सीत मिश्रा की रचनाएँ

अधिकार

सरकार का अधिकार है
तुम्हारे विचारों पर
तुम्हारी चर्चा पर
तुम्हारे व्यवसाय पर
सरकार का अधिकार है
तुम्हारे नाम में
तुम्हारे धर्म में
तुम्हारी प्रार्थना में
सरकार का अधिकार है
तुम्हारे आशियाने पर
तुम्हारी थाली पर
तुम्हारे भोजन पर
सरकार का अधिकार है
तुम्हारी सांसों पर
तुम्हारी जिंदगी पर

आतंक

मैं आतंकित हूं उस स्नेह से
जो बेवजह मुझपर बरसने लगता है
उस नफरत से भी
जो मेरे भोजन में चली आती है
उस ईश्वर से
जो खुद को स्थापित करने की चाह में
इंसानियत को झुलसा डालता है
उस भाषा से भी
जो अपना विस्तार
सबको कुचले जाने में समझती है
उस रामायण से भी
जो सीता को उसके हक से
वंचित कर देती है
उस कुरान से भी
जो पुरुषों को चार शादियों की इजाजत देता है
उस परम्परा से भी
जो पुरुषों के भरोसे
दुनिया चलाने का दावा करती है
और खत्म कर देती है
कोख में बेटियां
उस प्रेम से भी
जो सीमा रेखा के पार
जाने की इजाजत नहीं देता
क्योंकि…
बंधन में प्रेम नहीं, सेक्स होता है

प्रेम-1

किसी समय जब तुम प्रेम में डूबे हो
और अचानक जेहन में कौंधता है पुराना प्रेम
जो कभी पुराना नहीं पड़ा
खयाल यह भी रहता है
कि तुम अपनी पत्नी के बाहोपाश में हो
वह एक याद तुम्हें शिथिल कर देगी
तुम्हारा ह्दय बीते प्रेम में डूबने लगेगा
लेकिन तुम्हें फिर याद आएगा वर्तमान
जिसे तुमने जकड़ रखा है भुजाओं में
समय को भूला देने की चाहत में
तुम बंद कर लोगे अपनी आँखें
और खुद को खोने दोगे वर्तमान में
यह समझकर कि वह कभी पुराना नहीं पड़ने वाला प्रेम है
उसका साथ निबाहना है आजीवन
तुम उसे ऐसे महसूस करोगे जैसे किसी और को महसूसा
ऐसे प्रेम करोगे जैसे किसी को और किया
स्मृति में प्रेयसी को लिए
डूब जाओगे
उसी तल्लीनता के साथ पत्नी-प्रेम में।

आग्रह

तुम्हारे आग्रह पर हर बार मिलती हूँ
इस उम्मीद के साथ कि तुम मिलोगे
हर बार निराश होती हूँ
तुमसे मुलाकात नहीं होती
तुम मेरी स्मृतियों में रचे-बसे हो
मेरे साथ मुझमें पलते-बढ़ते हो
लेकिन तुमसे मिलकर एहसासों की बयार नहीं बहती
तुम्हारी आँखें अब भेद नहीं पाती मुझे
फिर भी मिलती हूँ
तुम्हारे मिल जाने की आस में
बार-बार हर बार निराश होती हूँ
फिर साहस समेटती हूँ
तुममें तुम्हें ढूंढने की कोशिश करती
कभी-कभी झलक मिल जाती है तुम्हारी
बढ़ जाती है उम्मीदे तुम्हारे मिल जाने की
लेकिन फिर नाकामी
और तुम्हारा आश्वासन
कि कुछ भी नहीं बदला
मैं तुम्हें हमेशा से प्यार करता हूँ
फिर क्यों नहीं होता एहसास
क्यों तुम्हारा साथ मुझे परेशान करने लगता है
तुम्हारी हर छुअन एहसास दिलाती है
तुमने किसी और को यूँ ही छुआ होगा
जो मुझसे कहते हो किसी और से भी कहा होगा
यह सब सोचते हुए मेरा दिमाग भन्ना जाता है
मैं शिथिल पड़ जाती हूँ
फिर सोचती हूँ
अगर तुम्हें किसी और से प्यार है
तुम किसी और के साथ हो
तो भला मेरी क्या जरूरत
मुझसे क्यों मिलते हो
क्या तुम्हें भी मेरी तलाश है
क्या तुम भी मुझे ढूढ़ते हो
जैसा मैं सोचती हूँ तुम भी सोचते हो
तुम भी मेरे मिल जाने की आस लिए मुझसे मिलते हो।

वक्त

हमारे बीच ठंडे पड़े रिश्ते में
वक्त ने बहुत कुछ निगल लिया
खामोशियां अब नहीं झकझोरतीं
वीरानी भी दिखाई नहीं देती
हमें इनकी आदत लग चुकी है
हमारी जरूरतमंद चीजों से घर भरा है
सब कुछ भरते-भरते, हममें कुछ खाली हो गया
उस चुके हुए को भरने के लिए
हमने बच्चे पाल लिए हैं
क्या ऐसा भी कभी रहा
जब हम दोनों सिर्फ एक-दूसरे से जुड़े थे
बार-बार हजार बार एक-दूजे में खोकर
खुद को पाने की जद्दोजहद करते
और तृप्त होने के बाद भी चिपटे रहते
अब वो बातें भी बचकानी हो चली हैं
वक्त के साथ गुजर जाता है सबकुछ
लेकिन यादें बनी रह जाती हैं
बचकानी सी।

प्रेम-2

प्रेम की नई परिभाषा गढ़ी उसने
साथ रहना, सोना, खाना-पीना प्रेम नहीं
दैनिक जीवन का हिस्सा है
बढ़ती उम्र के साथ जिस्म की भी जरुरत होती है
और उसे प्रेम का नाम देना गलत है
जरुरतें प्रेम की दिशा तय करती हैं
जब मां की जरुरत थी तब सिर्फ मां से प्रेम था
जब शारीरिक जरुरतें जागी
तो प्रेम का दायरा व्यापक हुआ और मेरा प्रेम तुम तक सिमट गया
फिर सामाजिक जरुरतें जाग्रत हुई तब पत्नी से प्रेम हुआ
लेकिन बच्चों के जन्म के साथ
प्रेम दूसरी दिशा में प्रवाहित होने लगा
उनमें से कुछ रिश्ते आज भी मुझमें पल रहे हैं, कुछ मृत भी हो गए।
लेकिन क्या फर्क पड़ता है जीवन मजे में है।
जब जरुरतों की सीमाएं नहीं, तो भला प्रेम की क्यों हों?
प्रेम और जरुरतें फिर बदलने लगी हैं
समझ रहा हूँ अभी, फिर समझाउंगा तुम्हें
प्रेम की नई परिभाषा।।

हिसाब

आज हिसाब कर ही लेते हैं
तुम्हारे जाने से
क्या बदल गया, कुछ भी तो नहीं
बस तकलीफें नहीँ बांटती किसी से
तुम्हारी तरह कोई ध्यान नहीं रखता
समय बोझिल हो उठा है कटता ही नहीं
आंखें बेवजह पनीली हैं
इन्तजार करने की लत भी खत्म हो रही है
सांसे चल रही हैं धड़कनों की रफ्तार भी वही है
मैं ठीक हूं बस सपने मर गए
एक साथ ही तो छूटा, तकलीफ बड़ी है क्या?
बंद सी मुठ्ठी में खाली हाथ रह गया
मेरा तो कुछ गया नहीं लेकिन मुझमें मुझ सा बचा भी नहीं
बीतते वक्त के साथ मैं खर्च हो गयी
फिर भी इस सौदे में बड़ा घाटा हुआ तुम्हें
मेरे हिसाब का निष्कर्ष यही कह रहा है
भूल-चूक लेनी-देनी का हिसाब तुम्हीं कर लो
मैं जानती हूँ व्यवसायी तुम अच्छे हो
घाटे को मुनाफे में तब्दील कर लोगे।

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