सुधेश की रचनाएँ

गीत

जीवन का यथार्थ

जीवन के काले यथार्थ ने उज्ज्वल सपनों में भटकाया ।
जीवन अमृतघट से वंचित
उस की झलक मिली सपनों में
उसे छीन भागे दुश्मन जो
शामिल थे मेरे अपनों में ।
सपनों में ही ख़ुश हो लो बस ऊपर वाले ने समझाया ।
सपनों पर मेरा क्या क़ाबू
वे तो हैं बस मन की छलना
जीवन में ज्यों भटक रहा हूँ
वैसे ही सपनों में चलना ।
मंज़िल तो बस मृगतृष्णा है जीवन सन्ध्या ने बतलाया ।
नहीं नियति में मेरी श्रद्धा
भाग्यविधाता होगा कोई
सपने तो शीशे के घर हैं
उन्हें तोड़ मुस्काता कोई ।
मैं यथार्थ का पूजक चाहे जग ने मुझ को हिरण बनाया ।
ठोस जगत है जीवन माया
लेकिन मन का शीशा कोमल
पाषाणों की वर्षा होती
जीवन शीशमहल का जंगल ।
मरुथल में मृग भटक रहा है लेकिन जल का स़़ोत न पाया ।

आँख में आँसू दिये किसने

आँख में आँसू दिये किस ने
ये बिना कारण निकलते हैं ।
दुक्ख तो है हृदय की थाती
जोकि मैं ने जन्म से पाई
जब कहीं बदली उठी ग़म की
नयन में वर्षा उतर आई ।
पाँव मेरे जंगलों भटके
राज पथ पर क्यों फिसलते हैं ।
दुक्ख अपना ही लगा पर्वत
दूसरे का दुख लगा राई
सब बराबर हो गये लेकिन
जब प़लय की घड़ी लहराई ।
डूबते तैराक ही अक्सर
तमाशाई तो सँभलते हैं ।
स्वर्ग उतरा राजपथ पर है
नरक जनपथ हो गया अब तो
देश भक्षक खा रहे सब कुछ
देंश रक्षक सो गया अब तो ।
जन कभी हँसते कभी रोते
पर वही दुनिया बदलते हैं ।

मंज़िल पर पहुँचना चाहता है मन

मंज़िल पर पहुँचना चाहता है मन
क्या पता कब बैठ जाए तन।

ज़िन्दगी तो इक सफ़र से कम नहीं
अनमना चलना पड़ेगा पाँव को,
राही भटक ले सारे विश्व भर में
लौट आना ही पड़ेगा गाँव को।
संकल्प के ऊँचे क़िलों को जीतना है
इन हड्डियों में समाये कितनी थकन।
रोज़ सपने बिन बुलाये अतिथि से
आ धमकते द्वार पर मेरे सवेरे
उन को टूटना ही था अगर आख़िर
क्यों लगाये मेरे नयन में डेरे।
फिर भी देखता रंगीन सपने नित
क्या पता मन मीत से हो जाए मिल।
पर्वत चोटियाँ देखो बुलाती हैं
हरी घाटी गूंजती है गीत से
घृणा के ज्वाला मुखी नित उबलते हैं
सब दिलों को जीतना है प़ीत से।
मेरे शब्द करते ऊँची घोषणा यह
यहाँ होगा फिर मुहब्बत का चलन।

नींद बावरी

नींद बावरी क्यों आ जाती ।
जब आती सपने ले आती
जब जाती यादें रह जाती
दुनिया ने जो घाव दिये हैं
कोमल हाथों से सहलाती ।
निदिया सपने दोनों संगी
जिन को नहीं समय की तंगी
विधवा जो भी हुई कामना
सपने में वह रास रचाती ।
दिन में तो संग़़ाम छिड़ा है
कुछ बाहर कुछ मन में लड़ा है
नींद आवरण पीछे कोई
भोली सी सूरत मुस्काती ।
जीवन में जो नहीं मिला है
सपने में बन फूल खिला है
नीली आँखों वाली लड़की
रक्तिम गालों पर इतराती ।
नींद बावरी क्यों आ जाती

बेरी के कच्चे बेर 

मेरी बेरी के कच्चे बेर न तोड़ो
इन्हें धूप में और अभी कुछ पकने दो ।
बेमौसम कीकर या बेर नहीं खिलता
बरजोरी में शीश उठा काँटा मिलता
कच्चे कच्चे बेर अभी तो बच्चे हैं
इन को यौवन की गरमी में तपने दो ।
बेरी खिली अकेली जंगल जंगल में
मंगल ही मंगल है देखो जंगल में
क्वारे हाथ न पकड़ो कोमल किसलय के
रेखाएँ सतरंगी और उभरने दो ।
बेर नहीं हैं ये तो मद के प्याले हैं
मधु के कोष इन्हीं में घुलने वाले हैं
ठहरो ठहरो ऐसी भी क्या जल्दी है
नव यौवन के रंग में इन्हें सँवरने दो ।
मेरी बेरी के कच्चे बेर ……..।

पत्ते पत्ते पर शबनम

पत्ते पत्ते पर शबनम है
कली कली की आँखें नम हैं
क्या कोई खुल कर रोया है रात में ?
भीगी भीगी सुबह सुहानी
पल में शबनम उड़ जाएगी
कलियों के घूँघट में ख़ुश्बू
पवन हिंडोले चढ जाएगी ।
दिन का नाम दूसरा हलचल
बहरा कर देगा कोलाहल
ऐसे में क्या रक्खा है बात में !
बाहर काला धुँआ धुँआ है
कैसी जलन सिन्धु के तल में
सारा दिन तपता रहता है
आग छिपी सूरज के दिल में ।
घटा घटा छाई मस्ती है
बिजली भी चम चम हंसती है
लेकिन क्यों बादल रोया बरसात में?
संझा की आहट पर आख़िर
दिन के यौवन को ढलना है
स्नेह न हो दीपक में फिर भी
जीवन बाती को जलना है ।
जुगनू राह दिखाने आये
झिंगुर ने भी गीत सुनाए
चन्दा ग़ायब तारों की बारात में ।

सुबह शाम जब कोयल बोले

सुबह शाम जब कोयल बोले
सूखे कानों में रस घोले।

जंगल तो घटते जाते हैं
हरे पेड कटते जाते हैं
चिड़िया कोयल कहाँ बसेंगी
मेरे मन में चिन्ता डोले।

दुनिया कितने शोर भरी है
मारकाट है तना-तनी है
ऐसे में कितना अच्छा हो
मीत मिले धीरे से बोले।

चलो गाँव में जा बसते हैं
अपनी लघु दुनिया रचते हैं
जहाँ पड़ोसी सुबह शाम को
हिले-मिले कुछ बोले-टोले।

जहाँ लगे हों मेले-ठेले
नहीं किसी को कोई ठेले
ले हाथ-हाथ में चल सकें
कोई न रहे वहाँ अनबोले।

चले भी आओ धीरे-धीरे

चले भी आओ धीरे-धीरे।

नहीं कोई मुझे जल्दी है
पर ठहरी उमर चल दी है
मन की राधा तुम्हें ही पुकारे
अब आओ भी यमुना तीरे।

बीती सारी उमर खोजते ही
सोच कर सोचते-सोचते ही
मेरी झोली में पत्थर क्यों आए
मैं तो चुनता रहा मोती हीरे।

कभी ऐसी हवा भी चलेगी
जब कि मन की कली भी खिलेगी
धीरे-धीरे उड़ेगी ये ख़ुशबू
धीरे-धीरे चले समीरे।

और क्या चाहिए 

कैसी कोरी धूप खिली
कैसी सुबक कली खिली
जीवन में और क्या चाहिए।

ऊपर गगन चादर तनी
नीचे घास का बिछौना
मदिर-मदिर पवन बहा
फूल झूलता सलोना।
जीवन की बाटिका में
मधु रंगों के मेले में
मन को और क्या चाहिए।

नए मन प्राण मिले
धरती आसमान मिले
इतनी बडी दुनिया में
जीने के सौ सामान मिले।
सिन्धु में इक बून्द जैसी
नन्हीं-सी जान को
जीवन में और क्या चाहिए।

दिन में तो दौड़ धूप
जाना पड़ेगा काम को
सारे दिन मशीन बने
थक लौटना है शाम को ।
रात को लो मीठी नींद
सपने रंगीन देखो
जीवन में और क्या चाहिए।

मानव पंछी 

यह मानव तो बस पंछी है
यह इधर उड़ा वह उधर उड़ा।

जिसके पँखों में ताक़त है
वह दूर-दूर उड़-उड़ जाता
कोई इस डाली पर चिंहुका
कोई उस डाली पर गाता।
जिसके जितने ऊँचे सपने
वह उतनी उतनी दूर उड़ा।

उड़ने का मतलब नहीं मगर
घोंसला सदा को भूल गया
फूलों से डाल सजी देखी
वह उसे पकड कर झूल गया।
उन के आकाशी मधु फूलों का
चाहे पल में गन्ध उड़ा।

कोई धरती कोई नभ हो
इच्छा के पाँव थिरकते हैं
तन में हो ख़ून जवानी का
तो पागल हृदय मचलते हैं।
अगले पल ठोकर लगते ही
चाहे यौवन का नशा उड़ा ।

मन-मन में इच्छा के दीपक
आँखों में फूलों के सपने
बीच परायों के अक्सर ही
अजनबी सभी लगते अपने।
अपनों का देख परायापन
बेगानेपन का रेत झड़ा।

नए पेड पर नए घोंसले
सब पंछी बना लिया करते
नव-नव नील गगन में जैसे
अपने तारे चाँद निकलते।
धरती पर चलने वाला ही
नव आकाशों के बीच उड़ा।

ग़ज़ल

चलें काली आँधियाँ चलते चलो

चलें काली आँधियाँ चलते चलो
वक़्त लेगा इम्तहां चलते चलो।

अगर दिल की आग यों जलती रहे
कुल जहाँ हो कहकशां चलते चलो।

अगर यों ही रहे आवारा क़दम
मिल ही जाएगा मकाँ चलते चलो।

अगर ऊँची चाह की परवाज़ हो
सारी दुनिया गुलिस्ताँ चलते चलो।

अगर शिकवा शामिलेआदत हुआ
बदगुमां होगी ज़बां चलते चलो।

जहाँ कोई सुनने वाला ही न हो
दर्द रहने दो निहां चलते चलो।

ख़ल्क़ से हो मुहब्बत क्या बात है
इश्क़े बुतां चलते चलो।

अगर दिल में प्यार की हो रोशनी
चश्म कर देंगे बयां चलते चलो।

प्यार के दो चार अक्षर सीख लो
आँख बन जाए ज़बां चलते चलो।

अच्छी बातें कर रहे हैं लोग 

अच्छी बातें कर रहे हैं लोग
फिर भी खुद से डर रहे हैं लोग।

बड़ी बातें हैं बड़़े सिद्धान्त
देखिये क्या कर रहे हैं लोग।

नहीं जारी है यहाँ कोई जंग
हादसों में मर रहे हैं लोग।

गली में आग फैली है मगर
अपने अपने घर रहे हैं लोग।

पुलिस अपनी और अपनी फ़ौज
फिर भी क्यों थरथर रहे हैं लोग।

वजह बेहतर नहीं पाए ढ़ूंढ
लड़ते लड़ते मर रहे हैं लोग।

दोस्ती में दुश्मनी शामिल हमारी 

दोस्ती में दुश्मनी शामिल हमारी
हाय निकली ज़िन्दगी क़ातिल हमारी।

हुस्न की शमाअ जली है चाँदनी में
जलवा तेरा है मगर महफ़िल हमारी।

शमा परवाने वही हैं रोशनी भी
लूट लो आकर तुम्हीं महफ़िल हमारी।

आज दिल की बस्ती में पहरे लगे हैं
दर्द कैसे हो बयां मुश्किल हमारी।

ज़िन्दगी की शाम गहराने लगी है
एक मृगतृष्णा बनी मंज़िल हमारी।

कौन क़़ातिल है यहाँ कैसे कहूँ अब
जिस्म सालिम रूह है बिस्मिल हमारी।

सारा जगत अब ग़ाम है

सारा जगत अब ग़ाम है
बस आदमी इक नाम है।
भाषा कला सब वस्तुएँ
बस बेचना ही काम है।
जो वाम दक्षिण सा लगा
जो दाहिना था वाम है।
वह रूप हो या प्यार हो
अब तो सभी कुछ चाम है।
इन्सानियत अनमोल थी
हर चीज़ का अब दाम है।
तब गाँव मानो स्वर्ग था
अब नरक सारा ग़ाम है।
सब पुण्य लूटो तीर्थ का
बाज़ार चारों धाम है।
सब कुछ स्वचालित है यहाँ
कितना बड़ा आराम है।
दिखता कहीं है राम तो
आराम में ही राम है ।
मंज़िल मरुस्थल की नहर
पग चल रहा अविराम है।

कहनी जो तुम से बात अकेले में

कहनी जो तुम से बात अकेले में
मुझ से होगी वह बात न मेले में।

यह लाखों का मौसम है सावन का
कैसे इस को तोलूं मैं धेले में?

दुनिया बाज़ार हुई सच है फिर भी
यह प्यार कहाँ बिकता है ठेले में?

रक्तिम कपोल तेरे यह कहते हैं
अधरों ने छापी बात अकेले में।

सब सुन लें कैसे ऐसी ग़ज़ल कहूँ
जग के गूँगे बहरों के मेले में ।

दुख की बदली बिना कहे छा जाती है

दुख की बदली बिना कहे छा जाती है
पर चन्दा की कोर चमक मुस्काती है।
सुधा वर्षिणी शुभ़ चाँदनी खिली हुई
क्यों वियोग ज्वाला सी मुझे जलाती है।
ठूँठ नहीं खिल पाता सौ मधुमासों में
मरघट के पेड़ों पर कोयल गाती है।
मेरे रोगों की तो कोई दवा नहीं
मन खिलता जब तेरी चिट्ठी आती है।
तुम आये सारे दुखड़े काफ़ूर हुए
जाने पर क्यों याद तुम्हारी आती है।
जन्म दिवस या मरण दिवस हो गांधी का
दुनिया बस छुट्टी की ख़ुशी मनाती है।
जीवन नाम जागने सोने भर का है
ज़िन्दगी जगाती बस मौत सुलाती है।

ज़बां लफ्ज़-मुहब्बत है

ज़बां लफ्ज़े मुहब्बत है
दिलों में पर अदावत है।
न कोई रूठना मनना
यही तुम से शिकायत है।
कि बस रोज़ी कमाते सब
नहीं कोई हिकायत है।
मुहब्बत ही तो जन्नत है
अदावत दिन क़यामत है।
पढ़ो तुम बन्द आँखों से
लिखी दिल पै इबारत है।
ग़रीबों से जो हमदर्दी
यही सच्ची इबादत़ है।
कभी यों ग़ज़ल कह लेता
बड़ी उस की इनायत है।

इक्कीसवीं सदी है 

इक्कीसवीं सदी है इक्कीसवीं सदी है
अब नेकियों पै जीती हर रोज़ ही बदी है।

इस का न कोई चश्मा न गंगोत्री कहीं पर
बहती ही जा रही यह वक़्त की नदी है।

पलकें बिछा के बैठे हम उन के रास्ते में
आँखों में गुज़रा जो पल जैसे इक सदी है।

कैसे मैं आजकल की दुनिया में सफल होता
मेरी ख़ुदी के ऊपर अब मेरी बेख़ुदी है।

गांधी न बुद्ध गौतम न रिषभ का ज़माना
अब तो ख़ुदा से ऊँची इन्सान की ख़ुदी है।

उजड़ कर हर एक मेला रह गया

उजड़ कर हर एक मेला रह गया
अन्त में दर्शक अकेला रह गया।

सुखों की चाँदनी में तुम नहा लो
सीस पर कोई दुपहरी सह गया।

हर शमा के साथ इक परवाना है
मैं ही महफ़िल में अकेला रह गया।

हँसते हँसते आदमी रोने लगा
काल आ कर कान में क्या कह गया।

हर किसी के साथ में सारा जहाँ
भीड़ में मैं ही अकेला रह गया।

हवामहलों से हवा यह कह गई
एक दिन पुख़्ता क़िला भी ढह गया।

रोना है तो छुप कर रो

रोना है तो छुप कर रो
हँसना हो तो खुल कर हो।

यदि फूलों का प्रेमी है
शूलों की खेती मत बो।

सब की नफ़रत है मरना
जीना है तो सब का हो।

मरने पर दुनिया रोए
मरना तो बस, ऐसा हो।

मन का मैल मिटेगा, बस
आँखों के पानी से धो।

इतनी आफ़तों की आहटें हैं

              इतनी आफ़तों की आहटें हैं
लो आ गई अब तो आफ़तें हैँ।

कितनी मुश्किलें हैं ज़िन्दगी में
जीवन में न जितनी चाहतें हैँ।

किस को यहाँ बहकाते रहे हो
दोज़ख़ यहीं पर तो जन्नतें हैं।

जितनी आप को आसानियाँ हैं
उतनी सैंकड़ों को मुश्किलें हैं।

शायद आ गया महबूब मेरा
देखो पाँव की कुछ आहटें हैँ।

सारी रात कोई सो न पाया
योँ ही बिस्तरे में सलवटें हैँ।

इतनी रात को यह कौन आया
किस की द्वार पर ये दस्तकें हैँ।

भारत की क़िस्मत क्या बदली

भारत की क़िस्मत क्या बदली
छाई है निर्धनता की बदली।

सुनता तो हूँ जा देखूँगा
गाँवों में पहुँची है बिजली।

काले बादल कुछ तो भागे
चमकी तो है नभ में बिजली।

अब तो डूबा तैरूँगा ही तब
छोड़ेगी जब काली कम्बली।

उस से लड़ता ही आया हूँ
पर क्या मेरी क़िस्मत बदली?

जब से तुम आए हो प्यारे
तब से मेरी तबियत सँभली।

चले जा रहे हैं चले जा रहे हैं 

चले जा रहे हैं चले जा रहे हैं
नहीं पर पता है किधर जा रहे हैं।

किसी ने कहा है तरक़्क़ी यही है
तरक़्क़ी के मारे छले जा रहे हैं।

हमीं बुद्धिजीवी हमीं शकितशाली
जिन्हें गर्व इतना वे पछता रहे हैं।

दिलों में है नफ़रत मुहब्बत ज़बाँ पर
यही इक तराना सभी गा रहे हैं।

प्यार करो तो पाओ प्यार

प्यार करो तो पाओ प्यार
कोई न देता मुफ़्त उधार।

आँख बताती मन में चोर
प्यार न बिकता हाट बजार।

यार चले है शीश उठाय
मैं न चलूँ क्यों सीना उभार।

चाह तुम्हारी पाओ संसार
सीख लो तुम भी देना यार।

ख़ाक शऊर पै माँगो शराब
दिल में तमन्ना चढ़े ख़ुमार।

सारा जगत अब ग्राम है

सारा जगत अब ग्राम है
बस, आदमी इक नाम है।

भाषा कला सब वस्तुएँ
बस, बेचना ही काम है।

जो वाम दक्षिण-सा लगा
जो दाहिना था वाम है।

वह रूप हो या प्यार हो
अब तो सभी कुछ चाम है।

इंसानियत अनमोल थी
हर चीज़ का अब दाम है।

तब गाँव मानो स्वर्ग था
अब नरक सारा ग़ाम है।

सब पुण्य लूटो तीर्थ का
बाज़ार चारों धाम है।

सब कुछ स्वचालित है यहाँ
कितना बड़ा आराम है।

दिखता कहीं है राम तो
आराम में ही राम है।

मंज़िल मरुस्थल की नहर
पग चल रहा अविराम है।

इक्कीसवीं सदी चलो हम भी बदलते हैं 

इक्कीसवीं सदी चलो हम भी बदलते हैं
तो कुछ नए नए सही कपडे बदलते हैं।

बहके बहुत गए बहकाए कुछ हम भी
यों ही सही चलो बुढ़ापे में सँभलते हैं।

चलते रहे लिए उम्मीद कभी पहुँचेंगे
थक तो गए मगर कुछ और चलते हैं।

मुहब्बत-सा अगर कहीं था तो छिपा-सा
माशूक़ लेकिन आज के ज़्यादा मचलते हैं।

दिन से रात होती फ़िर दिन का उजाला
बदलो तुम भी यहाँ सभी मौसम बदलते हैं।

जब तक साँस चलती जीना पड़ेगा ही

जब तक साँस चलती जीना पड़ेगा ही
जीने के लिए श्रम भी करना पड़ेगा ही ।

अमरित खोजते फिर तो रहे हैं हम
जीवन ज़हर भी पर पीना पड़ेगा ही ।

जीने के लिए सामान तो हैं बहुत से
इक दिन मगर सब को मरना पड़ेगा ही ।

बैसाखी लिए क्या पर्वत चढ़ोगे तुम
अपने पाँव पर तो चलना पड़ेगा ही ।

मर-मर जी रहे हैं जग में हज़ारों ही
जीने के लिए पर मरना पड़ेगा ही ।

कविताएँ

नया एपिडैमिक

मुझे हर वस्तु चाहिये
पर वस्तु बनना पसन्द नहीं
हर वस्तु का उपभोक्ता हूँ
पर उपभोक्तावाद पसन्द नहीं
बाज़ार जाना ही पड़ता है
पर बाज़ारवाद पसन्द नहीं।
मैं गाँव मोहल्ले शहर
देश के बाहर
विश्व में मिलना चाहता हूँ
पर वैश्वीकरण पसन्द नहीं।
मैं जाति धर्म नस्ल से ऊपर उठ कर
उदाऱता की प़तिमूर्त्ति हूँ
पर उदारीकरण पसन्द नहीं
लेकिन मेरी पसन्द नापसन्द
का क्या मूल्य
जब तक वह सब की न हो।
पर आज वैश्वीकरण उदारीकरण बाज़ारीकरण
फल फूल रहे हैं
नए एपिडैमिक की तरह
बुद्धिजीवी चिल्ला के चुप हैं
क़ान्तिकारी क़ान्ति से पहले ग़ायब
किसी को कोई शिकायत नहीं
पर मुझे है
क्योंकि मैं हूँ आम आदमी।

पौधा

मैं सड़क के बीच का पौधा
किस ने लगाया
किस अभागे समय
आने वालों जाने वालों को
बस देखता हूँ
जगत भी आवागमन का सिलसिला
कारों तिपहिया वाहनों ट्रकों
से निकलते ज़़हर में साँस लेते
मेरे पत्ते काले पड़ गए हैं
खिली दो चार कलियों ने
फूल बनने से किया इंकार
फिर कहाँ फूलों की हँसी
कहाँ मादक गन्ध
मेरी सुरभि का कोष
लूटा सभ्यता की दौड़ ने
जैसे दिन दहाड़े लुट गया
सड़क का आदमी
सड़क के बीचों बीच।
मैं अगर खिलता
फैले कार्बन को सोख
आक्सीजन लुटाता
पर्यावरण सौन्दर्य में
कुछ वृद्धि करता
पर मैं अभागा
सड़क के बीचोंबीच
केवल मूक दर्शक
बन गया हूँ
जैसे सड़क का आदमी।

वसन्त का सपना 

सुना वसन्त आया
मैं रहा शिशिर से लड़ता
आँसू की गर्मी के बावजूद
हड्डियों में जा बैठी ठण्डक
कमर पर टँगा रहा निष्ठुर मौसम
वसन्त में सूखे पत्तों का ढेर
आवारा घूम रहा
आँखों में धूल झोंकती रही निष्ठुर पुरवा।
मेरी आँखों में फिर भी
वसन्त का सपना।

मौसमों का क़म ओर मानव
गर्मी बहुत है
पर प्यार की गर्मी नहीं है
रिश्ते सारे विश्व से हैं
उन की डोर में अपने नहीं क्यों
रिश्ते मात्र औपचारिक हुए।
समय के चक़ में
बरसात भी आई झमाझम
उस के साथ अश्रु वर्षा
आपदा की बाढ़ भी
मन की किश्तियों को
बहा ले जाएगी अतल में।
धरती खिसक कर
सूर्य से कुछ दूर होती
सर्दी शुरु
वक़्त पर कभी बेवक्त
हड्डियों को कँपाती
तब गर्मी याद आई
बिछुड़ी प़ेमिका सी।
ग़ीष्म वर्षा शरद के बाद
शिशिर का क़म
न जाने कब से चला
कब तक चलेगा।
प़कृति के मंच का
पात्र है मानव
हंसेगा कभी रोयेगा
जगत नाटक कब तक चलेगा
शायद समय के अन्त तक।

मानसर 

वक के साथ हंस
दिखा मानसर में
मैं ने वक से पूछा
“यह कैसे हुआ”
वक ने बका
“यह प़जातन्त्र है ”
हंस ने हँस कर कहा
“यह मिली जुली सरकार है”।

रोज की तरह 

रोज की तरह
रोज़ सोचता हूँ
पापड़ बहुत बेले
अब नहीं बेलूंगा
रोज़ सोचता हूँ
बहुत चबाये लोहे के चने
अब नहीं चाबूंगा
रोज़ सोचता हूँ
आजीवन दौड़ाया जिस ने
मृगतृष्णा के पीछे नहीं दौड़ूंगा।
शाम को घर लौटा
तो पत्नी ने कहा
एक पापड़ रह गया
इसे बेल देना
बच्चे ने फ़रमाइश की
लोहा चना खाऊँगा मैं भी
छोटू दौड़ कर बोला
स्पोर्ट शूज़ दिला दो
मैं भी दौड़ूंगा
अबोध बेटी बोल पड़ी
हम ने देखी है मिरग तिसना फ़िलम
अप भी देखोगे।
मैं खाना खा सो गया
सुबह उठ कर लगा सोचने
रोज़ की तरह।

चींटी

एक चींटी
सरकती-सरकती
चढ़ गई हिमालय

कुछ दिनों बाद
कोरी चमड़ी में खाज उठी
सोचा एवरेस्ट की सैर करूँ

एक बर्फ़ीला झौंका
थप्पड़-सा लगा

चींटी दबी-दबी सोच रही
चलो हिमालय की चोटी
तक तो पहुँची

किसी और दिन देखूँगी
एवरेस्ट।

मनुष्य देवता 

भारत की जनसंख्या थी जब
तैतीस करोड़
तब उतने ही थे देवता

आज सवा सौ करोड़ में
कितने देवता है ?
शायद कुछ तो होंगे ही

पर लगता है कि
आज अधिक हैं राक्षस
जैसे मुद्रा-राक्षस
अर्थात मुद्रा के पीछे राक्षस

ब्रह्मराक्षस
जो ब्रह्म हो के राक्षस

बुद्धि राक्षस
अर्थात बुद्धिजीवी वेष में राक्षस

पर उन के नाम मात्र आवरण हैं
आचरण राक्षसी

पर भारत सरकार कराती कभी-कभी
जनगणना ।

हम चींटी हैं

चींटी हैं
आप हैं पहाड़

झटक कर
झाड़ दो
कहीं जगह बना ही लेंगी
कहीं किसी गड्ढे में

समय आने पर
चढ़ेंगी पहाड़

पर अभी झटक कर झाड़ दो
हमें चींटी समझ।

भाग्य और नियति 

मैं भाग्यवादी नहीं

पर
मेरे साथ
जो अघटित घटा
या घट रहा है
या घटेगा
है मेरी नियति।

भाग्य तो धोखा है
हसीन ख़्वाब-सा
जिसे देखते-देखते
कई बचपन बुढ़ा गए
फिर भी अन्धी आँखों में है
आशा की ज्योति।

घटित और
अघटित के बीच
जीवन बीत रहा
घड़ी के पैन्डुलम-सा।

शब्द

कुछ शब्द
जैसे प्यार
करुणा
क्षमा

शब्द नहीं
हैं मन्त्र

मन्त्र नहीं
हैं ऋचाएँ
जिन्हें आँखें बोलती हैं
वाणी प्राण को छूती

ये शब्द
पेड़ की छाया
थके-हारे की शरण ।

पैबन्द

ज़िन्दगी के चीर में
जन्म से
बुढापे तक
कई पैबन्द लगते हैं

इतने
कि ज़िन्दगी ही
पैबन्द हो जाती

भोली आत्मा
ढकती है
आत्मा राम बेचारा
करे क्या ?

जो दिखता है

जो दिखता है
वह बिकता है

जो बिकता है
वह छपता है

जो छपता है गाया जाता
जो गाया जाता
इक दिन लोकगीत बन जाता है

जो लोकगीत
मन मन मे बस जाता है

जो मन में बसता
पत्थर भी प्रभु हो जाता है।

बडी बात होगी 

सब के सपने अलग-अलग
दौड़ भी अलग-अलग
फिर पति कैसे मिले पत्नी से
बेटा बाप से
बेटी कैसे पूछे माँ से कुछ गोपनीय
भाई किस से पूछे अपनी शंका
बहन किस के संग खेले?

मगर शाम को सब पंछी
घर आते थके-थके
खोजते अपने घोंसले
अगर रात को खाने की टेबिल पर
सब मिल रोटी खाएँ
आँखों से कुछ पूछें, कुछ उत्तर दें
बड़ी बात होगी
इस बेगाने बेरहम वक़्त में।

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