हिमानी की रचनाएँ

मैं लिखना चाहती हूं

मैं लिखना चाहती हूं
कुछ ऐसे लेख
जो जुड़े हों
देश, दुनिया और समाज से

कुछ ऐसी कविताएं
जिनमें न हो बारिश, फूल और भंवरे
जिनमें हो भूख, समानता, संघर्ष और क्रांति की बातें

आज भी
जब मैं लिख रही हूं कुछ
तो चाहती हूं
कि लिखूं
कोरोना संकट से जूझ रहे लोगों के हालातों
और इंडिया और भारत के बीच फैले
तमाम विरोधाभासों की कहानी

मैं चाहती हूं कि लिखूं
ध्वस्त होते उन तमाम जन आंदोलनों के बारें में कुछ
जो एक नया चोला पहनकर
छेड़े गए थे
मगर जिनकी पटकथा
नेताओं के चरित्र पर ही आधारित थी
और जिन्होंने बिल्कुल
नेताओं की तरह वादों को तोड़ने के लिए ही भरा था
बड़ी-बड़ी बातों का दम

मैं लिखना चाहती हूं गरीबी रेखा के उन आंकड़ों के बारे में
जिन पर हमेशा संसद, टीवी चैनलों और अखबारों में बहस होती है
और हमेशा ये गिनती अधूरी रह जाती है कि कितने लोग
यूं अखबार बिछाकर और ओढ़कर ही सो रहे हैं फुटपाथों पर
और भी न जाने कितनी खबरें हैं, जिनसे हर रोज गुजरते हुए
मैं उन पर सहमती हूं, सोचती हूं, उन्हें समझती हूं
और कुछ लिखना चाहती हूं।

लेकिन
मैं
बस… लिखती हूं
और लिखती जाती हूं
तुम्हें,
और
तुम्हारे इन्तजार को।

खुशियां

खुशियां नहीं जानतीं किस मौसम में खिलते हैं फूल
और किस मौसम में पत्ते झड़ते हैं पेड़ों से
किस मौसम में बारिश लाते हैं बादल और
किस मौसम में हो जाती है बिना बादलों के ही बरसात
किस मौसम में कोहरे और धुंध की चादर में लिपट जाता है हर इंसान
और किस मौसम में हवाएं चलती हैं अपनी सबसे तेज चाल
खुशियों को कुछ मालूम नहीं होता
वो अपने वक्त से आती हैं
वक्त हो जाने पर बिना देरी किए चली जाती हैं
जैसे इस बार आया है वसंत मगर खुशियां नहीं आईं
वो आईं थीं उस वक्त जब मौसम बहुत उदास था।

प्रेम 

प्रेम लुप्त हो चुका है
डायनासोर से भी बहुत पहले।
मोहब्बतों की मौत के साक्षी रह चुके हैं
खुद प्यार करने वाले।
अब सिर्फ इश्क फरमाया जा रहा है।
…और जब हमारी औलादें रखेंगी
दिल की दहलीज पर कदम
तब युद्ध होगा
लुप्त हो चुके प्रेम को
फिर से जीवित करने का युद्ध
क्योंकि ऊब जाएंगी पीढ़ियां इश्क फरमाकर
तड़पेंगी प्यार के लिए पानी से ज्यादा
बीमारियों का इलाज बन जाएगा प्रेम
नसीहत में कहा जाएगा-
सुबह-दोपहर-शाम
खाने के बाद
खाने से पहले
आपको देना है
इन्हें अपना स्नेह भरा वक्त, प्रेम भरे पल।
प्रेम की खोज होगी
प्रेम पर शोध होंगे
अध्ययन किए जाएंगे
कि आखिरी बार कब, कहां, किसने किया था वह प्रेम,
जिसके अवशेषों से बचाया जा सके प्रेम का अस्तित्व
तब शायद किसी को कुछ दिल कहीं टूटे हुए मिलें।

तुम और मैं

तुमसे दूर जाने की कई वजह थीं मेरे पास
फिर भी,
मैं तुम्हारे सबसे नजदीक रहना चाहती थी

तुम हर बार,
मेरे दिल पर दस्तक देकर
दुत्कार रहे थे मुझे
मैं, हर बार
तुम्हारा दर्द सहलाना चाहती थी

तुम चाह रहे थे
सब कुछ छिपाना
मैं चाह रही थी जताना

तुम पहले ही
निगल चुके थे
सारी भावनाएं
मैं अब
दांतों तले
हर एक अहसास को
चबा रही थी

तुम, एक अहम शख्सियत बनना चाहते थे
मेरी जिंदगी में
मैं, तुम्हें अपनी दुनिया का
सबसे खास शख्स बनाना चाहती थी

तुम अच्छी तरह जान चुके थे मुझे
कई तरह परख चुकने के बाद
मुझे डर था तुम्हें खोने का
हर परख से पहले

तुम मुझे सिखाकर
खुद भूल गए थे प्यार करना
मैं अब भी सीखे जा रही थी।

उसने कहा

उसने कहा,
मैं तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त बनना चाहता हूं
मैंने उसके मेरा दुश्मन होने की
हर सच संभावना को झुकला दिया।
उसने कहा,
मैं तुमसे प्यार करता हूं
मैंने उससे नफरत करने की
हर वजह को भुला दिया।
उसने कहा,
मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता
मैंने अपने उससे दूर जाने के
सारे रास्ते बंद कर दिए।
उसने कहा,
तुम पहला गंभीर प्रेम हो मेरी जिंदगी का
मैंने इस मजाक को भी गंभीरता से लिया।
उसने
परत दर परत परखा मुझे
और मैंने
सिर्फ और सिर्फ उसके शब्दों को
परब्रह्म बना लिया।
उसने
रूठ जाने की हजारों वजहें दी मुझे
पर मैंने लाखों बार
उसके लिए खुद को मना लिया।
उसने भी तोड़ने और भूलने के लिए किए
सारे वादे और ली सारी कसमें
मैंने उसकी इन्हीं यादों को
ताउम्र के लिए सीने से लगा लिया।
उसके साथ
ख्वाबों का एक काफिला सा था
उसके जाने के बाद खड़ी थी
सपनों की एक सुनसान सड़क।
उसके बिना था अब सब कुछ
पर मैं खुद को ढूंढते हुए
अब भी पीछे रह गई थी
कहीं उसी के पास।

प्रेम का अनुवाद

प्रेम का अनुवाद देह होता है
किसी ने कहा था
मैंने कहा
जिस प्रेम का अनुवाद देह है
वो प्रेम से कुछ अलग है
प्रेम से कुछ कम है
उसने कहा
ये तुम्हारा भ्रम है
मैंने कहा
तुम्हारी भाषा ही कमजोर है
जिस तरह पूजा के बाद मिलने वाले
जल का अनुवाद पानी नहीं हो सकता
उसी तरह
प्रेम का अनुवाद देह नहीं बन सकती
तुम्हीं सोचो, तुम्ही बताओ
क्या तुम्हें सिर्फ मिटती हुई वो दूरियां याद है
जिनके बाद दो शरीर एक दूसरे में सिमटते गए थे
…एक-दूसरे के शरीर से कोसों दूर भी
लगातार पलती-बढ़ती हुई
उन नजदीकियों को तुमने कौन सी जगह दी है
अपनी स्मृति में
अपनी यादों में
क्या सबसे निचले माले पर बिठा दिया है
उन पलों को
जिनके होने से बचा हुआ है
आज भी
प्रेम का असितत्व
देह से बिल्कुल अलग
बहुत दूर भी।

दिल का कचरा

बेशर्म ख्वाब
बेअदब ख्वाहिशें
बगावती ख्याल
खाली से इस दिल में
कितना कचरा भरा है
हकीकी से रुबरु
हुक्म की तामील करता
हदों में रहता हर शख्स
इस कचरे से दूर
कितना साफ सुथरा दिखता है
आदतों में शुमार अदब
तहजीब से लदा
तरकीबों से अलहदा
ये हुस्न मुझे मगर
नागंवार लगता है
अब चाहती हूं इस जिस्म में भी नूर हो
शर्मों हया की इस चाशनी में
शरारत का तड़का
तवे सी रोटी के सुरूर में
तंदूरी नान सा गुरूर हो
दिल में थोड़ा कचरा होना भी
जीने के लिए जरूरी है।

मन शैतान हो गया है 

मन करता है नास्तिक हो जाऊं
मन करता है किसी को नाराज कर दूं
और कभी न मनाऊं
किसी को दूं बेइंतहा मोहब्बत
और फिर मैं भी बेवफाई कर पाऊं
मन करता है अहसासों का
अंश-अंश निकालकर
किसी कूड़ेदान में फेंक आऊं
मन करता है किसी पहाड़ी जगह नहीं
पकिस्तान में जाकर छुट्टियां बिताऊं
मन करता है तोड़ दूं
सारे परहेज और रजकर खाऊं
मांगू नहीं, छीन लूं
अपना हर हक-अधिकार
मोड़ दूं, तोड़ दूं, मरोड़ दूं
उन सारे गृह नक्षत्रों को जो मेरे
खिलाफ हो गए हैं
काट दूं सारी किस्मत की रेखाएं
और खुद
सपनों की एक तस्वीर हथेली पर सजाऊं
अब मन करता है खुद पर करुं एक अहसान
भूल जाऊं सबको
और याद रखूं बस अपना नाम
ये मन अब शायद चंचल नहीं रहा
शैतान हो गया है।

हम

हम लिख रहे हैं
अतीत के अपराध
और वर्तमान के राग
कि भविष्य बेहतर हो सके

हम दिख रहे हैं
इतिहास के भगत सिंह जैसे
21वीं सदी में क्रांति की मशाल लिए
कि आने वाली सदियां हमें भी याद करें

हम खोल रहे हैं जुबां
चुप रहने की
त्रासदियों के बीच भी
कि सच गूंगा न होने पाए
और झूठ भी सुन सके
उसकी गूंज को

हम शामिल हैं
हर उस विचार के साथ
कि जिससे समाज को
समानता की सूरत मिल सके

हमने कुछ रास्ते अख्तियार किए हैं
दिखाने के लिए दूसरों को रास्ता
कि हम गर मजबूर हो गए
कहीं अपनी अपनी मजदूरी के चलते तो
वो दूसरे उन रास्तों पर चल सकें।

मगर अब हमें बांध लेनी चाहिए
अपनी अंधी उम्मीदों की ये पोटली
कि किसी दूसरे के कंधों को ये बोझ न सहना पड़े।

जीरो 

अकेले कितना उदास दिखता है जीरो
जैसे कोई अस्तित्व ही न हो
जैसे ही कोई संख्या करीब आकर खड़ी होती है
ऐसे लगता है- खिल उठा हो
कुछ होकर भी
जीरो के बिना संख्या, ज्यादा कुछ नहीं हो पाती
कुछ न होकर भी
संख्या के साथ, जीरो बहुत कुछ हो जाता है
जिंदगी, जीरो जैसी हो गई है
जिसे हर वक्त
एक संख्या की तलाश है।

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