हूबनाथ पांडेय की रचनाएँ

तुम और हम

तुम जनमे
तब देश ग़ुलाम था
हम जनमे
आज़ाद देश में
तुम थे कमज़ोर
पर अपनी कमज़ोरी को
अपनी ताक़त बनाते रहे
हम अपनी ताक़त
बदलते रहे कमज़ोरी में
तुम होते गए निरंतर निर्भय
हम डर की खोल में
कछुए जैसे
तुमने सच को साथी माना
हमने संकुचित स्वार्थ को
तुम जोड़ रहे थे
हम तोड़ रहे हैं
अहिंसा तुम्हारा धर्म
हिंसा हमारी आदत
तुम क्षमा करते रहे
हम नफ़रत
तुम निश्छल थे
हम चंचल हैं
तुमने आंख मूंद कर
विश्वास किया हमारी
अच्छाइयों पर
और हमने सिर्फ़
इस्तेमाल किया
तुम्हारे सिद्धांतों को
तुम कण कण बढ़ते गए
हम तिल तिल घटते रहे
तुम हमें जिलाने के
सार्थक बनाने के
रास्ते तलाशते रहे
और हम तुम्हें मारने के
जड़ से उखाड़ने की
तरकीबें ढूंढ़ते रहे
तुम ख़ुशबू की तरह
पसरते रहे
सारी क़ायनात में
हम अपनी दुर्गंध में
होते रहे क़ैद
जबकि एक बार
तुमने ही हमें कराया आज़ाद
हमारी कमज़ोरियों से
आज तुम हो गए
डेढ़ सौ वर्ष के
और ज़िंदा हो
हम मर रहे हैं रोज़
तलाश रहे
ज़िंदगी के बहाने
और शर्मिंदा हैं
कि नहीं पहचान पाए तुम्हें
वक़्त रहते
वरना शायद बचा पाते
जीवन अपना भी
और अपनों का भी
अब तो सिर्फ
अफ़सोस रहेगा
कि तुम्हें तस्वीरों में
जड़ने की जगह
मन में जड़ते
पुस्तकों में पढ़ने की बजाय
जन में पढ़ते
तो कितना अच्छा होता
पर अब तो देर हो चुकी है।

वसीयत

गांधी के मरने के बाद
चश्मा मिला
अंधी जनता को
घड़ी ले गए अंग्रेज़
धोती और सिद्धांत
जल गए चिता के साथ
गांधीजनों ने पाया
राजघाट
संस्थाओं ने आत्मकथा
और डंडा
नेताओं ने हथियाया
और हांक रहे हैं
देश को
गांधी से पूछे बिना
गांधी को बांट लिया हमने
अपनी अपनी तरह से

ख़ामोशी

मरने से ठीक पहले
वह चीखा भर होता
तो शायद बच सकता था
सिर्फ़ बचे रहने के लिए
वह उम्र भर ख़ामोश रहा

विकास

पत्तल और दोने
पर्यावरण को
कर रहे थे बरबाद
इसलिए
चमचमाती
पीतल की थाली में
परोसे गए
मुफ़्त इंटरनेट डेटा
और सिम कार्ड
भूखे लोग
अब कर सकते हैं
गुणगान
पीतल की थाली का
बिना किसी व्यवधान

अर्थ 

चुप रहने के
हज़ार फ़ायदे
चुप रहनेवाले से
कोई नहीं झगड़ता
किसी को कष्ट नहीं होता
चुप रहनेवाला
कभी दुखी नहीं होता
कभी शिकायत नहीं करता
आलोचना नहीं करता
चुप रहनेवाला
सबको अच्छा लगता है
सबको अच्छा लगने
निहायत ज़रूरी है
चुप रहना
दस हज़ार साल पहले
मनुष्य ने जब
बोलना सीखने की
शुरुआत की
तब उसे नहीं पता था
बोलने से कहीँ बेहतर है
चुप रहना
दस हज़ार साल बाद
ऋषियों की पावन भूमि पर
यह ज्ञान मिला
कि चुप रहनेवाला
सरकार गिराने के आरोप में
आधी रात को
गिरफ़्तार नहीं होता
डॉक्टर कहता है
जनम से बहरा व्यक्ति
जनम से गूंगा हो जाता है
गूंगा होने के लिए
बहरा होना अनिवार्य है
ज्ञानियों का मानना है
जीवन के किसी भी मोड़ पर
थोड़े से प्रयास से
बहरे हो जाओ
गूंगापन ख़ुद आ जाता है
बहरा होने का दूसरा फ़ायदा
कुछ हद तक
अंधापन आ जाता है
आप वही देख पाते हो
जो आंख के आगे है
और हर आंख की
एक सीमा तो होती ही है
और अगर बोलना हो जाए
बेहद ज़रूरी
और जेल भी न जाना हो
तो या तो वर्दी पैदा करो
या गर्दी पैदा करो
या कुर्सी पैदा करो
इनमें से कुछ भी पैदा न कर पाओ
तो बनकर शिखंडी
रक्षा करो
सत्ताधारी अर्जुन की
युद्धोपरांत
पद पुरस्कार प्रतिष्ठा
कुछ भी असंभव नहीं
अप्राप्य नहीं
अतः अनुभवियों की मानो
और चुप रहो
और बोलना ही पड़े
तो ऐसा बोलो
जिसका कोई अर्थ न हो
तकलीफ़ बोलने में नहीं
अर्थ से है
अर्थ चाहिए
तो अर्थ से बचो
चुप रहो
ख़ुश रहो!

उसकी मर्ज़ी से

उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता
क्योंकि उसकी हुक़ूमत पत्तों पर ही चलती है

उसकी मर्ज़ी से जनमते हैं लोग
मरते हैं या मारे जाते हैं
उसकी मर्जी से बनते हैं बम
और फूटते हैं इनसान गुब्बारों की तरह

उसकी मर्ज़ी से निकलता है बच्चा
साठ फुट गहरे गड्ढे से
और साठ सालों में मरते हैं साठ करोड़ बच्चे
भूख और कुपोषण से

उसकी मर्ज़ी से बंटती है खैरातें
बनती हैं शानदार इमारतें उसके लिए
उसने बख्शी हैं जिसे बे पनाह दौलत
वह उसी को दान करता है उसकी मर्ज़ी से

उसकी मर्ज़ी से
मौत के मुंह से बच जाते हैं गुनहगार
और मारे जाते हैं बेगुनाह

उसकी मर्ज़ी से मासूम बच्चे
हवस का शिकार होते हैं
भीख मांगते हैं
ड्रग्स लेते हैं
और मर जाते हैं जवान होने से पहले

उसकी मर्ज़ी से अस्सी के बाद भी
नौजवानों को मात करते हैं धनपशु

उसकी मर्ज़ी से वेश्याएं बेचती हैं जिस्म
पतिव्रताएँ सहती हैं लम्पट पति को
उसकी मर्ज़ी से उसीकी इमारत शहीद होती है
होते हैं अनगिन मासूम हलाक़

उसकी मर्ज़ी चलती है ज़मीन, आसमान, सितारों पर
नहीं चलती तो सिर्फ़ गुनहगारों पर
जो सदियों से
इनसान और इनसानियत को रौंद रहे हैं
रौंदता है सूअर जैसे पवित्र वस्तुओं को
उसकी बनाई दुनिया में जीना है
तो उसकी शान में सिर झुकाना होगा
नहीं करना होगा कोई सवाल
सवाल उसे नहीं भाते
चलती है सिर्फ उसकी मर्ज़ी

उसकी मर्ज़ी के खिलाफ
एक पत्ता भी नहीं हिल सकता
भले पूरा पेड़ उखड़ जाय

नया साल मुबारक 

नया साल मुबारक हो
उन्हें भी
जिनके खेत खलिहानो पर
तनेंगे विकास के भव्य महल,
नदी तालाब बनेंगे, रिसॉर्ट, वॉटर पार्क
जिनके बच्चे अपनी ही ज़मीनों पर
विकसित होटलो में
लगाएंगे झाड़ू पोंछा
बेटियाँ बिकेंगी ऊँचे दामों पर
जी.डी.पी. छूएगा आसमान

नया साल मुबारक हो
उन्हें भी
जो थर्टी फर्स्ट की रात
सिकुड़ते बेचते हैं गुब्बारे
बीनते हैं बीयर की बोतलें
और रम की टिन
गटर के किनारे
कुचले जाते हैं इम्पोर्टेड गाड़ियों से
सड़कों पर सोते हुए
बचे हुए लोग
पाते हैं मुआवज़ा

नया साल मुबारक हो
उन्हें भी
जिनके बच्चे मारे गए
बलात्कार के बाद
जिनकी ऑंखें पथराई
इंसाफ़ के इंतज़ार में
जिनका जीवन गुज़र गया
एक लम्बे बुख़ार में
साठ सालों से अटका हुआ है
थर्टी फर्स्ट जिनके संसार में

नया साल मुबारक हो
उन्हें भी
जो दंगों का इन्तज़ार करते हुए
बाढ़ में मारे गए
रोज़गार की तलाश में
परदेशी समझ मारे गए
विस्फोट से बचे
तो भीड़ में मारे गए
मरने के पहले
और मरने के बाद भी
उन्हें
नया साल मुबारक हो।

इस शहर में

अब
इस शहर में कोई
भूखा नहीं सोएगा
सबको मिलेगी
दो वक्त की रोटी
सिर पर छत
हाथों को रोजगार
ऑंखों को सपने
साफ-सुथरी सड़कों पर
हवा से बातें करेंगी गाड़ियॉं
फ्लाइओवर ब्रिज जोड़ेंगे
शहर के एक छोर को दूसरे से
धरती, आसमान, पानी पर दौड़ेंगी कारें
मिनटों में पहुॅंचेंगे
एक सिरे से दूसरे तक
अस्पताल होंगे सुसज्जित, सुविधा संपन्न
स्कूल गोलमटोल स्वस्थ बच्चों से भरेपूरे
बगीचे फूलों से खिलखिलाते
तालाब कमलों से गदराए
फुटपाथ भिखारियों से खाली
रेलवे स्टेशन चमचमाते
बस अड्डे जगमगाते
सुंदरियां बाज़ारों में इठलाती
बालाएं रैम्प पर बलखाती
गलियां कुत्तों-गायों से मुक्त
मंदिर-मस्जिद भक्तों से भरे
भक्त भक्तिभाव से भरे
बैंक धन से भरे
सेंसेक्स अंकों से भरे
कहीं भी
अभव, गंदगी, विपन्नता का
नामोनिशान नहीं
यह बीसवीं सदी का
सड़ा गला शहर नहीं
इक्कीवीं सदी का
ग्लोबलाइज़्ड शहर है
अब
इस शहर में
कोई भूखा
नहीं सोएगा
क्योंकि भुखों के लिए
इस शहर के बाहर
एक दूसरा शहर
बसाया जा रहा है
वैसे भी
भूखों को नींद कहॉं आती है

घर में ही रहें

जब हम कहते हैं
घर में ही रहें
तो मान कर चलते हैं
कि इस दुनिया में
सबके पास और कुछ हो न हो
घर ज़रूर होगा ही
उनके पास भी
जो घर पालने की फ़िक्र में
घर छोड़कर
घर से बहुत दूर हैं
जो बंजारें हैं
भिखमंगें हैं
जो रोज़
दूसरे का कुआं खोदकर
अंजुरी भर पानी पाते हैं
जो फुटपाथ पर
प्लेटफार्म पर
नाले के किनारे
पेड़ के नीचे
पाइप के भीतर
रिक्शे की पिछली सीट पर
गांव के सिवान पर
पुल पर
स्काइवाक पर
बंद दुकान के बाहर
गुमटी की छांह में
सूखे नाले के भीतर
गीली पलकों के नीचे
सबके पास होगा ही
अपना एक घर
जहां वे सुरक्षित रह सकते हैं
संसर्गजन्य रोगों से
और जब घर है
तो बरतन भी होंगे
अनाज भी होगा
होगा ईंधन भी
और पानी भी
बार बार हाथ धोने के लिए
साबुन के साथ
ऐसे में किसको एतराज़
कि वह ना रहना चाहे
घर में
निकल पड़े सड़कों पर
भूखा प्यासा
नितांत पैदल
और इतनी बड़ी दुनिया में
कोई पूछने वाला भी न हो
कौन हो
कहां जा रहे हो
क्यों जा रहे हो
खाए हो कि नहीं
चुल्लू भर पानी को मुहताज
ये कौन लोग हैं
जो घर में नहीं रहना चाहते
इन्हें क्या डर नहीं लगता
मौत से
इन्हें लगे न लगे
पर कुछ लोगों को ज़रूर
डर तो है
इनके बीमार होने का
क्योंकि इनसे फैल सकती है
ख़तरनाक बीमारी
उन लोगों तक
जिनके पास अपना घर है
राशन कार्ड है
आधार कार्ड है
वोटर आईडी है
नौकरी धंधे हैं
मिल फैक्ट्रियां हैं
अकूत धन संपत्ति है
सत्ता है शक्ति है साधन है
इनकी फ़िक्र में
उनसे भी कहा जा रहा है
घर में रहिए
जिनके पास
धरती के बनने से लेकर
आज तक
कोई घर ही नहीं है।

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