हुसैन माजिद की रचनाएँ

ग़ज़लें

धूल भरी आँधी में सब का चेहरा रौशन रखना है

धूल भरी आँधी में सब का चेहरा रौशन रखना है
बस्ती पीछे रह जाएगी आगे आगे सहरा है

एक ज़रा सी बात पे उस ने दिल का रिश्ता तोड़ दिया
हम ने जिस का तन्हाई में बरसों रस्ता देखा है

प्यार मोहब्बत आह ओ ज़ारी लफ़्ज़ों की तस्वीरें हैं
किस के पीछे भाग रहे हो दरिया बहता रहता है

फूल परिंदे ख़ुश्बू बादल सब उस का साया ठहरे
उस ने जब आइने में ग़ौर से ख़ुद को देखा है

मुझ को ख़ुश्बू ढूँढने आए मेरे पीछे चाँद फिरे
आज हवा ने मुझ से पूछा क्या ऐसा भी होता है

कल जो मैं ने झाँक के देखा उस की नीली आँखों में
उस के दिल का ज़ख़्म तो ‘माजिद’ सागर से भी गहरा है

लोगो ने आकाश से ऊँचा जा कर तमग़े पाए 

लोगो ने आकाश से ऊँचा जा कर तमग़े पाए
हम ने अपना अंतर खोजा दीवाने कहलाए

कैसे सपने किस की आशा कब से हैं मेहमान बने
तन्हाई के सून आँगन में यादों के साए

आँखों में जो आज किसी के बदली बन के झूम उठी है
क्या अच्छा हो ऐसी बरसे सब जल-थल हो जाए

धूल बने ये बात अलग है वरना इक दिन होते थे
चंदा के म संघी साथी तारों के हम-साए

आने वाले इक पल को मैं कैसे बतला पाऊँगा
आशा कब से दूर खड़ी हैं बाहों को फैलाए

चाँद और सूरज दोनों आशिक़ धरती किस का मान रखे
एक चाँदनी के गहनें फेंके एक सोना बिखराए

कहने की तो बात नहीं लेकिन कहनी पड़ती है
दिल की नगरी में मत जाना जो जाए पछताए

‘माजिद’ हम ने इस जुग से बस दो ही चीज़ें माँगी हैं
ऊषा सा इक सुंदर चेहरा दो नैनाँ शरमाए

शाम छत पर उतर गई होगी

शाम छत पर उतर गई होगी
दर्द सीने में भर गई होगी

ख़्वाब आँखों में अब नए होंगे
ज़िंदगी भी सँवर गई होगी

मैं तो कब से उदास बैठा हूँ
ज़िंदगी किस के घर गई होगी

एक ख़ुश्बू थी साथ में अपने
कौन ढूँढे किधर गई होगी

उस का चेहरा उदास है ‘माजिद’
आईने पर नज़र गई होगी

तूफ़ान कोई नज़र में न दरिया उबाल पर

तूफ़ान कोई नज़र में न दरिया उबाल पर
वो कौन थे जो बह गए परबत की ढाल पर

करने चली थी अक़्ल जुनूँ से मुबाहसे
पत्थर के बुत में डल गई पहले सवाल पर

मेरा ख़याल है की उसे भी नहीं सिबात
जान दे रहा है सारा जहाँ जिस जमाल पर

ले चल कहीं भी आरज़ू लेकिन ज़बान दे
हरगिज़ न ख़ून रोएगी अपने मआल पर

ऐसे मकान से तो यहाँ बे-मकाँ भले
है इंहिसार जिस का महज एहतिमाल पर

‘माजिद’ ख़ुदा के वास्ते कुछ देर के लिए
रो लेने दे अकेला मुझे अपने हाल पर

नज़्में

चाँद और चराग़ 

हमें तो ख़ैर
अँधेरों ने डस लिया
लेकिन गए थे तुम तो
ख़लाओं में रोशनी लेने
धुएँ में
लिपटे हुए क्यूँ हो सर से
पैर तलक
मलीह चेहरे पे छाई है
मुर्दनी कैसी
चमकती आँख में
ज़र्दी कहाँ से दर आई
बदन निढाल सा
क्यूँ है
क़दम थकन-आलूदा

सुनो कि चाँद हमेशा
फ़रेब देता है
हँसो हँसो कि बहुत ज़ोर से हँसते थे तुम
नज़र झुकाने से
अब काम चल नहीं सकता हयात करनी ही ठहरी
तो आओ
मेरे साथ
पुरानी बस्ती के पुर-पेच रास्तों पे चलो
जहाँ गढ़े हैं तअफ़्फुन है और वीरानी
हर एक घर के दर ओ बाम से टपकती है
मगर
झारोंकों में जलते चराग़
गर्दूं के
चमकते चाँद की मानिंद पुर-फ़रेब नहीं

हैरानगी

मैं ख़ुद कि ज़िंदाँ-नुमा शहर से
फ़रार हो कर
बहुत मगन था
कि मैं ख़ला को शिकस्त दे कर
नए जहानों के पा गया हूँ
अमर हुआ हूँ
मगर जो अंदर नज़र पड़ी तो
भरम ये टूटा
जो ख़ुद था पहले वो अब ख़ला था ख़ला से मेरा वजूद अब भी जुड़ा हुआ था

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