सुभाष राय की रचनाएँ

भगवान सोने जा रहे

धीम…धीम…धित्तान
धीम…धीम…धित्तान
सधे हुए स्वरों में संगीत
गूँज रहा था मन्दिर प्राँगण में
वशीकर, मोहक और उत्तेजक

स्वत: स्फूर्त भर रहा था
कुछ ही पल में झूमने लगा
मेरा माथ, फिर समूची देह

भगवान सोने जा रहे थे
वे थक जाते हैं पूरे दिन
देखते-देखते लोगों की पीड़ा
सुनते-सुनते रुदन, निवेदन

उन्होंने तय कर रखा है कि
जो कुछ भी होगा, होने देंगे
अन्याय, दुख, वेदना, छल, पाखण्ड
देखेंगे चुपचाप, बिना हँसे, बिना रोए
दखल नहीं देंगे कहीं, किसी पल
लगातार देखना, सुनना
बिना विचलित हुए
क्या कम मुश्किल है

कोई भूखा है, कोई बीमार
कोई ईर्ष्या से भरा हुआ
कोई क्रोध से, काम से
कोई नि:सन्तान, पापी, पाखण्डी, लोभी
अनहद महत्वाकाँक्षाओं के साथ
आए हैं हज़ारों-हज़ार लोग
किसी को रस्ते से हटाना है
किसी को शिखर से गिराना है
किसी को मुक़दमे में फँसाना है

भगवान किसे वर दें, किसे न दें
पक्षपात करना सम्भव नहीं
इसलिए ले ली जाती हैं सबकी अर्जियाँ
फ़ाइलें बनवा दीं जाती हैं सबकी
विश्वास रखो, इन्तज़ार करो
जिसने जैसा किया है, फल मिलेगा
इस जन्म में या उस जन्म में

भगवान भी थक जाते होंगे
काम करते-करते, नींद आती होगी
वे नियम-कानून के, टाइम के पाबन्द हैं
अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं
समय से खाते हैं, पीते हैं, सो जाते हैं

संगीत बज रहा था गर्भगृह में
वहाँ मौजूद लोगों के दिमागों में

तमाम लोग देखने आए थे भगवान का शयन
वे पक्का कर लेना चाहते थे कि भगवान सो गए
उन्हें बहुत काम था
भगवान जितनी देर सोए रहेंगे
उनके लिए उतना ही मुफ़ीद होगा
जब भगवान जगे हों
भक्त कोई भी ग़लत काम नहीं करता
पर उन्हें भी पूरा यक़ीन नहीं था
कि भगवान सोते हैं या नहीं
या सोए ही रहते हैं अहर्निश

भक्त वर्षों से आ रहे हैं
भगवान को नहलाने, धुलाने
भोग कराने, जगाने-सुलाने
कभी भगवान ने उनसे नहीं कहा
यार, आज मैं ख़ुद खा-पी लूँगा
तुम आज मेरे लिए कुछ न करो

जब कभी भगदड़ हुई, लोग कुचल कर मरे
तब भी उन्होंने भक्तों को आगाह नहीं किया
कि सीढ़ियों पर सम्भल कर चलो, भीड़ न लगाओ
वे टूट सकतीं हैं वज़न बढ़ने पर
अफ़वाह उड़ाने वालों को भी कभी न रोका, न टोका
लाशों के पास उनके बचे हुए सगे-सम्बन्धी
जब रो रहे थे दहाड़ मार कर
तब भी भगवान को कोई दु:ख नहीं था
वहाँ कुछ लोग भीख माँग रहे थे
उन्हें भरोसा था कि भगवान उनके लिए
कुछ न कुछ ज़रूर करेगा
कई तो इसी विश्वास के साथ
भीख माँगते-माँगते मर चुके थे
कुछ पाकेटमार भी थे
भीड़ में शामिल, चुपचाप और सजग
वे जानते थे कि भगवान समदर्शी है
उन पर भी कृपा करेगा ही
पीली धोती बाँध, जनेऊ धरे, चुटियावान
बहुत सारे दूत घूम रहे थे चारों ओर
उनके पास तो सीधे भगवान तक
पहुँचाने का टिकट था…
साक्षात दर्शन कराऊँगा
महामहिम के सामने ले जाऊँगा
उनके हाथ में अर्ज़ी दिलवाऊँगा
सोचिए मत, सोचने से
बनते काम बिगड़ जाते हैं
फ़ैसला कीजिए, जो मन हो दीजिएगा
भाग्य से ही द्वार खुलता है
आप आए नहीं हैं, भगवान ने आप को बुलाया है

वहाँ नर्मदा भी थीं
रौंदी जाती हुई असंख्य नौकाओं की
घरघराती यन्त्र चरखियों से
दम फूल रहा था उनका
मोटरों से निकलते काले धुएँ से
भक्त उनका पेट फाड़ देने को तत्पर थे
बेल-पत्र, फूल-फल, दीप, नैवेद्य समेत
पूजा का सारा कचरा
उनके पवित्र जल में फेंकते हुए

वे थर-थर काँप रहीं थीं
उनके शरीर से दुर्गन्ध आ रही थी
उनकी चीख़ कहीं उनके गले में अटक गई थी
उनका निर्मल स्फटिक जैसा तन
झुलस कर काला पड़ गया था
उनका सीना चीरती हुई दिन भर
दौड़ रहीं थीं यन्त्र चालित निर्मम नौकाएँ

भगवान तक नहीं पहुँच रही थी नदी की वेदना
उन्हें गर्भगृह में क़ैद कर लिया गया था
या उन्होंने ख़ुद ही चुना था बन्दी की तरह जीना
वे प्रशस्ति वाचकों से घिरे थे

किसी ने नहीं देखा कभी भगवान को
उनकी नींद हराम करने वाले चोरों, उचक्कों
पण्डों और भक्तों को डपटते हुए
सब जानते थे कि जब तक भगवान है
उन्हें कुछ भी करने की छूट है

बहुत भीड़ है भगवान के दरबार में
टिकट लगा है, आइ० डी० माँगी जा रही है
डर है बाहर के लोगों से
उनसे नहीं जो पुराना पाप धोने आए हैं
ताकि अनाचार का नया खाता खोल सकें
उनसे नहीं जो पण्डे को एक नोट थमाकर
पंक्ति से आगे आ गए हैं
उनसे नहीं जो आरती की
थाली में पैसे जमा कर रहे हैं
उनसे भी नहीं जो खुल्लम-खुल्ला जेब
काट रहे हैं भगवान के नाम पर

मैंने उस दिन भगवान को बहुत पुकारा
उँगली के इशारे से बताया
कितने ठग, कितने वंचक हैं उनके आजू-बाज़ू
मैंने बताया कि तुम्हारा डमरू बिक रहा है बाज़ार में
तुम्हारे त्रिशूल को इस्तेमाल कर रहे हत्यारे
तुम्हारी जटाओं से निकली गंगा
सूख गई है, गन्दी हो गई है
तुम्हारी तीसरी आँख से भर गया है कीचड़
बिना गरल पिए ही होश खो चुके हो तुम

मैंने पूछा कई बार, क्या कर रहे हो
कुछ तो बोलो, तुम क्यों हो
पर कोई आवाज़ नहीं आई
जो कुछ करता है, ज़िन्दा रहता है
जो कुछ नहीं करता, मर जाता है

मैंने बार-बार मिन्नत की सोना मत
पर वह फिर सो गया
शायद सोया ही था वह
शायद जागा ही नहीं वह
अपनी प्रथम कल्पना के बाद से

संगीत तेज़ हो गया था, सब झूम रहे थे
मैं संगीत में डूबने लगा, सब के सब डूबने लगे
धीम-धीम धित्तान, धीम-धीम धित्तान

उड़ान

जब भी मैं आसमान की ओर देखता हूँ
चिड़ियों की उड़ान उदास कर देती है
अपने कन्धों पर महसूस करता हूँ
झड़ गए पँखों के निशान

गहरे घाव की तरह

दर्द उभरता है और निगल जाता है मुझे
नहीं, अब उड़ नहीं सकता मैं
आसमान से धरती को नहीं देख सकता
एक साथ, एक नज़र में
गोते नहीं लगा सकता
सितारों के नीचे, ज़मीन के ऊपर

ख़ुद को समेटकर
चिड़ियों के पीछे नहीं भाग सकता
उनके घोंसलों तक
उनके बच्चों को माँ की तरह
स्पर्श नहीं कर सकता

मुझे याद है धरती पर बिखरे
सुख-सौन्दर्य के लालच में
मैंने ही अपने पँख कतर डाले
बान्ध लिया अपने आप को
मुरझा जाने वाले फूलों की पँखड़ियों से
समय के साथ ख़त्म हो जाने वाली
ख़ुशबू की बेड़ियों से
मेरे मन में धरती पर उगने की
ऐसी आकाँक्षा जगी
कि मैं रोक नहीं सका अपने आप को
उगा तो पर अब उड़ान कहाँ

पेड़ हो गया जबसे
सोचता हूँ उड़ान से लौटकर
चिड़ियों का झुण्ड
मेरी हज़ार बाँहों पर
बैठा करे आपस में बतियाते हुए
मेरी पत्तियों की आड़ में घोंसले बनाए
सो जाए रोज़ सुबह होने तक
ताकि मैं भी थोड़ी देर के लिए ही सही
पेड़ से चिड़िया में बदल सकूँ

मेरा परिचय

मेरा परिचय
उन सबका परिचय है
जो सोए नहीं हैं जनम के बाद
लपट है जिनके भीतर

जिसे छू दें भस्म कर दें
जिस पर हाथ रख दें
वह पिघलकर बहने लगे

चल पड़ें तो
ज़मीन अगिया जाए
रास्ते की धूल
धुआँ बन जाए

बोलें तो बिजलियाँ कड़क उट्ठें
लिखें तो शब्द-शब्द
सोए दिमागों पर
अग्निवाण की तरह बरसें

जो ख़ुद से टकरा रहे हों
टुकड़े-टुकड़े हो रहे हों
जो धधकते रहते हों
पृथ्वी के गर्भ की तरह
ज्वालामुखी बनने को आतुर
लावा से नया रचने को बेचैन
सूर्य को अपने भीतर समेटे
खौलते हुए

मेरा परिचय
उन अनगिनत लोगों
का परिचय है
जो मेरी ही तरह
उबल रहे हैं लगातार

जो दीवारों में
चुने जाने से ख़ुश हैं
उनसे मुझे कुछ नहीं कहना
जो मुर्दों की मानिन्द
घर से निकलते हैं
बाज़ारों में ख़रीदारी करते हैं
और ख़ुद ख़रीदे हुए
सामान में बदल जाते हैं
वापस घर लौटकर
सजे हए कफ़न में
क़ैद हो जाते हैं चुपचाप

जो सिक्कों की खनक
पर बिक जाते हैं
चुराई हुई ख़ुशी में
खो जाते हैं

वे टूट सकते हैं आसानी से
उनकी उँगलियाँ
कटार नहीं बन सकतीं
उनके हाथ लाठियों में
नहीं बदल सकते

वे रोटियाँ नहीं खाते
रोटियाँ उन्हें खाती हैं
ऐसे मुर्दों पर गँवाने के लिए
वक़्त नहीं है मेरे पास

मैं अपने जैसे गिने-चुने
लोगों को ढूँढ़ रहा हूँ
मुझे आग बोनी है
और अँगारे उगाने हैं

मेरा परिचय
उन सबका परिचय है
जो एक दूसरे को जाने बिना
आग के इस खेल में शरीक हैं

लुकाठा लिए मैं
बाज़ार में खड़ा हूँ
जो अपना घर
फूँक सकते हों
भीड़ से अलग हट जाएँ
मेरे साथ आ जाएँ

शब्द

शब्द हँसते नहीं
शब्द रोते भी नहीं
उनकी दहाड़
कहीं ग़ुम हो गई है
धार कुन्द हो गई है

मैंने शब्दों से कहा,
चल कर दिखाओ
वे लड़खड़ा गए
उनकी साँस उखड़ने लगी
वे ज़मीन पर पसर गए

मैंने शब्दों से पूछा,
पँख का मतलब
बता सकते हो
वे फड़फड़ा कर गिर पड़े
घिसटने लगे

मैंने पूरी ताक़त से
बोलना चाहा
पर वे ज़ुबान पर नहीं आए
हिम्मत नहीं रही उनमें

मैंने शब्दों को तलवार
के रूप में ढालना चाहा
वे बह गए पिघलकर
बदशक़्ल हो गए

मैंने उन्हें बजाना चाहा
ताकि कर सकूँ मुनादी
जगा सकूँ सबको
उन सन्दिग्ध लोगों के ख़िलाफ़
जो कई बार रात में
देखे गए अपने शिकार तलाशते
पर काम नहीं आ सके शब्द
एक ही वार में फट गए
ढोल की तरह बेकार गए

मैं फिर भी हताश नहीं हुआ
मैंने शब्दों को गिटार
बनाने की कोशिश की
सोचा, शायद संगीत पैदा हो
और मैं सब कुछ भूल जाऊँ
याद न रहे ठण्डी पड़ती
दिलों की आग, बेचैनी, हताशा
याद न रहे जूलूस, नारे और
लाठीचार्ज के हालात
पर शब्दों ने साथ नहीं दिया
मात्राएँ बिखर गईं
उँगली फिरते ही
टूट गए गिटार के तार

मैं हैरान हूँ, परेशान नहीं
मैं जानता हूँ शब्दों के ख़िलाफ़
हुईं हैं साज़िशें
उनके अर्थों से
की गई है लगातार छेड़छाड़
मैं जानता हूँ उन्हें भी
जो शब्दों को कमज़ोर, कायर
डरपोंक बनाने में जुटे हैं
जो शब्दों को ग़ुलाम
बनाना चाहते हैं
उन्हें पालतू जानवरों की तरह
बान्धकर रखना चाहते हैं

मुझे शब्दों के चुप हो जाने की
वजह पता है
मैं चुप नहीं रह सकता
मुझे अपनी पहचान खो चुके
शब्दों को नया अर्थ देना है
जो भी बोलना चाहते हैं

उन सबको आना होगा सड़क पर
अपने समूचे दर्द के साथ
निर्मम यातना के बावजूद
निकलना होगा दहकते रास्तों पर
शब्दों की ज़िन्दगी ख़तरे में है
हम सबको ख़तरे
बाँटने ही होंगे

सागर

सागर मुझे अपने
सीने पर बिठाए रखता है
अपनी लहरों के फन पर

उसने ख़ुद ही उठा लिया था मुझे
तट पर अकेला पाकर
मैं ढूँढ़ रहा था शब्द
उसकी गहराई के लिए
बार-बार चट्टानों से टकराकर
फेन सी पसरती उसकी
लहरों के लिए
जीवन के प्रति उसकी
अनन्त आत्मीयता के लिए

मैं लौटना नहीं चाहता था
फिर अपने शहर में
लहरें बढ़ती तो छोड़ देता
ख़ुद को उनके साथ
फेंक देतीं वे मुझे
खुरदरी, नुकीली चट्टानों पर
लौटतीं तो दौड़ पड़ता
उनके पीछे-पीछे

मछलियाँ भी होतीं
मेरे साथ इस खेल में
बिल्कुल मेरे वहाँ होने से अनजान
भीगी रेत पर फिसलती हुईं

अच्छा लगता मुझे
समुद्र के साथ खेलना
डर नहीं लगता
कि वह मुझे डुबो सकता है
वह मुझे पत्थरों पर
पटक कर मार सकता है
मुझे झोंक सकता है
भूखी शार्क के जबड़े में

मैं सम्मोहित-सा
देखता रहता ज़मीन पर
बिछे आसमान को
हवा के झोंकों के साथ
बहते, लहराते हुए
सुबह उसके गर्भ से
निकलता ठण्डा सूरज
और दिन भर जलकर
अपने ही ताप से व्याकुल
थका हुआ बेचारा
अपना रथ छोड़
सागर में उतर जाता चुपचाप

सागर के पास होकर
सागर ही हो जाता मैं
विशाल और असीम
मेरे भीतर होती लहरें
सीपियाँ, मछलियाँ, मूँगे
और वह सब कुछ
जो डूब गया इस
अप्रतिहत जलराशि में
समय के किसी अन्तराल में

और तब सागर दहाड़ता
मेरी ही आवाज़ में
सुनामी आती मेरे भीतर
चक्रवात की तरह
गरज़ने लगता मेरा मन
तट से दूर तक की
ज़मीन को निगलने
की चाह से भरपूर
हवाओं की बाँह थामे
उछलता आसमान की ओर
ज्वालामुखी का रक्ततप्त
लावा बहने लगता मेरी नसों में
खदबदाते ख़ून की तरह
धड़कने लगता मैं
समूचा हृदय बनकर

ख़ामोश होता तो
सुनता मुझे अपने भीतर
पूछता नहीं मुझसे
मेरे होने का मतलब
उसे पता होता
मुझे कुछ नहीं चाहिए
सागर से, उसकी सत्ता से
उसकी अपराजेयता से

सागर को आख़िर क्या
चाहिए सागर से

शहर में जंगल

जंगल चुपचाप

आ गया है शहर तक
आदमी के दिल में
धँसी अपनी जड़ों पर
खड़ा, ख़ून चूसता
निरंकुश फैलता चारों ओर

रास्ते नहीं सूझते
आदमी की बस्तियों में
संकरी होती पगडंडियाँ
खो जाती हैं दीवारों में
कँक्रीट में जमे पुतले
नजर आते हैं इधर-उधर
दौड़ते, भागते, हाँफते हुए

गीदड़ भी हैं यहाँ
वे भाग आए शहरों में
इसलिए नहीं कि
उनकी मौत आई थी
वे मस्त और ज़िंदा हैं यहाँ
उन्होंने अपने नाखून
और बढ़ा लिए हैं
दांत तेज कर लिए हैं
और मरे हुए शेरों की
खालें ओढ़ लीं हैं
वे गुर्राते नहीं
दहाड़ते भी नहीं
चुपचाप धावा बोलते हैं
और चीथड़े कर देते हैं
भूल से भी अकेले
पड़ गये लोगों के
खून इतना मिल जाता है
कि वे भूल चुके हैं
माँस का स्वाद
उन्होंने भुला दिया है
अपना हुआं-हुआं

शेरों से खाली
हो गया है जंगल
या शेर भी गीदड़ों की
शक्ल में ढल गए हैं

भौंकने की आवाज़ें
भी सुनाई पड़ती हैं
घरों में, दफ़्तरों में
गलियों में, सड़कों पर
सीख लिया सबने
हर किसी पर
गुर्राना, दाँत कटकटाना
सबकी पीठ पर
उग आई है पूँछ
लाख जतन करने पर
भी छिपती नहीं
जब भी ज़रूरी होता है
मालिक की खुशी
में हिलती है दुम
और जब भी हिलती है
जाँघिए से बाहर आ जाती है

बड़ी मछलियाँ
खा रही हैं
छोटी मछलियों को
जाल जो स्वप्नजीवी
पुरखों ने बुने थे
छोटे पड़ गए हैं
या कुतर दिये गये हैं
उसमें आकर भी
निकल जाते हैं
लोगों की हड्डियाँ तक
चबा जाने वाले गिद्ध

चहचहाने वाले परिंदे
न जाने कहां खो गए हैं
सुग्गे, तोते, गौरैयां
कहां नज़र आतीं अब

आदमी के भीतर
उग आया है
एक भयानक जंगल
सांप जैसी लपलपाती
रहती है उसकी जीभ
शिकार की तलाश में
काले चमगादड़ों की तरह
उसके पैने दांत
मौका पाकर
किसी की भी
नसों में उतर जाते हैं
और चुपचाप पीने

लगते हैं उसका खून

जंगल शहर में आकर
और हरा-भरा हो गया है
पसर रहा है आदमी की
शिराओं में, धमनियों में
नाड़ियों में, दिमागों में

सुनो जंगल का
नीरव अट्टहास
बहरे नहीं हो गए हो
तो कान लगाकर सुनो
यह ख़ामोश आहट है
लूले-लंगड़े गणतंत्र को
चीरकर उगते
भयानक, खूँखार
जंगलराज की

अजनबी आवाज़ें 

शहर में घुस आए हैं
कुछ अजनबी लोग

हलचल है चौराहों पर
कानाफूसी चल रही है
दुकानों पर, दालानों में
चौपालों पर, जगह-जगह

घरों की खिड़कियाँ
दिन में भी बंद
रहती हैं आजकल
दरवाज़ों पर
ताले लटक जाते हैं
या भीतर से साँकल
चढ़ी होती है
बिजली कि घंटियों के तार
खोल देते हैं लोग
ताकि आने वाला आवाज़ दे
पहचाना जा सके
अजनबी आवाज़ों पर नहीं
खुलते हैं दरवाज़े

पार्कों में सन्नाटा है
बच्चे भी नहीं आते
अब वहाँ खेलने
पेड़ अकेले पड़ गए हैं
दिन भर ठकुआए
खड़े रहते हैं
शाम को भी अब
उनकी जड़ों के पास
चौपाल नहीं जमती

लोगो ने फूलों को
पानी देना बंद कर दिया है
उनमें कलियाँ आती हैं
पर खिल नहीं पातीं
न जाने कब, कौन
आकर उन्हें मसल जाता है
तितलियाँ दिखती ही नहीं
उनके टूटे हुए पंख
उड़ते रहते हैं इधर-उधर
डालियों पर लटके
शहद के खतोने
सूख गए हैं
जा चुकीं हैं
मक्खियाँ कहीं और

नदी के पानी में
अजीब सी थरथराहट है
वह परेशान है
अब उसके किनारे नहीं आती
झुंड की झुंड गायें
अपनी प्यास बुझाने
धूप से व्याकुल
चरवाहे नहीं आते
तट पर पानी पीने

कोई रोज़ आधी रात बाद
चुपके से आता है और
लाठियाँ पीटता है पानी पर
छुरे पर धार लगाता है
तलवारें तेज़ करता है
पास पड़ीं खोपड़ियाँ
टकराता, बजाता है

बच्चे छुट्टियाँ नहीं मना पाते
डरे हुए माँ-बाप की
सलाहें बंद कमरों में
कैद कर देती हैं उन्हें अकेले
स्कूल भी जाते हैं डरे-सहमे
जेल जैसा लगता है स्कूल
मध्यांतर में भी
बाहर नहीं निकलते
तरसते हैं आइस्क्रीम के लिए

सुबह-सुबह लोग
टूट पड़ते हैं अख़बारों पर
जानना चाहते हैं
क्या हुआ रात में
कोई घर तो नहीं लुटा
कोई हत्यारों के हाथ
मारा तो नहीं गया
कोई बच्चा तो नहीं
ग़ायब हुआ

अफ़वाहें उड़ती हैं
गर्म आँधियों की तरह
जो नहीं हुआ होता
वह भी सरसराता रहता है
कानाफूसियो में
विश्वास नहीं होता
मगर अविश्वास भी कैसे हो

गला कटा धड़ मिला है
रामगंज की पुलिया पर
दाँतों के निशान हैं
युवती के जिस्म पर
मोतीपुर के कुछ मकानों पर
लाल हथेलियों की
छाप देखी गई
बिल्कुल वैसी ही जैसी
लुटने के कुछ ही दिन पहले
सदर के कुछ घरों पर
देखी गई थी
मज़ार के पास
दो अलग-अलग
हाथों के कटे पंजे मिले हैं
एक पर राम गुदा हुआ है
दूसरे पर रहीम

लोग बेहद डरे हुए हैं
किचेन में काम करती
औरत को दिखती हैं
छायाएँ बाहर टहलती हुई
रात को छत पर
किसी के चलने की
ठक-ठक सुनाई पड़ती है
बाहर सड़क पर
कभी-कभी बहुत तेज़
भूँकते हैं कुत्ते
हवा से खड़कती हैं कुंडियाँ
अधजगी आँखें फैल जाती हैं
एक पल के लिए
इग्जास्ट फैन के पीछे
अपने घोंसले में
सोया कबूतर
फड़फड़ाता है पंख
और डरा देता है
लरजती शाम
काँपती सुबह
झनझनाती रात
इसी तरह दिन गुज़र रहा है
आदमी डर रहा है
मर रहा है

आदमी होना

उस पर इलजाम थे
कि वह झूठ नहीं बोलता
कि वह अक्सर
ख़ामोश रहता है

उसे देखने को
लालायित थी भीड़
बहुत दिनों से कोई
दिखा नहीं था इस तरह
सच पर अडिग

वह बिल्कुल दूसरे
आदमियों जैसा ही था
हाथ, कान, आँख
सब औरों की ही तरह

भीड़ में घबराहट थी
कुछ उसे पागल
ठहरा रहे थे..
आत्महत्या पर उतारू है
बेवकूफ़, मारा जाएगा

कुछ को याद आ रहीं थीं
ऐसे मरजीवों की कहानियाँ…
एक और आदमी
पगलाया हुआ
निकल आया था सड़क पर
सच की सलीब पर
ख़ुद को टांगे
हिम्मत से बढ़ा था
पर उसकी हिम्मत से बड़ा
निकला था एक खंजर
लपलपाता हुआ
उसके सीने में उतर गया
वह सच बोलते-बोलते रह गया

कुछ युवक भी थे
भीड़ में से उचकते हुए
उस आदमी तक पहुँचने
उसे छू लेने को व्याकुल
उन्होंने पढ़ा था
झूठ हमेशा हारता है
उन्हें अभी तय करना था
सच की राह चुनें या नहीं

जैसे ही वह बोलने
को तैयार हुआ
चारो ओर सन्नाटा छा गया
वह बोलता तो
भूख और मौत की नींव पर
खड़ी की गईं इमारतें
भरभराकर ढह जातीं
निरपराधों के खून से
सींचकर उगाया गया
ऐश्वर्य द्वीप डूबने लगता
वह बोलता तो
आदमी के चेहरे लगाए
भेड़िये पहचान लिए जाते

पर हर बार की तरह
इस बार भी वही हुआ
उसके इशारे से पहले ही
एक सनसनाती हुई गोली
उसके शब्दों को
वेधती हुई निकल गई
वह पहाड़ की तरह गिरा
सच को सम्हाले

वह मर गया
पर सच जिंदा था
कल फिर कोई निकलेगा
आदमी होने का
एलान करते हुए
सच उजागर होने तक
बार-बार मरकर भी
उठ खड़ा होगा मरजीवा

कहाँ है आदमी

आदमी है कहाँ, किधर
कोई बताएगा मुझे
चुप क्यों हैं सब के सब
कोई बोलता क्यों नहीं

अपने बच्चों का ध्यान
तो जानवर भी रखते हैं
अगर तुमने भी इतना ही
सीखा अभी तक
तो तुम उनसे अलग कैसे

भैंसे बंधती है
जिसके खूँटे से
दूध देती हैं उसे
तुम भी अगर किसी के
खूँटे से बंध गए हो
क्योंकि वह तुम्हें
डाल देता है चारा
जो वह चबा नहीं पाता
और बदले में दूहता
रहता है तुम्हें
तो तुम पालतू से
ज़्यादा क्या समझते हो
अपने-आप को
कैसे मान लूँ कि तुम
अब कभी दहाड़ सकोगे
निर्भय वनराज की तरह

जिनकी मूँछे बड़ी हैं
जिनकी आवाज़ में
कुछ भी कर गुज़रने का
झूठा ही सही पर
सधा हुआ दर्प है
जो बड़ा से बड़ा अपराध
करके भी हथकड़ियों में
कभी नहीं बंधते
जिनके लिए थाने
घर की चौपाल की तरह हैं
जिन्हें अपनी कुर्सियाँ सौंप
देते हैं सरकारी अफ़सरान
डर से ही सही
जिनका प्रवचन
सभी लगाते हैं सर-माथे
जिनकी ग़ुलामी बजाती हैं
ग़ैरकानूनी बंदूकें

मैंने देखा है
बार-बार उनके दरबार में
दुम हिलाते हुए
पूँछ दबाकर करुणा की
भीख माँगते हुए
निहुरे, पाँवों में गिरे हुए
चारणों की जमात को
गिरवी रख चुके ख़ुद को
निजता से हीन, दीन
मिमियाते, घिघियाते
हुक्म बजाते

इन्हें आदमियों में आख़िर
क्यों गिना जाए
सिर्फ़ इसलिए कि ये
आदमी जैसे दिखते हैं
दो पाँवों पर चलते हैं
कभी-कभी मनुष्य की
आवाज़ निकाल लेते हैं

इन मरे हुओं के हुजूम में
मैं ढूँढ रहा हूं उन्हें
जिनमें आदमीयत बाकी है
कोई बताएगा इनमें
वो कहाँ है, जिसने
बचाया था मासूम लड़की को
ज़िस्मफ़रोशों के चंगुल से
वो कहाँ है जिसने
पड़ोसी के घर में घुसे
आतंकवादी को अपनी
भुजाओं में जकड़ लिया था
और उसकी बंदूक मरोड़ दी थी
और वो कहाँ है
जो अपाहिज हो गया
बलात्कारियों से जूझते हुए
जिसने गाँव की
इज़्ज़त से खेलने वाले
बदमाश को बाइज़्ज़त जमानत
मिलते ही कोर्ट के बाहर
ढेर कर दिया था

मुझे उन कायरों की
कोई दरकार नहीं है
जो सड़क पर लहूलुहान पड़े
बच्चे के पास से गुज़र जाते हैं
फिर भी आँखें पसीजतीं नहीं
मुझे उन हतवीर्यों से क्या लेना
जो चाकू हाथ में लहराते
मुट्ठी भर बदमाशों को
ट्रेन का पूरा डिब्बा लूटते देखते हैं
और इस झूठी आस में
कि शायद वे लुटने से बच जाएँ
अपनी बारी आने तक
जुबान और हाथ
दोनों बंद रखते हैं
मुझे उन बिके हुए लोगों
की भी ज़रूरत नहीं है
जो चोरों, बेइमानों का
रात-दिन गुणगान करते हैं
सिर्फ़फ इसलिए की उन्हें
सरकारी ठेके मिलते रहें
कमीशन बनता रहे

देखो, पड़ताल करो
कोई तो ज़िंदा बचा होगा
किसी की तो साँस
चल रही होगी
कोई तो अपने
लहूलुहान पाँवों पर
बार-बार खड़ा होने की
कोशिश कर रहा होगा
कोई तो अनजान डरे हुए
बच्चे को बाँहों के
घेरे में संभाले
जूझा होगा अपहर्ताओं से
ढंूढो शायद कोई
मंजुनाथ घायल पड़ा हो
कोई सत्येंद्र तुम्हारे आने के
इंतज़ार में हो

प्रेम अपनी आंखों में सबका सपना

तुम बताओगे प्रेम क्या है?
देह की मादक गहराई में उतर जाने
का पागल उन्माद या कुछ और
तप्त अधरों पर अधरों के ठहर जाने
के बाद की खोज है या कुछ और
मांसल शिखरों पर फिरती ऊंगलियों
से उठती चिनगारी भर या कुछ और
पल भर की मनमोहक झनझनाहट
का लिजलिजा स्खलन या कुछ और

तुम चुप क्यों हो, कुछ बताओ, बोलो
अगर प्रेम किया है कभी तो कैसा लगा
तुम प्रेम के बाद भी बचे रह गये या नहीं
प्रेम के बाद कोई और चाह बची या नहीं
एक बार पूरा पा लेने के बाद भी बार-बार
पाने की उत्कंठा तो शेष नहीं रही

अगर तुमने सचमुच प्रेम किया है
तो मैं जानता हूं तुम चुप रहोगे,
बोलोगे नहीं, बोल ही नहीं पाओगे
ना, तुम सुनोगे ही नहीं मेरा सवाल

प्रेम देह को मार देता है
आंखों का अनंत आकाश एक
दहकते फूल में बदल जाता है
पूरा आकाश ही खिल उठता है
पलकें गिरती नहीं, उठतीं नहीं
कानों में गूंजती है वीणा महामौन की
और कुछ भी सुनायी नहीं पड़ता
फिर कमल हो या गुलाब या गुलदाऊदी
न दिखते हैं, न महंकते हैं, न भाते हैं
गंध में बदल जाता है पूरा अस्तित्व

देह जीते हुए मर जाता है
तो प्रेम जन्म लेता है
जब किसी में उतर जाता है प्रेम
वह जीता ही नहीं अपने लिये
वह रहता ही नहीं अपने लिये

कभी ऐसा हुआ क्या तुम्हारे साथ
याद करो, पीछे मुड़कर देखो
कभी करुणा बही क्या आंखों से
कभी मन हुआ भूख से बिलबिलाते
बच्चे को गोंद में उठा लेने का
सबके दुख-दर्द में शरीक होने का
दूसरों के लिये जीवन लुटा देने का
नहीं हुआ तो सच मानो
तुमने प्रेम नहीं किया कभी
तुम प्रेम की परिभाषाएं चाहे
जितनी कर लो, जितनी अच्छी कर लो
पर प्रेम का अर्थ नहीं कर सकते

प्रेम खुद को मारकर सबमें जी उठना है
प्रेम अपनी आंखों में सबका सपना है

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