साबिर की रचनाएँ

हमारी बेचैनी उस की पलकें भिगो गई है

हमारी बेचैनी उस की पलकें भिगो गई है
ये रात यूँ बन रही है जैसे कि सो गई है

दिए थे काल घटा को हम ने उधार आँसू
किसे कहें अब कि सारी पूँजी डुबो गई है

हम उस की ख़ातिर बचा न पाएँगे उम्र अपनी
फ़ुज़ूल-ख़र्ची की हम को आदत सी हो गई है

वो एक साहिल कि जिस पे तुम ख़ुद को ढूँढते हो
वहीं पे इक शाम मेरे हिस्से की खो गई है

मैं यूँ ही मोहरे बढ़ा रहा हूँ झिझक झिझक कर
ख़बर उसे भी है बाज़ी वो हार तो गई है

ख़ूबियों को मस्ख़ कर के ऐब जैसा कर दिया

ख़ूबियों को मस्ख़ कर के ऐब जैसा कर दिया
हम ने यूँ ऐबों की आबादी को दूना कर दिया

तय तो ये था हर बदी की इंतिहा तक जाएँगे
बे-ख़याली में ये कैसा काम अच्छा कर दिया

मुझ से कल महफ़िल में उस ने मुस्कुरा कर बात की
वो मिरा हो ही नहीं सकता ये पक्का कर दिया

चिलचिलाती-धूप थी लेकिन था साया हम-क़दम
साएबाँ की छाँव ने मुझ को अकेला कर दिया

मैं भी अब कुछ कुछ समझने लग गया हूँ ऐ तबीब
दर्द ने सीने में उठ कर क्या इशारा कर दिया

मुझे क़रार भँवर में उसे किनारे में

मुझे क़रार भँवर में उसे किनारे में
सो कितनी दूर तलक बहते एक धारे में

मुझे भी पड़ गई आदत दारोग़-गोई की
वो मुझ से पूछता रहता था मेरे बारे में

ये कारोबार-ए-मोहब्बत है तुम न समझोगे
हुआ है मुझ को बहुत फ़ाएदा ख़सारे में

कहाँ रहा वो गुमान अब कि हैं ज़माना-शनास
उलझ के रह गए ज़ू-मअ’नी इक इशारे में

अजीब बात सही ख़ुद को दाद-ए-फ़न देना
किसी के लम्स की ख़ुश्बू है इस्तिआरे में

मुख़्तसर ही सही मयस्सर है

मुख़्तसर ही सही मयस्सर है
जो भी कुछ है नहीं से बेहतर है

दिन-दहाड़े गुनाह करता हूँ
मो‘तबर हो न जाऊँ ये डर है

मंच पर कामयाब हो कि न हो
मुझ को किरदार अपना अज़्बर है

सब को पथरा दिया पलक झपके
हम न कहते थे शोबदा-गर है

ऐन मुमकिन है वो पलट आए
मेरा ईमान मोजज़ों पर है

पहले मौसम पे तबसिरा करना
फिर वो कहना जो दिल के अंदर है

सारे मंज़र हसीन लगते हैं
दूरियाँ कम न हों तो बेहतर है

रास्ते बैन कर रहे हैं क्यूँ
क्या मसाफ़त ये इंतिहा पर है

फ़स्ल बोई भी हम ने काटी भी
अब न कहना ज़मीन बंजर है

मुस्तक़र की ख़्वाहिश में मुंतशर से रहते हैं

मुस्तक़र की ख़्वाहिश में मुंतशर से रहते हैं
बे-कनार दरिया में लफ़्ज़ लफ़्ज़ बहते हैं

सब उलट-पलट दी हैं सर्फ़-ओ-नहव-ए-देरीना
ज़ख़्म ज़ख़्म जीते हैं लम्हा लम्हा सहते हैं

यार लोग कहते हैं ख़्वाब का मज़ार उस को
अज़-रह-ए-रवायत हम ख़्वाब-गाह कहते हैं

रौशनी की किरनें हैं या लहू अंधेरे का
सुर्ख़-रंग क़तरे जो रौज़नों से बहते हैं

ये क्या बद-मज़ाक़ी है गर्द झाड़ते क्यूँ हो
इस मकान-ए-ख़स्ता में यार हम भी रहते हैं

सच यही है कि बहुत आज घिन आती है मुझे

सच यही है कि बहुत आज घिन आती है मुझे
वैसे वो शय कभी मतलूब रही भी है मुझे

अपनी तन्हाई को बाज़ार घुमा लाया हूँ
घर की चौखट पे पहुँचते ही लिपटती है मुझे

तुझ से मिलता हूँ तो आ जाती है आँखों में नमी
तू समझता है शिकायत ये पुरानी है मुझे

उस के शर से मैं सदा माँगता रहता हूँ पनाह
इसी दुनिया से मोहब्बत भी बला की है मुझे

बस इसी वजह से है उस की ज़बाँ में लुक्नत
उस को वो बात सुनानी है जो कहनी है मुझे

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी
आज-कल बाज़ार में मंदी है सस्ता है अभी

दरमियाँ जो फ़ासला रक्खा हुआ सा है अभी
इक यही उस तक पहुँचने का वसीला है अभी

यूँ ही सब मिल बैठे हैं साबेकूनल-अव्वलून
दश्त में जारी हमारा आना जाना है अभी

मुस्कुराना एक फ़न है और मैं नौ-मश्क़ हूँ
फिर भी कया कम है उसे बेचैन देखा है अभी

क़ुमक़ुमों की रौशनी में भी नज़र आता है चाँद
गाँव में मेरा पुराना इक शनासा है अभी

जा-ब-जा बिखरे पड़े हैं सारे आज़ा ख़्वाब के
ज़ेर-ए-मिज़्गाँ किस ने ये शब-ख़ून मारा है अभी

क्यूँ न घड़ लें कुछ मनाक़िब और फ़ज़ाएल हब्स के
जब इसी अंधे कुएँ में हम को जीना है अभी

तुम्हारे आलम से मेरा आलम ज़रा अलग है

तुम्हारे आलम से मेरा आलम ज़रा अलग है
हो तुम भी ग़म-गीं मगर मिरा ग़म ज़रा अलग है

यहाँ पे हँसना रवा है रोना है बे-हयाई
सुक़ूत-ए-शहर-ए-जुनूँ का मातम ज़रा अलग है

खुलेंगे शाखों के राज़ अहल-ए-चमन पर अब के
गिरह गिरह से उलझती शबनम ज़रा अलग है

तिरे तसव्वुर की धूप ओढ़े खड़ा हूँ छत पर
मिरे लिए सर्दियों का मौसम ज़रा अलग है

ज़रा सा बदला हुआ है तर्ज़-ए-कलाम ‘साबिर’
वही पुराने हैं लफ़्ज़ दम-ख़म ज़रा अलग है

 

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