साधना सिन्हा की रचनाएँ

ज़रूरत

यह प्यार नहीं है
ज़रूरतें हैं
तुम्हारी मेरी
बच्चों की
जो, बांधे रखती हैं
तुमको–मुझको
बच्चों को

एक बंधन जो
कहलाता है अटूट
जाता है बन
अभ्यास अटूट
हम सबका

व्योम-विशाल
सिमटकर
बन कैदी
घर की
चार दीवारों का
हो जाता है
अपरिहार्य-अनिवार्य
जरूरत
रात-दिन की

कुहासा

यह
क्यों होता है
अहं का कुहासा
घेर लेता है हरदम

वही छत
वही दीवारें
और हम
एक दूसरे के लिए
अनजबी हो जाते हैं

उड़ती निगाहों से देखते हैं
और अपने-अपने
काम में व्यस्त
हो जाते हैं
चलता है कुछ दिन
यह क्रम

हम अकेले हैं
कितने अकेले हैं
मेरा, और शायद
तुम्हारा भी
एकाकीपन
औपचारिकता के आवरणों
को दूर फेंक देता है

और हम
अपने एकाकीपन के साथ
एक ही शय्या पर
आह्लाद, अवसाद से
अनछुये
पड़े रह्ते हैं
नई सुबह होने तक ।

उमस

छत है खुली
पर अन्दर
उमस है

अनाम संवेदनायें
मुखर होने से पहले
पिघल रही हैं
उमस में !

बाहर
निकलने के
दरवाज़े बनाओ अनेक
आदमकद घुटन
दरवाज़ों से बड़ी है

तोड़ो दीवारें
ठंडी हवा, बारिश
खुला आसमान
उमस को
कम करे

हम सब बाहर निकलें
उमस से बचा
एक-आध घर तो कहीं होगा ।

सावन

सावन बन थामो मुझको
मैं
बरसूँ चारो ओर
मेघ बनो
लो आगोश,
रोऊँ मैं
घनघोर

सपनों की
हरियाली बन
खेतों में
लहराऊँ
पवन के झोंकों संग
उस छोर पहुँच जाऊँ

बरसूँ
निर्जन वन में
पंछी गाएँ।
ठंडी धूप में
देखूँ उनको
पंख फैलाये
लौटूँ
फिर अपने घर-आंगन ।

ठहरो :
चलो, ले चलो-
रेत समन्दर
निर्जल-निर्मिति रेत–लहर

फिर तो मैं मिट जाऊंगी
तुमसे न मिल पाऊंगी
अनस्तित्व के सूने जग में
अस्तित्व एक बनाऊंगी ।

छटपटाहट

धूप में छटपटाते
जन्तु को
नहीं बचाया मैंने
सोचा
मुक्त हो जाये

चौसठ करोड़ योनियों
में से
एक तो
कम हो जाये

पर छटपटाहट की लहर
देह में सिहर गई

छटपटाऊँ
उसी तरह मैं
निरपेक्ष
देखें सब

जीवन से
मुक्त होने का
आह्लाद क्या
मुझमें
होगा तब ?

जन्म देना
करना मुक्त
उसका काम

असहाय होना
तड़फड़ाना
कर्मों का
अपने जन्म-जीवन का दण्ड ।

क्यों न!

मन
उदधि-सा
तन
दूर बजती
मीठी, सुरीली तान-सा
बन जाए ।

कैसा हो
घर छोड़ सब
बैठें किसी जगह
मिल बाँटकर
रोटी खाएँ
पिएँ
जल झरनों का
नील गगन तले
सो जाएँ
कोयल कूके
नाचे मोर
कंधा बने
मुनिया का ठौर

मन मिल जाएँ
थामें हाथ…
क्यों न चल पड़ें
हम एक साथ ।

उस ठौर

मैं
नदिया सी बहती
मिलती, मिटती
पहुँची
उस ठौर

जहाँ
अनन्त मेरा
किनारा था

मांगा
उसने रंग मेरा
गति मेरी
मति मेरी
और
व्यक्तित्त्व का
विलोप

शतदल
पत्रों में
इन्द्रधनुषी रंग समेटे
चली मैं
ऊर्ध्वगामी
सहस्रार से मिलने

एकाकार हुई
रंग रहा न मेरा
गति हुई अद्श्य

अगर

हर व्यक्ति
एक पात्र होता
लिखूँ
कहानी अगर मैं

हर द्श्य
एक कविता होता
जोडूँ
शब्दों की लड़ी
अगर मैं

हर कुहू, पियू
एक गीत होता
स्वरों में बांधूँ
अगर मैं

हर कंपन
चंदा–बदरा की
लुका-छिपी में रसभरी
बदली की ऊदी साड़ी पर
सुनहरी किनारी वाला
एक चित्र होता
रंगों को करूँ आमंत्रित
अगर मैं

अगर, गर न होता-
पन्नों की पीड़ा होता
तारों से रिसता दर्द होता
झूमते मन का सुखद क्षण होता
हर व्यक्ति एक पात्र होता
हर द्श्य एक कविता
हर गुंजन स्वर–लहरी होता
हर बादल रंगों में आ बसता
अगर गर न होता ।

बांधना

बालक के रोने सा,
मन का होना
मचलना
फिर रूठना…
रूको,
अब बांधूंगी तुमको-
खूँटे से।
कस दूंगी रस्सी से
हाथ-पैर ।

लो ,
बांधा !
फिर भी हँसते हो ?
यह क्या !
मुँह खोल
चिढ़ाते हो
सारा संसार
मुझे दिखाते हो !
सच ही
तुम नटखट हो !
तुम्हें छोड़ दूंगी,
तो
जग कैसे देखूंगी !

चाहत-1

झुकी देह–यष्टिका
बूढ़ा हुआ तन

चाहत
बालक सी
फिर भी
मुस्काती

सुबह की कोमल गरम
किरण-सी
छरहरी
पेड़ों के झुरमुट से
झाँकती
आकर
मुझ में बस जाती

चाहत
तुम क्यों न बूढ़ी हुईं ?
आकर मेरे आंगन में
शिशु बना,
खिलौना थमा
मुझ से
खिलवाड़ करती हो !

अनुराग

थम गई गति
कुछ सोच रहा हूँ
रुका नहीं हूँ
पहचान रहा हूँ

अर्थ खो चुकीं
चीज़ें, घटनाएँ
दुख, आह्लाद

हो गया सबसे
परे अवसाद

सुख धीमा-बेस्वाद
हर रोज़ की सुबह-सा
उगा, उठा और डूब गया

बैठा किनारे को
अवलोकता-सा निस्पृह

दुख
गुज़रती हवा के
गर्म झोंके-सा

व्यापक एक भाव
शान्त-
बुद्ध का हो जैसे हाथ
शिव का हो
जैसे अनुराग

तुम

आदत नहीं थी
संग तुम्हारे रहने की
धीरे–धीरे
घर तुम्हारा हो गया

फैलाव
जब मुझ में
सिमटने को होता है
छूट जाता है तभी
जिसको मैंने
सहेजा था, सँवारा था

मेरी जकड़ को
खींचने लगते हो तुम
क्यों ?
कहाँ से आ जाते हो ?

नाता
गहरा जाता है
नहीं फिर कुछ सूझता
सार तुम्हीं बन जाते हो ।

चाहत-2

अब तक
जब-तब तुम्हारी आँखें
प्रेम की महकी ललक से
झुक जाती हैं

चेहरा
इच्छा-अनिच्छा की
बातें
बहुत-सी कहता है

मैं पढ़कर भी
अनजान बना रहता हूँ
चाहत मेरी
अब भी
उसी ठौर
रूकी हुई है

पहले पहल
जहाँ
बाँहों में
तुम्हें समेटा था

चाहत का सूरज
मिटता नहीं
लौटकर
सुबह-सुबह रोज़!

मिलना-पाना

जो मिला
न हमें किसी से
खुश हो ले मन
औरों के पा लेने से !

दे दो वह सब
दे सको अगर
आकांक्षा, चाहत
जीवित–मृत्यु में
राहत
जूझे न वे तुमसे
बुझे न वे
दुख से
याद न करें बीता
बदली छटके
सूरज निकले सबका

पहेली

रीता करने से
भर जाये
हो गई पहेली
भरने से
मन हल्का हो
कह देने से
गहरा जाए
कहते ही
फिर भर जाये

खिड़की
बन्द रखी
करने को निवात
अंदर के कोलाहल से
ऐसा आया झंझावात
टूटे
खिड़की, दरवाज़े
हुआ तभी
निर्वात ?

पीड़ा

पीड़ा से
कल बातें की
लगी कहने-
अच्छा लगता है
संग तुम्हारा

मुझ को औरों ने
कोसा
तुमने बाँहों में
जकड़ा।

मैं
तुम्हारी संगिनी हूँ
जन्म–जन्म की
बंदिनी हूँ

पर
रह न सकूंगी
साथ तुम्हारे
जा न सकूंगी
धरती से

रहना है
औरों के संग
शापित हूँ
आदिकाल से !

जग का दु:ख
मेरी पीड़ा
मुझ बिन जीवन
फूल बिन रंग
मैं हूँ अगर
जीवन पर अभिशाप
मैं ही हूँ
सुख का
स्रोत अपने आप ।

पहचान

क्यों ये वीरानी
बस्तियों में ?
राही अनेक हैं
फिर भी मैं
अकेली

रास्ता तो वही है
सड़क भी
वहीं खड़ी है

कहाँ गये मेरे वो…
कहाँ गई वह
पहचान
जब हर पेड़
हर घर
हर राही
आपस में जानते थे
एक-दूसरे को !

जाने से उनके
जिन्होंने दी थी
हम सबको
पहचान

पहचान रह गई
सिर्फ़ मुझ में
एकतरफ़ा
कैसा दर्द है यह
जानती हूँ मैं सबको
वे हैं मुझ से
अनजान ।

मैं
औरों के साथ–साथ
अपने लिए भी
अजनबी हो गई हूँ ।

नीलापन

पनीले,
भूरे बादलों से घिरा
वह नन्हा, नीला
आकाश का टुकड़ा

हरे, गहराए, झूमते
पेड़ों से आती
ठंडी फुरहरी
हवा का झोंका
देखते ही देखते
ले आये फुहार

नन्हा नीला आकाश
फैलने लगा
भूरे बादल
हुए सफेद
मिल गए फिर
नीले विस्तृत आसमाँ से

मेरे मन का
नीलापन
फैल रहा है
धीरे–धीरे
काली बदलियों को
छाँटकर

कबर्ड

बंद था
एक कबर्ड में
सिमटा, सिकुड़ा
सारा जीवन

कुछ काग़ज़
कुछ चीज़ें
थीं सारी यादें
जीए जीवन की
कुछ सिहरन
सारा जीवन

खोलने जाती हूँ
अब भी जब
हाथ थम जाते हैं
जैसे प्रिय ने
ले लिए हों
हाथों में हाथ

रोने का जी होता है
रोकर जैसे
अच्छा लगता है
प्रिय के वक्ष पर
रखकर
दुख, दर्द, अपराध

सिर रखकर
कबर्ड पर
भूल जाती हूँ मैं
दिन बीत गए
अब
अन्दर हैं सामान
केवल नाम-

सर्टिफिकिट , इन्टरव्यू काल
प्रशस्ति पत्र, फोटो
चिट्ठियाँ ,छोटी-छोटी कतरन ।

अर्घ्यदान

सुबह, आज
अर्घ्यदान दिया
अपने मन के सूरज को !

किरणें उजली
पानी की बूंदों में
बन सतरंगी
बरसीं तन–मन पर
बन मेरी संगी

अस्ताचल में डूबा सूरज
फिर देखा
लौटा मन आंगन में

चहके पंछी
लहराए पौधे
मगन, हिलोर हिया
आंगन में जब
मन के सूरज को
मैंने
अर्घ्यदान दिया ।

सब ही कहते हैं
पर मैंने देखा
जो डूबा, फिर लौटा
मेरा मन सोया
लो फिर जागा

पंछी, पौधे
सतरंगी किरणें
सबने
मेरे मन की
अमित आभा को
मेरे संग
अर्घ्यदान दिया ।

कूर्म

यह कैसा अन्याय
अभेद्य कवच में
बन्द एक प्राण

मन तो होता होगा
कर लें बातें
कभी तो होता होगा
मन
अपनों से मिलने

देखी विवशता तुम्हारी
चलने, चढ़ने में देह भारी
गिरते उल्टे जब
सुनी चीत्कार तुम्हारी

‘मुक्त करो’ मुझको
मुक्त करो
लादा गया जीवन
क्रिया, प्रक्रिया का परिभ्रमण

याद नहीं कुछ भी मुझ को
किसकी करनी यह जन्म
चीखे तुम कूर्म
क्यों कवच में मेरा मर्म

मिलेगा क्या अगला
सुख-स्वातंत्र्य
स्वच्छन्द देह
वानी, विवेक , विचार
अभेद्य कवच में
बन्द क्यों प्राण ?

उजाला

मन तो सतरंगी
भटका, ताना बाना
उजला कभी
उच्छल बन
बिखरा

फिर अंधकार में
निमग्न अंतर
डूबे ही जाता क्यों
निरंतर

दुख के छोटे–छोटे
अंधियारे
तो हैं सबके
अपने अंदर

खिड़की के बाहर
बाट जोहती
सूरज की ऊनी-ऊनी किरण
चमेली की भीनी-भीनी गंध
आकुल है
आने को अंदर

पंछी चहकेंगे
जब होगा उजाला
खोलो
बंद पटल

समझो तो

निश्चछल मन है
समझो तो
स्वच्छ चांदनी सा फैला है
खोलो बाहें
बांधो तो

होंगे अलग मन
तन भी दो होंगे
अन्तर्मन की
बहती धारा को पकड़ो तो
निश्चछल मन है
समझो तो

धारा है
बह चली अगर
मुख मोड़ , बदल
तुमसे अलग
तो
उन्मन तरंग को
रोको तो
गहरा नाता है
जानो तो
निश्चछल मन है
समझो तो

तुम तो
उज्ज्वल हिम थे
धार तो थी
तुम्हारी
उच्छल न होने दो
ध्यान दो, आधार दो
प्यार दो, दुलार दो
निश्चछल मन है
समझो तो ।

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