सारा शगुफ़्ता की रचनाएँ

आतिश-दान

आतिश-दानों से
अपने दहकते हुए सीने निकाल लो
वर्ना आख़िर दिन
आग और लकड़ी ओ अशरफ़-उल-मख़्लूक़
बना दिया जाएगा

ऐ मेरे सर-सब्ज़ ख़ुदा

बैन करने वालों ने
मुझे अधखुले हाथ से क़ुबुल किया
इंसान के दो जनम हैं
फिर शाम का मक़्सद क्या है
मैं अपनी निगरानी में रही और कम होती चली गई
कुत्तों ने जब चाँद देखा
अपनी पोशाक भूल गए
मैं साबित क़दम ही टूटी थी
अब तेरे बोझ से धँस रही हूँ
तन्हाई मुझे शिकार कर रही है
ऐ मेरे सरसब्ज़ ख़ुदा
ख़िज़ाँ के मौसम में भी मैं ने तुझे याद किया
क़ातिल की सज़ा मक़्तूल नहीं
ग़ैब की जंगली-बेल को घर तक कैसे लाऊँ
फिर आँखों के टाट पे मैं ने लिक्खा
मैं आँखों से मरती
तू क़दमों से ज़िंदा हो जाती

आधा कमरा

उस ने इतनी किताबें चाट डालीं
कि उस की औरत के पैर काग़ज़ की तरह हो गए
वो रोज़ काग़ज़ पे अपना चेहरा लिखता और गंदा होता
उस की औरत जो ख़ामोशी काढ़े बैठी थी
काग़ज़ों के भूँकने पर सारतर के पास गई
तुम रैम्बो और फ्राइड से भी मिल आए हो क्या
सैफ़ू मेरी सैफ़ू मीराबाई की तरह मत बोलो
मैं समझ गई अब सु की आँखें
कैट्स की आँखें हुई जाती हैं
मैं जो सोहनी का घड़ा उठाए हुए थी
अपना नाम लैला बता चुकी थी
मैंने कहा
लैला मजमे की बातें मेरे सामने मत दोहराया करो
तन्हाई भी कोई चीज़ होती है
शेक्सपियर के ड्रामों से चुन चुन कर उस ने ठुमके लगाए
मुझे तन्हा देख कर
सारतर फ्राइड के कमरे में चला गया
वो अपनी थ्योरी से गिर गिर पड़ता
मैं समझ गई उस की किताब कितनी है
लेकिन कल को मजमे में भी मिलना था
मैंने भीड़ की तरफ़ इशारा किया तो बोला
इतने सारे सार्त्रों से मिल कर तुम्हें क्या करना है
अगर ज़ियादा ज़िद करती हो तो अपने वारिस शाह
हीर सियाल के कमरे में चले चलते हैं
सारतर से इस्तिआरा मिलते ही
मैंने एक तन्क़ीदी नशिस्त रक्खी
मैंने आधा कमरा भी बड़ी मुश्किल से हासिल किया था
सो पहले आधे फ्राइड को बुलाया
फिर आधे रैम्बो को बुलाया
आधी आधी बात पूछनी शुरू की
जॉन डन क्या कर रहा है
सैकेंड हैंड शाइरों से नजात चाहता है
चोरों से सख़्त नालाँ है
दाँते इस वक़्त कहाँ है
वो जहन्नम से भी फ़रार हो चुका है
उस को शुबहा था
वो ख़्वाजा-सराओं से ज़ियादा देर मुक़ाबला नहीं कर सकता
अपने पस-मंज़र में
एक कुŸाा मुसलसल भोंकने के लिए छोड़ गया है
इस कुत्ते की ख़सलत क्या है
बियातर्चे की याद में भूँक रहा है
तुम्हारा तसव्वुर क्या कहता है
सार्त्रों की तसव्वुर के लिहाज़ से
अब उस का रूख़ गोएटे के घर के तरफ़ हो गया है

बाक़ी आधे कमरे में क्या हो रहा है
लड़कियाँ
क्या हर्फ़ चुन रही हैं
इस्तिआरे के लिहाज़ से
हराम के बच्चे गिन रही हैं
लड़कियों के नाम क़ाफ़िए की वजह से
सारतर ज़ियादा नहीं रख पा रहा है
इसलिए उन की ग़ज़ल छोटी पड़ रही है
ज़मीन के लिहाज़ से नक़्क़ाद
अपने कमरों से उखड़ने के लिए तय्यार नहीं
लेकिन उन्होंने वादा किया है
सारे थिंकर इकट्ठे होंगे
और बताएँगे कि सोसाइटी किया है
और क्यूँ है
वैसे हवाओं का काम है चलते फिरते रहना
दूर-अँदेश की आँख कैसी है
सिगरेट के कश से बड़ी है
वो घड़े से पत्थर निकाल कर गिन रहे थे
और कह रहे थे मैं इस घड़े का बानी हूँ
चाय के साथ ग़ीबत के केक
ज़रूरी होते हैं
और चुग़ल-ख़ोरी की किताब का दीबाचा
हर शख़्स लिखता है
ज़बानों में बुझे तीरों से मक़्तूल ज़िंदा हो रहे हैं
बड़ा इबलाग़ है
सोसाइटी के चेहरे पे वो ज़बान चलती है
कि एक एक बंदे के पास
किताबों की रियासत बंदे से ज़ियादा है

रियासत में
महारानियों के क़िस्से घढ़ने पर
इल्म की बड़ी मिलती है
बिल के सादा-काग़ज़ पर
इल्म लिख दिया जाता है
ताज़ा दरयाफ़्त पर
हर फ़र्द की मुट्ठी गर्म होती है

पहले ये बताओ झुझुने की तारीख़-ए-पैदाइश क्या है
मैं कोई नक़्क़ाद हूँ जो तारीख़ दोहराता फिरूँ
किसी का कलाम पढ़ लो
तारीख़ मालूम हो जाएगी
तुम्हारी आँखों में आँसू
‘मीर’ की किताब का दीबाचा लिखना है
ये किस की पट्टी है
नक़्क़ाद भाई की
ये किस की आँख है
मुझे तो सैफ़ू भाभी की मालूम हो रही है
और ये हाथ
ग़ालिब का लगता है
बकते हो
ज़र की अमान पाऊँ तो बताऊँ
जितने नाम याद थे बता दिए
लेकिन तुम्हारा तसव्वुर क्या कहता
मैं दुम हिलाने के सिवा क्या कर सकता हूँ

चाँद का क़र्ज़

हमारे आँसुओं की आँखें बनाई गईं
हम ने अपने अपने तलातुम से रस्सा-कशी की
और अपना अपना बैन हुए
सितारों की पुकार आसमान से ज़ियादा ज़मीन सुनती है
मैं ने मौत के बाल खोले
और झूठ के दराज़ हुई
नींद आँखों क कंचे खेलती रही
शाम दोग़्ले-रंग सहती रही
आसमानों पे मेरा चाँद क़र्ज़ है
मैं मौत के हाथ में एक चराग़ हूँ
जनम के पहिए पर मौत की रथ देख रही हूँ
ज़मीनों में मेरा इंसन दफ़्न है
सज्दों से सर उठा लो
मौत मेरी गोद में एक बच्चा छोड़ गई है

साए की ख़ामोशी

साए की ख़ामोशी सिर्फ़ ज़मीन सहती है
खोखला पेड़ नहीं या खोखली हँसी नहीं
और फिर अंजान अपनी अनजानी हँसी में हँसा
क़हक़हे का पत्थर संग-रेज़ों में तक़्सीम हो गया
साए की ख़ामोशी
और फूल नहीं सहते
तुम
समुंदर को लहरों में तरतीब मत दो
कि तुम ख़ुद अपनी तरतीब नहीं जानते
तुम
ज़मीन पे चलना क्या जानो
कि बुत के दिल में तुम्हें धड़कना नहीं आता

दूसरा पहाड़

ये दूसरा पहाड़ था
जहाँ चीज़ों में मेरी उम्र के कुछ हिस्से पड़े थे
मैं यहाँ से कितनी बे-तरतीब गई थी
और मैं अपना दिन गर्द कर के आ रही थी
सारी चीज़ों ने मुझे गले लगाया
मैं ने छोटे जूते छाबड़ी वाले को फ़रोख़्त कर दिए
और सिक्के हेंगर में पड़े छोटे कपड़ों में डाल दिए
मैं आईने के सामने खड़ी हुई
और अपनी आँखों की झुर्रियाँ गिनने लगी
आग पर परिंदे सेंकने लगी
तो भूक मेरी एड़ी से डर निकली

आँखें दो जुडवाँ बहनें

जब हमारे गुनाहों पे वक़्त उतरेगा
बंदे खरे हो जाएँगे
फिर हम तौबा के टाँकों से
ख़ुदा का लिबास सिएँगे
तुम ने समुंदर रहन रख छोड़ा
और घोंसलों से चुराया हुआ सोना
बच्चे के पहले दिन पे मल दिया गया

तुम दुख को पैवन्द करना
मेरे पास उधार ज़ियादा है और दुकान कम
आँखें दो जुड़वाँ बहनें
एक मेरे घर बियाही गई दूसरी तेरे घर
हाथ दौ सौतले भाई
जिन्हों ने आग में पड़ाव डाल रक्खा है

बदन से पूरी आँख है मेरी

जाओ जा-नमाज़ से अपनी पसंद की दुआ उठा लो
हर रंग की दुआ मैं माँग चुकी
बाग़बाँ दिल का बीज तेरे पास भी न होगा
देख धुएँ में आग कैसे लगती है
मेरे पैरहन की तपिश मिट्टी कैसे जलाती है
बदन से पूरी आँख है मेरी
निगाह जोतने की ज़रूरत ही क्या पड़ी है
मेरी बारिशों के तीन रंग हैं
टूटी कमान पे इक निशान ख़ता का पड़ा है
हम चाहें तो सूरज हमारी रोटी पकाए
और हम सूरज को तंदूर करें
फ़ैसला चुका दिया ख़ता अपनी भूल गए
नज्र करने आए थे चुटकी भर आँख
आँख तेरी गलियों में तो बाज़ार हैं
ज़मीन आँख छोड़ कर समुंदर में सो रही
जंगल तो सिर्फ़ तलाश है
घर तो काएनात के पिछवाड़े ही रह गया
शिकार कमान में फँस फँस कर मरा
तुम कैसे शिकारी
आँखें तेवरों से जल रही हैं
जिस्म ज़िंदगी की मुलाज़मत में है
तन्हाई कश्कोल है
हम ने आँखों से शमशीर खींची
और रूख़्सत की तस्वीर बनाई
रात गोद में सुलाई
और चाँद का जूता बनवाया
हम ने राह में अपने पैरों को जना

मौत की तलाशी लो

बादलों में ही मेरी तो बारिश मर गई
अभी अभी बहुत ख़ुश लिबास था वो
मेरी ख़ता कर बैठा
कोई जाए तो चली जाऊँ
कोई आए तो रूख़्सत हो जाऊँ
मेरे हाथों में कोई दिल मर गया है
मौत की तलाशी मत लो
इंसान से पहले मौत ज़िंदा थी
टूटने वाले ज़मीन पर रह गए
मैं पेड़ से गिरा साया हूँ
आवाज़ से पहले घट नहीं सकती
मेरी आँखों में कोई दिल मर गया है …..

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