सर्वेश अस्थाना की रचनाएँ

प्रेम की है यज्ञ वेदी और तुम चन्दन 

प्रेम की है यज्ञ वेदी और तुम चन्दन
स्वांस उच्चारित करे जब मन्त्र
अग्नि का जाज्वल्य हो हर तंत्र
प्रबल सम्मोहन किये मधुगन्ध
हो चुके निर्मूल सारे जन्त्र।।
भावना है सारथी तन में है स्पंदन।
प्रेम की है यज्ञवेदी और तुम चन्दन।

हवनकुंडी अग्नि है अब प्रज्ज्वलित
भक्ति पर आसक्ति अब है द्विगुणित।
यूं हवन के देवता ने वर दिया है
यज्ञ का संयोग प्रतिपल नव गठित।।
नवगठन की शक्ति का नव सृष्टि से वन्दन
प्रेम की है यज्ञ वेदी और तुम चंदन।।

यज्ञ से पावन हुआ है मन भवन प्रांगण
चन्दनी आलेप हैं हर भित्ति हर आंगन
द्वार पर तोरण सजे आनंद मंगल के,
कामना के मेघ लाये पुलक का सावन।।
हैं परागित पुष्प करते गहन अभिनंदन
प्रेम की है यज्ञ वेदी और तुम चन्दन।।

जग को आंख खोलकर देखा

जग को आंख खोलकर देखा तो हम खुद ही बुद्ध हो गए।
खिले प्रेम के पुष्प झर गए,
अमर शक्ति के कल्प मर गए।
जो खुद को कहते थे राजा,
गए, मगर सब यहीं धर गए।
कुछ भी नही अनंत यहां पर जान समझ कर शुद्ध हो गए।
जग को आंख….।

अंदर दीप जला तो माना,
स्वयं प्रकाशित हैं यह जाना।
जबतक खुद ही समझ न जाएं
समझेंगे बस अब यह ठाना।
सिद्ध अर्थ जब सम्मुख आया पथ अबोध अवरुद्ध हो गए।
जग को आंख खोल…..।

हुआ विचारों का सत्यापन
स्वयं दिया जब खुद को ज्ञापन
अपना दीप बना जब मन तो
करने लगा जगत अभिवादन।
प्रथम स्वांस से अंतिम पल तक खुद को जीत प्रबुद्ध हो गए।
जग आंख खोल…..।

दर्पण ने जब मुझको पढ़कर 

दर्पण ने जब मुझको पढ़कर एक उपन्यास रच डाला।
आंखों में एक गहरा सागर होठों पर मुस्कान समेटे,
बीते किंतने ही जन्मों के पल पल का मधुपान लपेटे।
भौगोलिक इतिहासी तन का वर्णन बहुत खास रच डाला।।
दर्पण ने जब मुझको….

जीवन की त्रिज्याएँ भागीं आंख मूंद कर एक परिधि पर,
जैसे लहरों का नर्तन हो आकुल व्याकुल शांत उदधि पर।
सारी त्रिज्याओं ने मिलकर टूटा एक व्यास रच डाला।।
दर्पण ने जब मुझको….

व्यास और त्रिज्या से ऊबी परिधि मांगती एक सहारा,
कहती बंधन मुक्त करो अब होना है विस्तार हमारा।
किन्तु केंद्र ने साथ समय का लेकर एक दास रच डाला।
दर्पण ने जब….

जाने कितने संबोधन हैं

जाने कितने संबोधन हैं लेकिन कैसे तुम्हें पुकारूँ।
बदली उड़ती आसमान में और हवा के संग इतराती,
कभी निकट तो कभी दूर हो अपने यौवन में बलखाती।
मेरा मन करता है तुमको सावन वाली घटा पुकारूँ।
जाने कितने संबोधन…….

भोर हुए बिखरी सी मिलती स्वर्णिम रूपराशि दस दिशि में,
अलसायी सी और उनींदी राजकुँअरि जागी ज्यों निशि में।
सोनजुही सी कोमल लतिका मन करता मधुमती पुकारूँ
जाने कितने संबोधन…..

तुम रूठो मैं तुम्हे मनाऊँ, मान जाओ तो मैं मुस्काऊँ,
तुम मेरे हृद का स्पंदन और स्वांस भी तुम्हे बनाऊँ।
मैं प्यासा हूँ प्रेम नीर का, तुमको क्या मैं नदी पुकारूँ
जाने कितने संबोधन …..

गहन प्रतीक्षा के वन में

गहन प्रतीक्षा के वन में इक पतली पगडंडी आशा की।
आंखों का सूरज थक कर जब,
डूब गया हो पलक बन्द कर,
तुम्हें ढूँढ़ने गयी पवन भी,
हो हताश गति स्वयं मंद कर।
आज अंधेरा लेकर आया है टूटे कुछ पत्र शाख के,
कौन समझ पायेगा बातें गहन तिमिर तम की भाषा की।।
गहन प्रतीक्षा….

लेकिन कहीं दूर मुस्काती हैं
चन्द्रप्रभा सी मृदुल रश्मियां,
और कहीं उस छोर सजी सी
महक रही हैं मिलन बस्तियां।
धीरे धीरे कटे सघन वन, मन मृदंग की थाप खिल उठी,
वीणा की झंकार बने फिर दुल्हनियां रूठे ताशा की।।
गहन प्रतीक्षा…

अरे प्रतीक्षा सगी बहन है
प्रेम नाम के राजकुँवर की,
ज्यों पराग के साथ साथ ही,
नियति लिखी है भृंग-भ्रमर की।
उपवन की सारी खुशबू है
पुष्प पटल के मुखरित मन से,
तितली के पंखों में सिमटी पुष्पराज की प्रत्याशा की।।
गहन प्रतीक्षा….

आज शहर सूना सूना सा

आज शहर सूना सूना सा बादल भी बिन पानी का है ।
भीड़ बहुत गलियों सड़कों पर किंतु अकेलापन फैला है,
भले धुला सा आसमान है पर लगता धुंधला धुंधला है।
महल खड़ा है दीप जलाये लेकिन ये बिन रानी का है।
आज शहर सूना सूना है बादल भी बिन पानी का है।।
उपवन की मुस्कान थमी है फूल खिले लेकिन उदास हैं,
किस्म किस्म की प्यास उगी हैं जाने क्यों ये सभी खास हैं।
भौंरा कैसे गुनगुन गाये स्वर भूला, बिन बानी का है।
आज शहर सूना सूना है, बादल भी बिन पानी का है।।
चारों तरफ देखता रांझा उसकी हीर कहीं मिल जाये,
जिसकी चाह लिए आया है वो तक़दीर कहीं मिल जाये।
दूर चांद है बस चकोर ही हिस्सा आज कहानी का है।
आज शहर सूना सूना है, बादल भी बिन पानी का है।।

तुम ही प्रश्न नही करते हो 

तुम ही प्रश्न नही करते हो मैं तो उत्तर लिए खड़ा हूँ।
हिम्मत करके बाहर आओ
ख़ुद के अंदर से निकलो,
बाहर तो आकाश खिला है
घर के अंदर से निकलो।
काया कल्प तुम्हारा कर दूं
ऐसा जंतर लिए खड़ा हूँ
तुम ही प्रश्न नही करते हो
मैं तो उत्तर लिए खड़ा हूँ।

पर्वत से तुम नीचे आकर
बस थोड़ा सा लहराओ,
मंज़िल तुमको मिल जाएगी
नहीं तनिक भी घबराओ।
लहरों के आगोश में आओ
एक समंदर लिए खड़ा हूँ।।
तुम ही प्रश्न नही करते हो
मैं तो उत्तर लिए खड़ा हूँ।

आओ आओ मुझको वर लो
मैं तो सिर्फ तुम्हारा हूँ,
तुम देहरी से भवन बना लो
मैं तो निपट दुआरा हूँ।
क्यों अब देर कर रहे प्रियतम
मैं तो अवसर लिए खड़ा हूँ।
तुम ही प्रश्न नहीं करते हो
मैं तो उत्तर लिए खड़ा हूँ।।

ये धरती जन्मों की प्यासी
आओगे तो तृप्ति मिलेगी,
रेत हुए मन के आंगन को
एक अनोखी सृष्टि मिलेगी।
पानी बीज खाद बन जाओ
मैं मन बंजर लिए खड़ा हूँ।।

आखिर तुमने पूछ लिया है
धरती बादल का रिश्ता,
छुवन छुवन ने बता दिया है
मरहम घायल का रिश्ता।
तुमने जादू फैलाया तो
मैं भी मंतर लिए खड़ा हूँ।
तुम ही प्रश्न नही करते हो
मैं तो उत्तर लिए खड़ा हूँ।।

तुम क्या जानो

तुम क्या जानो
तुम्हें देखने की ख़ातिर
हम क्या क्या करते हैं ।।
आसमान के सभी सितारे पास बुला कर हम,
अपनी आंखों के बिस्तर पर उन्हें सुला कर हम,
फिर उन सबकी भोली सूरत के भोलेपन में
रोज़ तुम्हारी मुस्कानों का
तेवर भरते हैं।।
तुम क्या जानो…..

उपवन में उड़ती तितली को फूलों संग बिठाकर,
हर भौरे को कली कली के आंगन में महकाकर,
मलय पवन की वीणा के स्वर झंकृत करके तब,
हम अपने में कली भ्रमर बन बातें करते हैं।
तुम क्या जानो.….

बादल मस्त हवा के संग संग जब जब उड़ता है,
मेरा मन जहाज का पंछी बन कर मुड़ता है।
वापस आकर सपनो की मुंडेर पर टेरे वो,
अभिलाषा का प्रेम पत्र तब लिख लिख धरते हैं।
तुम क्या जानो….

दर्पण दर्पण तुम्हे उतारूं

दर्पण दर्पण तुम्हे उतारूं शब्द शब्द में गाऊं मैं,
मन की वीणा तुम्हें बनाकर खुद झंकृत हो जाऊं मैं।
बादल बादल बूँद समाये जीवन के नभ में इतराये,
सागर सागर बरस उठे मन, लहर लहर तट को भर लाये।
सीप सीप में तुमको ढूँढू सारे मोती लाऊँ मैं।
दर्पण दर्पण…

डाली डाली तन इतराये, बूटा बूटा अगन लगाये,
सोने जैसी किरण छुए तो पत्ता पत्ता लाज लजाये।
पुष्प पुष्प में तुम्हें बसा कर ख़ुद को ही महकाऊं मैं।।
धरती धरती यौवन बिखरा, गगन गगन आवारापन,
यादों की दरिया ले आये ,नयन नयन में खारापन।
मौसम मौसम घन गरजे तो वर्षा को समझाऊं मैं।।

तुम मिले हमको तो गुनगुना उठा समय 

तुम मिले हमको तो गुनगुना उठा समय।।
वर्षों पीछे छूट चुके कुछ अपनो सी तुम,
आंखों में चमके कुछ सपनो सी तुम।
एक एक कर खोलती खिड़कियां ज्यों
सिर्फ अपने ही लगते भवनों सी तुम।
एक पल को साथ आये महमहा उठा समय।।
तरुणाई झांक उठी नयन के झरोखों से
सांस सांस महक उठी मस्त पवन झोंकों से।
है सुगंध बचपन की रीति का सयाना पन,

आती है नेह बदली पलकों की नोकों से।
हृदय ने है तान छेड़ी चहचहा उठा समय।।
बंजर सी लगती थी भावना की भूमि सारी ,
कांटों से घिरी घिरी कामना की भूमि सारी।
नही कोई बीज मिला उगे जो अतीत बनकर,
उर्वर सी लगे आज साधना की भूमि सारी।।
तुम आईं भोर बन लहलहा उठा समय।
तुम मिले हमको तो गुनगुना उठा समय।।

तुम्हे पता है?

तुम्हे पता है?
कितने पर्वत पार किये हैं धैर्य संजोकर
कितने सागर पी डाले हैं इंतज़ार के,
कितने बादल हुए धूसरित आशाओं के
कितने मौसम पतझड़ बन बीते बाहर के।
कितने तट उदास आंखों में स्वप्न सजाए,
कितने लहर समुच्चय लौटे हैं पथराए।
कितने शंख सीपियाँ विह्वल हो छितराए,
कितने मोती नहीं सीप के बाहर आए।
कितने रेत कणों को जल ने सिक्त किया है?
कितने पनघट को मन घट ने रिक्त किया है?
कितने ही मधु के वन सज धज कर फैले?
कितने मधुकण ऐसे , मन को तिक्त किया है?
तुम्हे पता है किंतने सागर सूख गए हैं?
इन नैनो में तुम्हें तरंगित नही देख कर,
तुम्हे पता है कितने सावन बीत गए हैं?
मन झूले में तुम्हें उमंगित नही देख कर।
तुम इंद्रधनुष बन कर आओ पर्वत लहकेगा,
तुम लहरों में इतराओ सागर भी बहकेगा।
तुम वर्षा बन कर प्रेम भवन में आ जाओ,
हर मौसम मुस्कान लुटा कर महकेगा।।

इस ख़ुश्की के आलम में 

इस ख़ुश्की के आलम में मैं मधुमय गीत नही लिख सकता।
देह जल रही है सूरज सी
धूप अंगार उड़ेल रही है
लू बन करके तपिश हठीली
मलय पवन को ठेल रही है।
दूर भागते तन के मन को
मैं मनमीत नही लिख सकता।
भट्टी के भीतर तंदूरी
अरमानों की भस्म पड़ी है
और पसीने में ही लथपथ
जहाँ प्रेम की रस्म सड़ी है।
आकर्षण के धुर विलोम में कर्षित गीत नही लिख सकता।।

बादलों ने जात दिखलाई

बादलों ने जात दिखलाई!
राजनीतिक सोच वाली धुन्ध से निर्मित,
आसमानी ही उड़ानों को करे चित्रित।
किन्तु दावे खोखले हैं नहीं जल कण,
इन फरेबों से धरा है कसमसाई।।
बादलों ने जात दिखलाई!

सिर्फ आश्वासन सरीखे हैंउमड़ते,
और वादे खोखले करके घुमड़ते,
ये धरा जनता सरीखी मुँह को बाये
किन्तु घन ने खेप सागर पर लुटाई।
बादलों ने जात दिखलाई!

हो चुके हैं बंजरी अरमान सारे
आग के गोले हुए दिनमान सारे
फेर कर मुँह उड़ गए हैं राम जाने
मर गयी उम्मीद जो भी कुनमुनाई।।
बादलों ने जात दिखलाई।।
बादलों ने जात दिखलाई।।

रो रहा सिसकारियां भर देश का फ्यूचर

रो रहा सिसकारियां भर देश का फ्यूचर
एक कमरे में भरी हैं चार कक्षाएं
ऊँघती हैं ऊबती हैं सभी शिक्षाएं।
मिल रहा है अब प्रमोशन चंद रुपयों से
मूल्य का अंकन नही है मात्र भिक्षायें।
अब प्रधानों के है जूते चाटता टीचर,
रो रहा सिसकारियां…

जो है आगत भोर, उसकी लघु कलाई है
उस कलाई की व्यवस्था ज्यों कसाई है ।
दी थमा इक तश्तरी फैलाएगी दिन में,
मध्य भोजन ने हर इक पुस्तक हटाई है।
बन रहा बचपन फकत इक भूख का नौकर।
रो रहा सिसकारियां….

हर सुनहरे कल के कपड़े फाड़ डाले हैं
मार्ग में नन्हे कदम के सिर्फ जाले है
योजनाओं के समंदर सैकड़ों झूमें
हर लहर में मोतियों के दस घोटाले हैं।
टीचरों ने खुद लगाए स्वार्थ के ट्यूटर।
रो रहा सिसकारियां….

याद बहुत आये 

याद बहुत आये
आज मुझे तुम याद बहुत आये
जब सूरज चल पड़ा निशा के द्वार दिशा
मेरे मन में वियोग की फैली गहन व्यथा
मन की सारी सृष्टि बदलने लगी रूप
भले रही तन की स्थिति थी यथा यथा।
जले दीप की ज्योति शिखा में तुम आये

अम्बर पर तारों के बूटे झिलमिल चमके,
और ज्योत्स्ना के दामन चन्दा चहके।
झरते बेला के श्वेत पुष्प बिछते बिछते,
कर प्रणय प्रतीक्षा धरती का आँचल महके।
मादक सुरभि मुझे छू छू कर जाये।
आज मुझे तुम याद बहुत आये।।

तन में हिलोर उठती है साहिल पाने की,
है बड़ी परीक्षा लेकिन भंवर बचाने की।
स्वर्णिम भावों की छोटी सी नौका लेकर,
लहर लहर यात्रा है सागर पाने की।
लेकिन अभिलाषा के कपोत वापस पाये।
आज मुझे तुम याद बहुत आये।।

मित्र क्षेत्र में प्रेम क्षेत्र में युद्ध नहीं होता

मित्र क्षेत्र में प्रेम क्षेत्र में युद्ध नहीं होता।
युद्ध अगर है तो समझो मन शुद्ध नहीं होता।।
परिचय होता आसमान के बादल सा,
और प्रगाढ़ हुआ नयनों के काजल सा।
पागल मन बौराये किन्तु प्रबुद्ध नहीं होता
मित्र क्षेत्र में…

धीरे धीरे अभिलाषाओं के अंकुर फूटे,
प्रकृति शक्ति से अवरोधों के बंधन टूटे।
मन का पथ ऐसा जो अवरुद्ध नहीं होता।
मित्र क्षेत्र में युद्ध….

उम्र वर्ग भाषा रंग इसमें कहाँ ठहरते हैं,
मित्र, प्रेम के झंडे झण्डी स्वयं फहरते हैं।
जहाँ प्रेम पथ, पथिक वहाँ पर क्रुद्ध नहीं होता।
मित्र क्षेत्र में…..

आओ मित्र क्षेत्र को अपना राग बनाएं,
एक दूजे को सुनें और बस उसे सुनाएँ।
झँकार हीन मन सुनो कभी परिशुद्ध नहीं होता।।
प्रेम क्षेत्र में मित्र प्रेम में युद्ध नहीं होता।।

कामना अब तो स्वयं ही

कामना अब तो स्वयं ही
स्वयं के उपहास में है।
कर प्रतीक्षा अब प्रतीक्षा
गहनतम उच्छ्वास में है।।

गगन का भी रंग हरा है
प्रणय से हर घट भरा है,
चन्द्रमा के रश्मि-होठों
से हुयी पुलकित धरा है।
भ्रमर कलिका को निहारे
भावना मधुमास में है।।

झूमती पुष्पित लता है
बस पवन उसका पता है
हो कहाँ आधार प्रिय सा
कुछ नही उसको पता है।
है लिपटती बन प्रिया सी
किन्तु तरु संन्यास में है।।

मुस्कुराती सृष्टि भी है
खिलखिलाती दृष्टि भी है
हर तरफ वातावरण में
मदन मोहक वृष्टि भी है।
किन्तु रेतीले समय में
अंकुरण इतिहास में है।।

मित्र तुम्हारे जैसा मिलना

मित्र तुम्हारे जैसा मिलना।
यूं लगता रेतीले जग में
बह आया हो मीठा झरना।
नीरवता एकाकीपन की
भरी भीड़ में सूनेपन की
टूटे सपनो के जंगल में
पगडण्डी मन की ठनगन की।
तुम आये जीवंत हो गयी
युगों युगों की विवश कल्पना।।
टूटे छंद, व्याकरण रूठी
शब्द संहिता दरकी फूटी
संबंधों का बंजर आँगन
स्नेह वीथिका की छत टूटी
तुम आये तो सुदृढ़ हो गयी
मन कविता की भाव व्यंजना।।

हृदय पर तो है प्रथम अंकन 

हृदय पर तो है प्रथम अंकन तुम्हारे नाम का
अब किसी के भी लिए ये मन भला किस काम का।
जब कभी था ब्रम्ह ने ये जग बनाया
और मानव तन को जीवन से सजाया
और रच कर साथ तब हमको विधाता,
प्रेम के नव व्याकरण पर मुस्कुराया
दे दिया उसने बसेरा हमे बस एक धाम का
हृदय पर तो है प्रथम अंकन तुम्हारे नाम का।।

भोर सोने की तरह उसने सजाई,
दोपहर चांदी के जैसी मुस्कुराई।
सांझ ने न्योता दिया सिंदूर को,
रात सपनीली बहुत ही कसमसाई।
है हमारे प्रेम का साम्राज्य आठों याम का,
हृदय पर तो है प्रथम अंकन तुम्हारे नाम का।

रूप कुंदन सा तुम्हारा है सुनो,
और तन चन्दन तुम्हारा है सुनो।
तुम ही मोती और माणिक हो मेरे,
गहन अभिनंदन तुम्हारा है सुनो।।
प्रेम ही परिणाम है इस प्रेम के परिणाम का।
हृदय पर तो है प्रथम अंकन तुम्हारे नाम का।।

कई प्रेमिकाएं हैं मेरे जीवन में

कई प्रेमिकाएं हैं मेरे जीवन में
महक बिखेरा करतीं हैं मन उपवन में।
अभिलाषा है प्रथम प्रेमिका दिल में रहती
आकांक्षा तो नही उपेक्षा है सह सकती।
इन दोनों सुंदरियों ने वश में कर रक्खा
और तीसरी इच्छा मुझ बिन क्या रह सकती।।
इनकी खातिर ही साँसे हैं मेरे तन में

महक बिखेरा करती हैं मन उपवन में।
दिन चढ़ता तो इठलाती सी आये कामना,
दुनिया से मिलवाए छिपाये चपल भावना।
इन दोनों ने धड़कन पर काबू कर रक्खा,
मैं पागल प्रेमी, मुझको तड़पाये याचना।
इनकी खातिर सांस चल रही है तन में,
महक बिखेरा करती है मन उपवन में।।

चढ़े दोपहर हिम्मत पास बुलाती है,
ताक़त मुझपर अपनी जान लुटाती है।
सबकुछ कर डालूँ इन प्रेयसि की खातिर
दृढ़ता मुझको छूकर भाव जगाती है।
शक्ति बुला लेती मुझको आलिंगन में,
महक बिखेरा करती है मन उपवन में।

शाम सुहानी ले आती है निशा निमंत्रण,
और नींद की प्रबल तरंगों का आमंत्रण।
सभी प्रेमिकाएं आ जातीं बिस्तर पर,
पाकर साथ पुलक उठता है तन का त्रण।
और कल्पना बलखाती हर आँगन में,
महक बिखेरा करती है मन उपवन में।।

अब सभी कुछ छूट बैठा हैं 

अब सभी कुछ छूट बैठा हैं तुम्हारे बिन सखे
तुम हमे आवाज़ देदो गिन रहे हैं दिन सखे।।
क्या भला अपराध ऐसा है कि प्रतिपल मृत्यु पाऊं,
हो भले त्योहार लेकिन शोक के ही गीत गाऊं।
सूर्य आता है मगर जीवन तिमिर के दास जैसा,
भोर हो या दिवस, लगता सिर्फ यम के ग्रास जैसा।
कट नही पाता है सुन लो एक भी अब छिन सखे
तुम हमे आवाज़ देदो गिन रहे हैं दिन सखे।
स्वांस की गति है मगर लगता कि जैसे मन्द है
धड़कनों के हर निलय का द्वार जैसे बन्द है।
जिस तरफ भी नयन उठते सिर्फ तेरा चित्र है
स्मरण हर पल तुम्हारा मात्र मेरा मित्र है।
उग रही है हृदय में सौ नोक वाली पिन सखे।
तुम हमे आवाज़ देदो गिन रहे हैं दिन सखे।।
बिन तुम्हारे जी नही पायेगा पपीहा जान लो,
स्वाति हो, तुम प्रेम हो इस प्यास को पहचान लो।
नियति ने क्या रच दिया है ये न पढ़ पाया सुनो,
लग रहा प्राचीर भावों की न चढ़ पाया सुनो।
मर रहा संगीत मन का सुप्त सब तकधिन सखे।
तुम हमे आवाज़ देदो गिन रहे हैं दिन सखे।।

द्वार पर याचक खड़ा है दान दे 

द्वार पर याचक खड़ा है दान दे दो
फिर वही अपनी मुझे मुस्कान दे दो।
तुम हमारे प्रेम की आराधना हो
हृदय के हर व्याकरण की व्यंजना हो।
जो हमेशा मूर्त बन कर मुस्कुराई,
मेरे अंतस्थल की शाश्वत भावना हो।
जो सदा जीवित रहे अरमान दे दो,
फिर वही अपनी मुझे मुस्कान दे दो।

मेघ क्या जल के बिना रह पायेगा,
पुष्प क्या बिन गन्ध के रह पायेगा।
साथ में यदि स्वर्ण किरणे ना मिले
सूर्य क्या नभ में कभी में रह पाएगा।
रिक्त नभ को प्रेम का दिनमान देदो।
फिर वही अपनी मुझे मुस्कान दे दो।।

इस जगत की दीप्ति सारी मर रही है,
कांति मन की पतझरो सी झर रही है।
कुछ नही रुचता मुझे सौगंध जग की,
सृष्टि मुझ पर मृत्यु वर्षा कर रही है।
एक अंतिम बार जीवन दान दे दो।
फिर वही अपनी मुझे मुस्कान दे दो।।

पंखुड़ियां गुलाब की हिलीं / सर्वेश अस्थाना

 पंखुड़ियां गुलाब की हिलीं
मुस्कानें दस दिशा खिलीं।
दो कटोरे झील को भरे
खुशियों की लहर संग धरे
चन्द्रमा जब इनमें आ नहाये
रेत के वन दिख रहे हरे।
रश्मियां जब जल से आ मिलीं
मुस्कानें दस दिशा खिलीं
जोहती हैं बाट देहरियाँ
फुदक रही शाख गिलहरियां
एक हवा पात छू चली
कौंध उठी लाख बिजलियाँ।
कामनाएं खुद ही आ पिलीं
मुस्कानें दस दिशा खिली।।

बहुत अच्छी लग रही ये मुस्कुराती धूप

बहुत अच्छी लग रही ये मुस्कुराती धूप
प्रेम के अनुवाद रचती छांव वाली धूप
एक कोपल फूट कर बोली
लिए स्वागत में खड़े रोली
फिर उठाएंगे दिशाओं के कहार
हृदय के अनुबंध की डोली।
धड़कनों में फिर खिली है चमचमाती धूप
प्रेम के अनुवाद रचती छावं वाली धूप।
रूठ कर बैठी मिली जब
स्वाति वाली रात
और पपिहा कलपता सा
नापता जज़्बात।
मुस्कुरा कर कार का शीशा गिरा
बोली
आओ आओ खत्म सारी बात।
बढ़ गयी सब तोड़ सिग्नल गुनगुनाती धूप
प्रेम के अनुवाद रचती छांव वाली धूप।
मन ही मन दो घन बहुत बरसे
एलोवीरा बन गए सब कैक्टस हरसे
उड़ चले फिर ढाई आखर साथ
समर वेकेशन रही, कुछ माह के तरसे।
धूप की बाहों में सिमटी कुनमुनाती धूप।
प्रेम के अनुवाद रचती छांव वाली धूप।।

उड़ गए सब आंख के पंछी

उड़ गए सब आंख के पंछी
जो कहीं से स्वप्न लाते थे।
कैंसरी आकाश में बारूद सा कुछ
जो हमे बस दृश्य देता अर्थियों के
सीरिंज में जो ज़िंदगी की बूंद से
खनखनी स्वर नज़र आते बर्छियों के
कहाँ रक्खे रेडियो है जो
जन्मान्तरी सम्बन्ध के ही गीत गाते थे।
आंसुओं के ही बने हैं सात सागर हम
फिर ग्लेशियर उनको बना कर हम
मुस्कुराते खिलखिलाते नए जीवन
को दायित्व की गिनती सिखा कर हम।
बन्द कमरे में ज़रा सा ही
सिसकियां गा लौट आते हम।
राक्षसी इन एवरेस्टों की ऊंचाई क्या
क्या पता इस दर्द सागर की हुई गहराई क्या
दूर मंज़िल पर दिया बस टिमटिमाये
रास्ता तो है मगर मालूम नहीं लम्बाई क्या।
है थकन पर पाँव की हर
सूजनो के घावों को
छिपाके पग बढ़ाते हम ।।

गुमसुम है सारा संसार

गुमसुम है सारा संसार ।

मत गाओ अब कोई मल्हार।।
जीवन के गीत रहे शब्दरहित होकर
कुछ भी तो मिला नही सारा कुछ खोकर
मन के विश्वास चढ़ी काई भरी रपटन
सुलझन का दम्भ लिए उलझन को ढोकर
राशन पर मिलती बहार
गुमसुम है सारा संसार।
आंखों की डाल लगे सपनो के बच्चे
लेकिन पके नहीं टूट गए कच्चे।
आंधी सैलाब धरें पाताली लहरें
झूठ के किनारे पे डूब गए सच्चे।
मांझी का कैसा किरदार
गुमसुम है सारा संसार।
लाखों हैं साथी पर बिना हाथ वाले
कैसा है गठबंधन कौन साथ वाले
पाने को अनर्गल लगातार रगड़े
मछली सा मस्तक लिए माथ वाले।
सबका है अपना व्यापार
गुमसुम है सारा संसार।।

प्रेम की खेती नही हो

प्रेम की खेती नही होती
नियति इसको है स्वतः बोती
हल स्वयं चलता हृदय में भावनाओं का
बीज बो जाता स्वयं है कामनाओं का
नयन दर्शन की विकलता भोगते है
और अंतस व्रत निभाता अर्चनाओं का।
आरज़ू हंसती कभी रोती
प्रेम की खेती नही होती।
तभी बादल बरस उठते हैं समर्पण के
और यह मन यज्ञ करता सिर्फ अर्पण के
जगत का सौंदर्य खुद में आ समाता
सामने हम घर बसाते रोज़ दर्पण के।
आंख बढ़ कर गाल को धोती
प्रेम की खेती नही होती।
पथ बने है प्रेम वाले बिन थकावट के
मार्ग सुंदर लग रहे है बिन सजावट के
मीठा खट्टा स्वाद ही हर ओर बिखरा
प्रेम के व्यंजन बने सब हैं अमावट के।।
यहां अभिलाषा नही सोती।
प्रेम की खेती नही होती ।।

गाँव ही तो हूँ सुनो

गाँव ही तो हूँ सुनो मैं गाँव ही तो हूँ।
भोर के आने से पहले उठ खड़ा हूँ मैं
भूख हो या प्यास हो सब से लड़ा हूँ मैं
खेत की गोदों में पलता बैल हल हूँ मैं
आज की आंखों में हंसता एक कल हूँ मैं।
मुश्किलों में मुस्कुराता ठाँव ही तो हूँ।
गाँव ही तो हूँ सुनो मैँ गाँव ही तो हूँ।।

चीथड़ों में भी खुशी से नाचती बिटिया
राज सिंहासन सरीखी बुआ की खटिया।
व्यंजनों को मात करते हैं नमक रोटी
आंगनों को लीपती हैं मिल बड़ी छोटी।
धूप में खिलती हुई एक छांव ही तो हूँ
गाँव ही तो हूँ सुनो मैं गाँव ही तो हूँ।।

जल रहे चूल्हे पड़ोसी से मिली कुछ आग से
दूर के देवर रिझाते भौजियों को फाग से
एक भाभी के लिए टोले की सारी ननदियाँ
पर समझ पातीं नही क्यों आईं इतनी इमलियाँ
हो रहा भारी बहू का पाँव ही तो हूँ
गाँव ही तो हूँ सुनो मैं गाँव ही तो हूँ।।

आंधियों में उड़ रहा वो एक छप्पर हूँ,
महल के सपने सजाता टीन टप्पर हूँ।
बाढ़ में हर साल बहना भी नियति है,
आपदा हर हाल सहना भी नियति है।
एक अंधे काग की बस काँव ही तो हूँ

हमने मन के द्वारे द्वारे वंदनवार सजा रक्खे हैं

हमने मन के द्वारे द्वारे वंदनवार सजा रक्खे हैं, तुम आ जाओ द्वार पूज कर तुमको भीतर ले आएंगे।
समय पुरोहित साइत देखता ग्रह नक्षत्र सब रूठे रूठे,
सप्तम में शनि आ बैठा है गुरु सूर्य सब टूटे टूटे।
राहु केतु नाराज़ खड़े हैं बुद्ध चंद्रमा भाग रहे हैं,
मात्र शुक्र के साथ है मंगल अद्भुत हैं संयोग अनूठे।।
किन्तु तुम्हे आना ही होगा गौरी कलश बिठा रक्खे हैं,उनका ले आशीष अमंगल सारे मंगल कर लाएंगे।
हमने मन के द्वारे द्वारे वंदनवार सजा रक्खे हैं तुम आ जाओ द्वार पूज कर तुमको भीतर ले आएंगे।।

आओ मन की सात भावरें भीतर ही भीतर ले डालें,
प्रेम देवता के आंगन में साक्ष्य हेतु ऋतुराज बुला लें।
मन से मन की गांठ बंधेगी होगा परम नेह का बंधन,
विश्वासों की दिव्य वेदिका के हम फेरे साथ लगा लें।
पावन योग हृदय का होगा सारे देव बुला रक्खे हैं उनके आशीषों की वर्षा से मन प्राण भीग जाएंगे।
हमने मन के द्वारे द्वारे वंदनवार सजा रक्खे हैं,तुम आ जाओ द्वार पूज कर तुमको भीतर ले आएंगे।।

फेरे लेकर मंडप से हम साथ साथ बाहर भी आयें,
साथ स्वांस की सरगम में हम सारे राग साथ में गायें।
चाहे दुख हो या कोई सुख दोनो मिलकर उसे जियेंगे,
अगर बुलावा भी आया तो दोनो साथ साथ ही जायें।
जाना है उस पार केवटों ने मझधार उठा रक्खे हैं,गंगा जमुना सा संगम बन सारे लोक जीत जाएंगे।
मन के द्वारे द्वारे हमने वंदनवार सजा रक्खे हैं,तुम आ जाओ द्वार पूजकर तुमको भीतर ले आएंगे।।

जब तक द्वार नही खुलता है

जब तक द्वार नही खुलता है दस्तक देता सदा रहूंगा
दूर खड़े होकर देखूंगा सांकल पवन हिलाएगा जब,
दृश्य नयन में भर भर लूंगा सूरज तुम्हे जगायेगा जब।
और शाम को बन कर साक्षी द्वार तुम्हारे आऊंगा तब
देखूंगा मयंक बिंदिया बन चेहरे पर मुस्कायेगा जब।
जब तक सूर्य नही उग जाता भोर सजाता सदा रहूंगा।
जब तक द्वार नही खुल जाता दस्तक देता सदा रहूंगा।

कोयल द्वार तुम्हारे आकर मधुर कंठ से गीत गायेगी,
सच कहता हूँ उसके स्वर में मेरी ही पुकार आयेगी।
जब कोई भौंरा कलियों के अवगुंठन पर मंडराएगा,
दृष्टि तुम्हारी हृदय पटल पर मेरी धड़कन ही पायेगी।।
गंध तुहारी उपवन उपवन मैं ढूंढा सर्वदा करूँगा।
जब तक द्वार नही खुलता है दस्तक देता सदा रहूंगा।

मेरा व्रत संकल्प यही है प्रेम द्वार पर बैठे रहना,
पता नही है द्वार तुम्हारे ऐसे या फिर वैसे रहना।
अगर प्रेम में प्रत्यर्पण की कोई शर्त नही होती तो
वचन हमारा, इसी यज्ञ में जीते रहना मरते रहना।।
अगर प्रेम मेरी बलि मांगे नही कभी मैं मना करूँगा।
जब तक द्वार नही खुलता है दस्तक देता सदा रहूंगा।

सौंप दूंगा मणिकर्णिका को देह अपनी

सौंप दूंगा मणिकर्णिका को देह अपनी
शर्त है बस तुम सदा जगमग रहोगी।
मैं नयन की ज्योति सारी सौंप दूंगा
दृष्टि भर की दृष्टि सारी सौंप दूंगा
सौंप दूंगा सूर्य मुझमें दीप्त जितने
चंद्रिका संग चंद्र सारे सौंप दूंगा।।
सौंप दूंगा दीप सारे सौंप दूंगा सभी तारे
शर्त है बस तुम सदा दप दप रहोगी।
सौंप दूंगा मणिकर्णिका को देह अपनी
शर्त है……।

सौंप दूंगा शब्द सारे भाव भी भावार्थ भी
सत्य सारे सौंप दूंगा साथ मे सत्यार्थ भी।
सौंप दूंगा गूढ़ता का महासागर
और पांचों तत्व का निहितार्थ भी।।
सौंप दूंगा स्वांस अपनी सौंप दूंगा वायु जग की,
शर्त ये है प्रज्ज्वलित पल पल रहोगी।
सौंप दूंगा मणिकर्णिका को….।

सौंप दूंगा ऊष्णता जो बसी तन में,
और जितना भाग मुझमें इस गगन का।
नीर जो मुझमें समाया सौंप दूंगा,
सौंप दूंगा ज्वाल मेरी उस अगन में।
सौंप दूंगा धरा का जो रूप मुझमें
शर्त ये है तुम सदा नभ नभ रहोगी।
सौंप दूंगा मैं तुम्हे मणिकर्णिका देह अपनी
शर्त है ……

जीवन हुआ सिनेमाघर

जीवन हुआ सिनेमाघर में परदे का चल चित्र
सर्व प्रथम एक प्रमाणपत्र आ जाता है सम्मुख
मैं क्या हूँ कैसा हूँ वो समझा जाता है आमुख।
फिर आते हैं मुझे प्रभावित करने वाले नाम,
इनमे से कुछ नाम मात्र के होते कई प्रमुख।
मेरा जीवन क्या मेरा है, मुद्दा बड़ा विचित्र।

कभी स्नेह का भाव दृश्य तो कभी ईर्ष्या भभकी,
कभी प्रेम का शांति फुहारा कभी दुश्मनी धधकी।
अपनी इच्छा अपनी मर्ज़ी
निर्देशक के हाथ,
दृष्टि, सांस, धड़कन इन सब की मालिक दुनिया कब की।
मुस्कानी समझौते में है अनुबंधित सा इत्र।।

भाई कहीं तो बहन कहीं पर सबका अपना चाव,
अपनापन दर्शाने वाले बाँट रहे हैं घाव।
सब झूठे हैं खुद सच्चे हैं गढ़ते रहे सबूत,
संबंधों की फ़िल्मी दुनिया सबके अपने भाव।
ऐसे में चरित्र अभिनेता सा आ जाता मित्र।
जीवन हुआ सिनेमाघर में परदे का चलचित्र।।

ऐ हवाओं 

ऐ हवाओं!
ले चलो उस लोक में,
हो जहां सुरभित धरा मुकुलित चमन।
हो जहां बस प्रेम की पगडांडियां,
हाथ में हाथों को थामें पीढ़ियां।
हो जहां हमवार पथ सबके लिए,
और सबके ही लिए सब सीढियां।
ऐ दुआओं!
ले चलो उस लोक में
हो जहां आशीष की वर्षा भरी सुरभित पवन।।

हो जहाँ पर देव का स्थान ऐसा,
अर्चना अवसर मिले बस एक जैसा।
पुष्प सबरंगी चढ़े हों देव शीशों,
पूजनो में प्रथम हो आसित न पैसा।
ऐ सदाओं!
ले चलो उस लोक में
होठ सबके साथ मिल करके करें वर्णित भजन।

हो उड़ाने एक सी हर पंख की,
और मुस्काने दिखें हर अंक की।
पर्वतों पर चढ़ें, उतरें घाटियां,
टोलियां हों साथ राजा रंक की।
ऐ घटाओं!
ले चलो उस लोक में,
जहाँ पर हो धूल कण के भाग्य में अंकित गगन।।

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