सुभाष शर्मा की रचनाएँ

मेम साहब का कुत्ता

किसने काटा ?
साहब ने ?
— नहीं
मेम साहब ने ?
— नहीं,
तो मेम साहब के कुत्ते ने जरूर काटा होगा ।
क्यों, थाने में रपट लिखाई ?
नहीं, दारोगा उसका
चाचा लगता है ।
जहाँ-जहाँ जाओगे
घाव पर नमक पाओगे
कहाँ चले ? अदालत ?
उंह !
सुनो, अदालत के दरवाजे पर
लटकता है कानून का ताला
जिसकी कुंजी है वकीलों
की काली जेब में
और उधर जज साहब
हमें देखते हैं बिना आँखों के
वकीलों की आँखों के सहारे ।
क्या दोगे जवाब
इन सवालों का —
तुमने साफ-सुथरे कुत्ते के
मुँह में अपने मैले-कुचैले
हाथ-पैर क्यों डाले ?
क्या कुत्ते की इजाजत ली थी ?
कहीं उसे छूत की बीमारी लग जाती तो ?
उसका मुँह फट जाता,
वह मर जाता तो ?
आखिर पहचान
संगति से होती है —
कुत्ता समझदार है
क्योंकि मेम साहब की संगति में है ;
सो, समझदार मेम साहब
का समझदार कुत्ता
केवल नासमझ को ही काटा सकता है ।
फिर गवाह कौन है ?
सुबूत क्या है ?

स्वेटर बुनती स्त्रियाँ

जमीन पर बैठी गर्भवती स्त्रियाँ
स्वेटर बुनने में
फूल के बहाने
खाका खींचती हैं अपने भविष्य का
केले-सी कलाइयों की मोहड़ी,
चाँद-सा गला बनाती हैं
नापती हैं पेट की लम्बाई
और सीने की चौड़ाई

स्त्रियाँ पहले अपने बच्चों का,
फिर पतियों का स्वेटर बुनती हैं
और सबसे बाद में अपना,
वे कभी-कभी सोचती हैं
इस गलती सर्दी में
ढलती उम्र में
एक स्वेटर अपने देश के लिए भी बना ले !
जब नाप लेने की सोचती हैं,
सिहर जाती हैं एकाएक
याद करके
कि फुल स्वेटर कैसे बनेगा
जब दायाँ हाथ नाखून-सा पैर तक बढ़ा है
और बायें पर वर्षों से पलस्तर चढ़ा है ।
तो हाफ ही सही

नहीं, नहीं
पेट तो रोजाना तीर की रफ्तार
गर्मी का कुआँ बन रहा है
और पीठ धनुष !
अंत में स्त्रियाँ
गिन-गूँथकर
अपने पेट की ओर देखकर
यह सवाल कल के लिए
‘आने वाले’ पर छोड़ देती हैं
जैसे गायें ‘निमका’ लेती हैं खूँटे से पगहा ।

दूसरे पहर
अपने मीठे दर्द को भुलातीं
सपनों को पगुराती
सोचती हैं स्त्रियाँ
काले ऊन के स्वेटर में
एक ओर बना दें
दूध पीता बछड़ा,
दूसरी ओर सूरज से खेलता बच्चा ।

किताबें 

एक दिन किताब खोलते ही
मेहँदी रचे दो हाथ नजर आए
और शब्द चित्र प्रेम-पत्र
जो सुगंधित कर रहे थे
पूरी किताब/आलमारी और कोठरी ।
मैंने किताब बंद कर दी
रखने के लिए सुगंध की धरोहर
थोड़ी देर में खोली
दोनों हाथों में मेहँदी
आपस में मिलने से
लाल भभूक हो गई थी
जीवन-रेखा और हृदय-रेखा के बीच
आँखें उग आई थीं
भाग्य-रेखा धनुष बन गई थी
और सूर्य-रेखा तीर
उँगलियाँ भरे तरकश-सी खड़ी थीं
दाहिना अँगूठा
कभी एकलव्य की याद दिलाता था,
कभी द्रोणाचार्य की ।
मणिबंध पर
राखी/चूड़ियों की जगह
निकल रही थी बरगद की जड़ें
तब मेरे सपने साकार होने लगे
शून्य आकार होने लगे ।

चाकू-सी किताबों के
तेज धारदार शब्दों से
मैं बनाना चाहता हूँ अपना घर
अन्यथा किताबों के पन्ने फड़फड़ाने से
भय है
देश के टखनों और सपनों
के टूटने का

किताबें हर चौराहे-नुक्कड़ पर
जोर-जोर से कह रही हैं –
ऐ लेखक मित्रो !
बुआई का मौसम शुरू हो गया है
कलम की नोक से
स्याही की बूँदें नहीं,
नए बीच गिराओ
हर फूल के साथ
काँटे भी बिछाओ
अन्यथा कविता-कहानी का
गर्भपात मत करो,
सिर्फ जज्बात मत भरो
पृष्ठभूमि की माटी साक्षी है –
क्रांति
खूब गेहूँ उपजाकर
नारों की फसल काटकर,
पुतले जलाकर,
इश्क-हुस्न की लोरी सुनाकर,
साकी-जाम छलकाकर नहीं,
ताजी गरम रोटी
के दोनों फलकों को
कृपाण ढाल बनाकर ही लाई जा सकती है ।

अब किताबों से निकलकर
शब्दों की असंख्य कतारें
लगती जा रही हैं

रातें लाली पड़ते ही
पिघलती जा रही हैं
कोणों, आयतों और वर्गों को सुनकर
बेचैन हो रहे हैं शैतान
वे समझने लगे हैं
किताबें आवाम की आवाज हैं
लोगों के आह्वान पर
वे दुकानों से निकलकर
आ गई हैं सड़कों पर ।

भविष्यवाणी

मैं ज्योतिषी नहीं हूँ
फिर भी भविष्यवाणी कर सकता हूँ
पेट और पीठ के गणित को समझकर ।
लेकिन मैं यह भविष्यवाणी नहीं करूँगा
कि कौन सरकार
कब किसके हाथों गिरेगी
या किस पर गिरेगी
किस शासन-प्रशासन पर
शनि की साढ़े साती चल रही है
या राहु-केतु का प्रकोप है
मंगल नाराज हैं
या खुश बृहस्पति महाराज हैं
कब कैबिनेट बैठेगी
(गोया हमेशा खड़ी रहती है
काली घोड़ी की तरह)
और दर्जनों सर कलम
जो जाऍंगे कागज पर

मैं सिर्फ यह भविष्यवाणी करूँगा
कब हमारे पैरों से निकलेंगी गहरी जड़ें
और हाथों में नई-नई कोंपलें
कब मोर नाचेंगे बच्चों की आँखों में
और कूकेंगी कोयलें
दादुर टर्र-टर्र की धुन पर ढोल,
कबूतर गुटरगूँ की साज पर तबले
और मुर्गे अहले सुबह बजाएँगे बाँसुरी ।
तब सर्दियों में धूप
हमें अपनी गोद में लेकर
थपथपाएगी
गर्मी में वर्षा हमारे साथ
‘ढुक्कुल’ खेल खेलेगी
हर गाँव-शहर में पूजा होगी
राम-रहीम-ईसा की जगह
आदमी के हाथ-पैरों की
और लोग समझेंगे
राम-रहीम-ईसा बनाने वाले
यही हाथ हैं
जो सबके पास हैं ।
मैं यह भी भविष्यवाणी करूँगा
कब बच्चे बताऍंगे
आँचल काटकर
नहीं उड़ाई जा सकती पतँग
कागज को आकाश तक पहुँचाने के लिए
एक सूत्र चाहिए
जो साफ हो/सफेद हो
बिना गाँठ का जोड़ हो !

मैं यह भी बताऊँगा
कब बच्चों की खिलखिलाहट में खप जाएगी
बूढ़े-जवानों की तिलमिलाहट
जैसे चाँद में धब्बे
तब बीसवीं सदी के मरघट से
इक्कीसवीं सदी के पनघट तक
पहुँचते-पहुँचते हम सब
जान जाऍंगे कि
रोशनी आएगी
आँखों के स्वस्थ होने से
हाथों के चुस्त होने से ।

मैं भविष्यवाणी कर सकता हूँ
कब
देश के नौजवान
चौराहों पर खेलते ताश के पत्तों
और कॉफी हाउस में पीते चाय के प्यालों
में छिड़े युद्ध को
वहाँ से खींचकर
सड़कों पर लाऍंगे
कुहरों/बादलों से टकराऍंगे !

मैं भविष्यवाणी कर सकता हूँ
कब कानून बनाने वालों को भी
उसका पालन करना होगा
सेठों को भी खड़ा होना होगा/कतार में
तेल-नोन लेने के लिए ।

कर्फ़्यू

कर्फ्यू ओढ़ लेता है सन्नाटा
तोड़ देता है आदमी का
सड़कों से रिश्ता
सन्नाटा चीरती है
सिर्फ कुत्ते की आवाज
हमारा शहर बन जाता है
कुत्तों का शहर ।
कर्फ्यू जुड़ जाता है
इतिहास के एक
अध्याय के रूप में
अपने-अपने नाप की
टोपी की तरह पहन
लेते हैं लोग ।

कर्फ्यू की घोषणा अभी-अभी हुई
भेड़िया के आने को सुन
लोग बन गए भेंड़ें
इकलौता भाई घर न आ सका
कल राखी है
इस दुनिया में सिर्फ बहन है
जिसे कर्फ्यू से ज्यादा चिंता है
राखी की
उसे विश्वास है—
कर्फ्यू चाहे शहर का हो
या ससुराल का
तोड़ सकते हैं
उसे राखी के
धागे ।

तीन बार छँट चुकी लड़की
और उसकी माँ चिंतित है –
कैसे आ सकेंगे कल लड़की देखने वाले
माँ झुँझलाती है/कोसती है –
तेरी तकदीर खोटी है कलमुँही
जन्मते ही बाप खा गई
तीन बार छँट चुकी
लगन खत्म हो रही
फिर निहारो साल भर/निगोड़ा कर्फ्यू लगन में ही आना था !

कर्फ्यू लगने पर
पहली बार बच्चों ने कहा था –
“पापा ! कर्फ्यू अच्छी चीज है
स्कूल नहीं जाना पड़ता,”
पर दूसरी/तीसरी/चौथी बार
मौका पाने पर भी
छुट्टी की खुशी
न आँखों में छलकती है
न हाथों में फुदकती है
न पैरों में उछलती है
बच्चे पूछते हैं –
“माँ ! इस छुट्टी में
यूनीफार्म वाले
हमें खेलने क्यों नहीं देते ?”
माँ आँसुओं से जवाब देकर
दाहिने हाथ की तर्जनी
सीधे अपने मुँह पर रखकर
घूरने लगती है
तब बच्चे निरुत्तर होकर
कहते हैं –
“माँ ! कल से हम भी
स्कूली यूनीफार्म नहीं पहनेंगे !”
बच्चे समझ गए हैं —
घर और जेल का फर्क मिट गया है
दिखाई देता है चारों तरफ
धुआँ-ही-धुआँ
मुँह के आगे बस खाई या कुआँ
बगल में राख बने
अधजले मकान या टूटी दुकान,
चेहरों पर शैतानों के
पंजों के निशान
धब्बों और शर्म से झुकी आँखें,
पक्षियों के उजड़े घोंसले
कर्फ्यू की मार से सिकुड़ी सड़कें
झुका आसमान
मुरझाये बादल ।
जब भी लोग देखते हैं
इंसानों को धुएं में तब्दील होते
मकानों का हवन होते
वे अपने चौखटों से बाहर नहीं निकलते
कि कहीं उन्हें भी
धुआँ न समेट ले !
कर्फ्यू उठने पर
शहर नहीं पहचानता हमें
स्कूल की दीवारें बच्चों की
आवाज सुनकर
हो जाती हैं चौकन्नी
हमारे मुल्क का दिल
मुरझा जाता है पान के पत्ते की तरह
तब से सपनों में भी शहर
बौखलाता/काँपता-सा नजर आता है ।

ख़बर 

खबर थी—पंजाब में दो दर्जन लोग/बन गए गोश्त
पर लोग सब्र किए
कि दो यात्री किसी तरह फुर्र हो गए !
खबर थी-रेल-दुर्घटना में
तीन सौ यात्री मारे गए
लोग चुप रहे
कि घायलों को अस्पताल भेज दिया गया
खबर थी –
सात महिलाओं का बलात्कार हुआ
लोग धैर्य धरे कि
पुलिस बलात्कारियों की तलाश
सरगर्मी से कर रही है
खबर थी –
दंगे में डेढ़ सौ झोपड़पट्टियाँ
जला दी गईं
लोग हर बार की तरह धीरज धरे
घोषणा सुनकर
कि पीड़ितों को मुआवजा दिया जाएगा
मृतकों के आश्रितों को नौकरी
और दिए जाएंगे/पहनने को कपड़े
रहने को घर ।
खबर थी –
मरने के बाद ही पूरे होते हैं अरमान
एक साथ मिलता है – रोटी, कपड़ा और मकान
खबर थी –
कटे पेड़ के तने
गौरैया के उजड़े घोंसले
गायों के सूखे थन
और जो बात लोगों के जेहन में
बरसों से रही है
अभी खबर नहीं बनी है !

लहरें 

यह जानते हुए भी
कि गिरना है अन्ततः
बार-बार उठती हैं लहरें
देती हैं खुली चुनौती काल को
और नीचे जाकर नापती हैं गहराई
लोग लहरें देखकर भी
क्यों डरते हैं गिरने से ?

अंगारे पर बैठा आदमी

डिग्रियों का बोझ लिए घूमता
बेटा धुएं में गिरफ्त
बेटी आँसुओं से लिप्त
खुद अंगारे पर बैठा आदमी
न कालिदास है/न शंकराचार्य
न मंडन मिश्र का गुरु कुमारिल भट्ट
मेरी आँखें गवाह हैं –
वह घुरहू है मेरे गाँव-जवार का
जो जीते जी बन गया है घूर !
वह काटता है वक्त
दाँत से नाखून की तरह

खटता है दोनों जून
खाता है एक जून
गाँव की डगर छोड़
निकला शहर की ओर
काम की तलाश में
जो खो गया सुई की तरह
फिर भाड़े पर खींचने लगा रिक्शा
सोचा – बेहतर है माँगने से भिक्षा
बस पालता रहा पेट
चुकाता रहा भाड़ा
कुछ न भेज सका अपने घर
घर सिसकने लगा
घर सिर्फ मकान नहीं होता
मकान केवल दीवार नहीं होता
दीवार मात्र माटी नहीं होती
और माटी सिर्फ माटी नहीं होती !

उसे देख संविधान झुकाता रहा आँखें
लोग होते रहे पिछौंड़
एक दिन अचानक
घर से आया तार
दिल हुआ बेतार
जीवन तार-तार ।

कालीन बुनते बच्चे

नियति के नाम पर
धंधा कालीन का
फल-फूल रहा है रोज-रोज
मुलायम उंगलियों पर चल रहे हैं जूते
देश-विदेशों के सेठ-शहंशाह
अंदाजते हैं कालीनों की मुलायमियत
जूतों की नोकों से ।
नुमाइश में शरीक दर्शक
दुकानों में आए खरीदार
नहीं सोचते कालीन के अतीत
या अतीत के कालीन पर
नहीं रोते वर्तमान के सूखे होंठों पर
तरस नहीं खाते भदोहीं/भिवंडी पर
जहाँ बिकता है बचपन
तीन सौ रुपये दर माह
और जवानी ‘विसनोसिस’ बीमारी का सिर्फ दूसरा नाम ।
छूट जारी है उद्योग में
वृद्धि है निर्यात में
तिजोरियों में/विदेशी मुद्रा में
और तेजी से फैल रहा है अंधकार
बीस वर्ष के बूढ़ों में
जिन्होंने बुनते-बुनते कालीन
उलझा ली हैं जिंदगी के ताने-बाने के गाँठें ।

माँ की चिट्ठी 

बेटा ! तुम्हारा खत मिला
और मिली महँगाई की दर
सुनते ही भूल गई अपना कमर-दर्द
पर आते हुए टिकट लेकर आना
कुछ तो सबूत रहेगा होने का
भले मुझे सौ के बजाय नब्बे देना
मैं नहीं लूँगी दो बट्टी साबुन
सब चलता है !
आखिर छिप जाएगी समाज की मैल में
मेरी रंगीन साड़ी की गंदगी !
सुनो भैया !
मेरी मुन्नी की गुड़िया को जरूर लाना पोशाक
भले रहे मेरी मुन्नी उघार
डसका सपना न मर जाए
इसका रखना ख्याल
गठिया लेना इसे आँचर की कोर में
ओह ! ओह ! मर्दों के आँचर नहीं होते
और आबरू की चीजें
नहीं रख सकते पैंट की जेबों में
पुत्तर ! दुक्खू हरवाह की बाकी है मजूरी
उससे चुराती हूँ मुँह रोज-रोज
अब पैर भारी है उसकी घरवाली का
हमने भूत को धता दिया
वर्तमान को चकमा दिया
मैं भविष्य से मुँह नहीं चुरा सकती, मेरे लाल !
बेटवा ! अपनी सेहत का ख्याल रखना
पानी में मिला दूध इतना महँगा मत खरीदना
बस मैदान जाने के पहले
पी लेना एक लोटा शुद्ध पानी
सोने से पहले धो लेना हाथ-पैर
सो जाना पीकर ठंडा पानी
लेकिन न किसी का पानी लेना
न अपना पानी जाने देना
मत छेड़ना किसी को
पर छेड़ने पर बन जाना बर्रे
पूजा करना भगवान की फोटू लेकर
पर मढ़े फोटू के लिए
चलते-फिरते फोटू को मत भूलना !
बच्चा ! महँगाई तो बहुत है
कुछ कहते नहीं बनता
इस बार आना तो रजाई लेते आना
चिट्ठी का जवाब जल्द देना
लिफाफे की जगह पोस्टकार्ड भेज देना
बाकी पैसे में खरीद लेना नमक !
मन करता है चिरई होती
पहुँज जाती फुर्र से उड़कर तुम्हारे पास
कोई भाड़ा न लगता
अच्छा, बहुत हो चुका
लिखना थोर समझना ढेर
दुलहिन का बुखार
कमा है तुलसी-मिर्च के काढ़े से
मत करना उसकी चिंता
मुन्नी खेल रही है चोर-साह
अब नहीं सुनती मुझसे किस्से
कहती है—राजा-रानी हटाओ
मुझे लाल परी दिखाओ
तुम कितने सीधे थे
नहीं करते थे ऐसे कठिन सवाल
खैर —-
बचई ! इस बार आना
तो मोमफली जरूर लाना
वैसे महँगाई तो भयंकर है
जनता की जूती/जनता के सिर है
जैसा ठीक समझना, वैसा करना
लौटती डाक से जवाब भेज देना ।

मोर्चे पर बच्चा 

माँ बच्चे के साथ
तुतलाती है,
बोलती है
मुँह बनाकर
थपथपाकर देह
चुप कराना चाहती है
पर पूछता है बच्चा बार-बार
माँ से बाप का नाम
माँ सिर झुकाकर/मुँह लटकाकर
सिर्फ कहती है –
“हाय वियतनाम ! वियतनाम !”
लेकिन बच्चा
निप्पल लगे रेडिमेड दूध जैसे
इस उत्तर से मुँह मोड़ लेता है
फिर बूढ़ों का-सा सवाल करता है—
लेकिन फौजी भाई ?
उनकी महीनों से क्यों चिट्ठी नहीं आई
यह सुनते ही
माँ का गाल
उसके बायें हाथ पर गिरकर
थम-सा जाता है,
बहने लगती है
उसके आँसुओं की गंगा
मुँह से फेंचकुर की तरह
दो शब्द गिरते हैं –
“हाय श्रीलंका !”

तीसरी बार सवाल पूछने
की हिम्मत बच्चे की नहीं होती,
माँ को और ‘हाय’
कहने की नौबत नहीं आती
बच्चा अंदाज लगाता है –
इस बार कहीं माँ
अपना गला न घोंट ले,
उसका कान उमेठ
उसे मालदीव न भेज दे !
कारण —
अब उसी का नम्बर है
फिर छिड़ा समर है
भले वह अभी बच्चा है,
पर मोर्चे पर जाने को
बस वही बचा है !

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