्यासी
तितली- सी उड़ती
रस पीकर
कलियों से खेलती
रसपगी हो जाती ।
5
घुँघरू बजा
फागुनी हवाएँ भी
सुर मिलाके
चिड़िया संग डोली
हरी -भरी धरा पे ।

चोका

पेड़ निपाती (चोका)

पतझर में
उदास पुरवाई
पेड़ निपाती
उदास अकेला -सा ।
सूखे पत्ते भी
सरसराते उड़े
बिना परिन्दे
ठूँठ -सा पेड़ खड़ा
धूप छानता
किरणों से नहाता
भीगी शाम में
चाँदनी ओढ़कर
चाँद देखता
सन्नाटे से खेलता
विश्वास लिये-
हरियाली के संग
पत्ते फिर फूटेंगे ।

नन्ही चिड़िया (चोका) 

नन्ही चिड़िया
धूप -स्पर्श ढूँढती
फुदकती -सी
अंग -प्रत्यंग सँजो
पंख समेट
गहरी सर्द रात
काँपती रही;
प्रफुल्लित- सी हुई
सूर्य ने छुआ
जब स्नेह – आँच से,
पंख झटक
किरणों से खेलती
नयी दिशा में
उड़ गयी फुर्र से
चहचहाते हुए !

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