सीताराम गुप्त की रचनाएँ

दल बदलू हवाएँ

जो पहले लू बन चलती थीं,
वे अब बर्फीली कहलाएँ।
दल-बदलू हो गई हवाएँ!
सिर्फ हवा क्या, मौसम ने ही
अब तो ऐसा मोड़ लिया है,
दादी जी ने फिर निकालकर
गरम दुशाला ओढ़ लिया है!
सूरज ढलते ही मन कहता-
चल रजाइयों में छिप जाएँ,
कथा-कहानी सुनें, सुनाएँ।

सूरज की नन्हीं-सी बिटिया-
धूप सुबह की चंचल लड़की,
द्वार-द्वार किलकारी भरती
झाँक रही है खिड़की-खिड़की!
बिस्तर छोड़ो, बाहर आओ,
चलो धूप से हाथ मिलाएँ
कर तैयारी शाला जाएँ।

-साभार: पराग, दिसम्बर, 98, पृष्ठ 7

रेवड़ी

ठेलों चढ़ी, मेलों चढ़ी,
बाजार-हाटों में अड़ी!
कैसी कड़कती ठंड में-
डटकर खड़ी है रेवड़ी!

तिल-मोतियों से तन जड़ा
मन में बसा है केवड़ा;
लेकर गुलाबों की महक-
लो चल पड़ी है रेवड़ी!

क्या चीज मोतीचूर है,
यह डालडा से दूर है!
ले चाँद की गोलाइयाँ
किसने गढ़ी है रेवड़ी!

खुद होंठ खुलने लग गए,
खुद दाँत चलने लग गए,
आवाज कुरमुर की हुई,
ज्यों हँस पड़ी हो रेवड़ी!

बूढ़े फिसलने लग गए,
बच्चे मचलने लग गए,
दाँतों से कुश्ती के लिए-
ज़िद पर अड़ी है रेवड़ी!

बच्चो, कहावत है सुनो,
क्या अर्थ है इसका गुनो,
अंधे ने अपनो को सदा
बाँटी बहुत है रेवड़ी!

लड़की मौसम की

खिले कमल सी जिसकी सूरत,
आँखें शबनम की,
आई फ्रॉक पहन कुहरे की
लड़की मौसम की।

है बर्फीली चाल, हवा से
साँठ-गाँठ इसकी,
बड़ी कटखनी, काट गई तो
नस-नस तक कसकी।
पीट साँकलें दे जाती हर
दरवाजे धमकी।

तिल बुग्गे, रेवड़ी, गजक की
है शौकीन बड़ी,
चट कर जाती मेवा काजू-
किशमिश खड़ी-खड़ी।
सर्दी इसका नाम, लाडली
सारे आलम की।

सड़क का पत्ता

बोला उड़ पीपल का पत्ता,
‘‘चाहूँ तो पहुँचूँ कलकत्ता।
कहने को तू सड़क बड़ी है,
पर बरसों से यहीं पड़ी है।’’
बोली सड़क-‘‘न शेखी मार,
मैं तो जाती कोस हजार।’’

कार पड़ी बीमार

गप्पीमल ने गप्प लड़ाई-
खुली लाटरी भाई,
आज हमारे धर पर उससे
नई कार है आई!

भीड़ जमा जब हुई देखने
गप्पी जी की कार,
गप्पी बोले अस्पताल में-
कार पड़ी बीमार!

मिला दूध में पानी

ग्वाला चला दूध देकर जब,
उससे बोली नानी,
इतना पतला दूध आज है
मिला दूध में पानी!

ग्वाला बोला-भैंस ताल में
जा बैठी कल शाम,
इससे दूध हुआ कुछ पतला
पानी का क्या काम!

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