हेमन्त कुकरेती की रचनाएँ

चाँद पर नाव

आँख

देखने के लिए नज़र चाहिए
ठीक हो दूर और पास की तो कहना ही क्या

बाज़ार को दूर से देखने पर भी लगता है डर
मेरा घर तो बाज़ार के इतने पास है
कि उजड़ी हुई दुकान नज़र आता है

ठेठ पड़ोस का घर हो जाता है सुदूर का गृह
चीख़ता है कि उसकी कक्षा से दूर रहूँ
जब कि मेरे घर के हर कोने की है अपनी परिधि

कई बार ऐसा हुआ कि नहाने के लिए पानी लेने गया
और साबुन के भाव बिकते-बिकते बचा
यह तभी हुआ कि मैंने अपनी क़ीमत नहीं लगाय़ी
खुद को बिकने से बचाये रखना ऱोज का हादसा

दूर से दो विदेशी पैर आकर
उठाईगीरी पर उतर आते हैं अपनी नग्नता दिखाकर
उसने लड़ना मेरी मज़बूरी है या
उजागर होता है ओछापन

सोने के लिए दिनभर की नींद मुफ़्त में देनी पड़ती है मुझे
जागने के लिए सपने हैं, उनसे ही कहता हूँ
इतने हल्ले में आओगे तो कैसे सुन सकूँगा तुम्हें पहचानूँगा कैसे
वे जाने कैसे पहचान लेते हैं मुझे
किसी दिन कुचले हुए मिलेंगे मेरे सपने एक दुकान के नीचे
दूसरी पर उनका सौदा हो रहा होगा

कैसा विनिमय है चीज़ों का
गेहूँ कपास न हुआ सिन्थेटिक कपड़ा होकर बिकने लगा
बच्चे जिन बिस्कुटों के बदले राज़ी होते थे अपनी नींद तोड़ने के लिए
वे रूमाल हो गय़े
फिर भी पैण्ट इतनी ऊँची हो गयी कि भूख जितनी ढीठ
कमीज़ें इतनी महँगी कि उन्हें पहनने की ज़रूरत ही नहीं रही

आदमी भी वस्तु हो गया, देखा तो सोचा
देखने के लिए आँख चाहिए ऐसी जो पैसे के पार देख सके

मिट्टी की कविता

मिट्टी को पानी ही पत्थर बनाता है
पानी में भीगकर ही वह होता है कोमल
सम्भव है आग के भीतर बूँद की उपस्थिति
आकाश में पृथ्वी का जीवन

तितलियाँ कितने युगों से रंगों की काँपती हुई
चुप्पी को ढो रही हैं अपनी काया पर
फूल किसके प्रेम की यातना में सुगलते हैं
और जाने किसकी स्मृति में हो जाते हैं मिट्टी

जीवित रहने के लिए प्राण आत्मा के साथ चाहिए
निरा शरीर अन्न की गन्ध से रहित है
बचे रहने का अर्थ बीज बनने में नहीं है
तो कोई भी कवच नहीं है काम का

इस नाकाम दुनिया में बड़ा लाभ है
बेकार के धन्धों में
बाक़ी तो ऐसा व्यापार है कि
ख़ुद को ख़रीदकर
बचे रहें बिकने से
और ईश्वर का महत्त्व दैनिक भविष्यफल के अलावा
नहीं है कुछ भी

ऱोका गया भरसक प्रेम करने से
वक़्त काटने के लिए नहीं किया प्रेम
वह जीवन का नमक था पाने के लिए उसे
अपनी मिट्टी को फिर से गूँथकर देनी पड़ी शक्ल

बादलों में होती है बिजली
प्रेम के चमकते मुख पर कहीं गहरे धँसे होते हैं दुख
उनसे होकर हम पहुँचते हैं और नज़दीक एक-दूसरे के….
अन्त हमें तोड़कर फिर बनने की देता है चुनौती
हम हो जाते हैं मिट्टी

मिट्टी कभी नहीं मरती बढ़ जाती है थोड़ी-सी

जिसके पास सिर्फ़ अपनी जान है

जो झाड़ियों में छिपा था
वह भालू ही रहा होगा
इसलिए कि जो आलू खाते थे उसके किस्से से ही डर गये
जो आलू उगाते थे उन्होंने ही भालू को हड़काया

गर्म होने के लिए वे दूध पीने चले गये
जो मवेशी चराकर लौटे उनका तो पसीना ही
इतना तेजाब है कि बंजर जला दे

बसाने के नाम पर जो बस्तियाँ जलाते हैं
वे हिमालय को गलाकर
उसका पानी सात समन्दर पार भेजते हैं
और गंगा के किनारे शराब की बोतलों में बेचते हैं

बचाने के लिए जिनके पास सिर्फ़ अपनी जान है
वह क्यों इन्हें चुनता है
और अपने उगाये आलू की क़ीमत से डरकर
झाड़ियों में शरण लेता है

वह किस्सों से बाहर आकर उन्हें अन्दर क्यों नहीं करता
जो इनके घरों पर कब्ज़ा करने के बाद
खेतों में अन्तरिक्ष नरक बनाना चाहते हैं

जिसके पास सिर्फ़ अपनी जान है 

जो झाड़ियों में छिपा था
वह भालू ही रहा होगा
इसलिए कि जो आलू खाते थे उसके किस्से से ही डर गये
जो आलू उगाते थे उन्होंने ही भालू को हड़काया

गर्म होने के लिए वे दूध पीने चले गये
जो मवेशी चराकर लौटे उनका तो पसीना ही
इतना तेजाब है कि बंजर जला दे

बसाने के नाम पर जो बस्तियाँ जलाते हैं
वे हिमालय को गलाकर
उसका पानी सात समन्दर पार भेजते हैं
और गंगा के किनारे शराब की बोतलों में बेचते हैं

बचाने के लिए जिनके पास सिर्फ़ अपनी जान है
वह क्यों इन्हें चुनता है
और अपने उगाये आलू की क़ीमत से डरकर
झाड़ियों में शरण लेता है

वह किस्सों से बाहर आकर उन्हें अन्दर क्यों नहीं करता
जो इनके घरों पर कब्ज़ा करने के बाद
खेतों में अन्तरिक्ष नरक बनाना चाहते हैं

ईश्वर का वेतन

ईश्वर को कितना वेतन मिलता होगा
और उतने में ऐसे कौन-से काम होंगे जिन्हें
ईश्वर नहीं चाहता होगा करना ?

ज़रूर होंगे ऐसे काम
क्योंकि ऐसे हैं कई कामी चरित्र हमारी सामाजिक
जान-पहचान में
जो अपने खल-कर्मों को ईश्वर के जिम्मे डालकर
भगवती जागरण में मोटा पैसा देते हैं

जिस मशीन पर वह पैसा छापते हैं
उसे सीधे-सीधे कहने पर ईश्वर को शर्म आएगी
हम मानते हैं कि ईश्वर को
अच्छा नहीं लगता उनका व्यापार
इसीलिए हमारी नज़र में ईश्वर के लिए
कुछ अच्छे विचार अभी बचे हैं
और हम उससे डरते नहीं हैं

हम काम करते हैं
न करें तो क्या मुम्बई भाग जाएँ
हमारे साथी शेयर बाज़ार जाते हैं
या घरों में करते हैं राजनीति
हम जाते हैं दफ़्तर घिसे जूतों में घिसटते
और सिर्फ़ ईश्व का नाम याद रखते हैं

क्या ईश्वर सीकरी में नौकर हो गया
उसके नाम से लोग सचिवालय में पहुँच गये हैं
ईश्वर भी वहीं है तो इतने ढेर पैसे को बचाता कैसे होगा ?

कुछ बच्चे और कई बच्चे

बिस्कुट जैसी होती है बच्चों की हँसी
और गुस्सा चाकलेट की तरह

उन्हें हम उनकी नहीं अपनी दुनिया में देखते हैं
और उनके बारे में फैसले करते हैं
कितना बड़ा अपराध है यह
सज़ा के नाम पर बच्चे हम से रूठ जाते हैं तो
हम माफ़ी नहीं माँगते वादे करते हैं
और अगले दिन पर टाल देते हैं अपनी हार

हमें पता है कि उनका गुस्सा घुल जाएगा थोड़ी देर में
तब तक उन्हें हँसता देखकर हम इत्मीनान से चाय पीएँगे
और बिल्कुल भूल जाएँगे कि
कई बच्चों के लिए रोटी पहेली की तरह है
और जीवित बच जाना आश्चर्य जैसा

सिर्फ़ शर्मिन्दा ही हुआ जा सकता है इस सच पर कि
सभी बच्चों की हँसी बिस्कुट जैसी नहीं होती
और गुस्सा चाकलेट की तरह….

दूसरे बच्चे

जब वे अपने बच्चे के लिए
खिलौने ख़रीद रहे होते हैं
उन्हें एक बच्चा
उम्मीद से देखता है
वह भी बच्चा है

वे फुरसत में
उस पर बहस करते हैं
कोई शब्द
उस बच्चे के ख़ाली पेट
और रीती आँखों को नहीं देखता

वे हँसते हैं
अपने बच्चे को हँसता देखकर
इतने जोर से कि
दुनिया के दूसरे बच्चे
अपनी भूखी नींद से उठकर
रोने लगते हैं

अपने बच्चे को वे
हँसने का सलीका सिखाते हैं कि
अगर वह हँसे उनकी तरह
तो उसे मिलेंगे
और भी अच्छे खिलौने

न जाने कहाँ से सुनकर
उनकी आवाज़
कुछ बच्चे अपनी फटी कमीज़ों के नीचे

छुपा लेते हैं रात की रोटी

खेलने की उम्र 

कितने युगों बाद मिला
यह बक्सा
जिसमें सोये रहते थे
बचपन के खिलौने

दुनिया भर की बातें करते
दुनिया भर के खिलौने

वह अभी भी बड़ा है
मेरे हाथों के लिए
मेरे मन के लिए
वह एक तितली है
छटपटाती मेरी उँगलियों के बीच

जाने किन काले दिनों से गुज़रकर
वह मुझे देखने को ही
बैठ गया है मेरे सामने

वह मैला हो गया है
टूटने लगे हैं खिलौने
फीके हो चले हैं उनके रंग

मैं भाग नहीं रहा उनसे
मेरा डर यही है कि
उनसे खेलने की उम्र
मेरे जीवन के बक्से से निकलकर
खो गयी है कहीं
किसी दिन वह भी
मुझे मिल ही जाएगी
ठीक खिलौनों के इस बक्से की तरह…..

नाखून

ये मेरे साथ जन्म से हैं
अँधेरे में चमकते
उजाले में पीले पड़ते
ये न जाने कब बढ़ जाते हैं ?

पूरे शरीर में
तय है इनकी एक जगह
मैं इन्हें मोड़कर
कहीं भी ले जा सकता हूँ
कभी-कभी इन्हें टूटते
देखता हूँ नींद में
खुशी होती है कि बोझ
कम हो रहा है शरीर का

मेरी तरफ़ बढ़ते
ये कई बार मुझे डरा जाते हैं
मेरे एकाएक सहमने पर
हँसते हैं ठठाकर

मैं इन्हें दुश्मनों के नाम से
याद करता हूँ
हालाँकि ये उनकी तरह
अपने भीतर नहीं छुपे रहते

इतिहास से मिली नफ़रत
मेरी अपनी है
उसे झेलते-झेलते
मैं लड़ाकू हो चला हूँ

ये इतना नहीं सोच सकते
बस, हँसते हैं
ज़रा-सा दबाने पर
शायद इन्हें पता नहीं कि
इनका भी इतिहास है
इनकी भी नफ़रत है

फ़िलहाल 

दिन मुझे बाँधकर चल रहे हैं
रात मेरी नींद छीनकर सपने में बीत रही है

घर से भागना एक खेल है
इस तमाशे में अपनी कनपटी पर
धमाका करता हूँ
तो ज़िन्दगी मज़ाक हो जाती है
नहीं तो इतना बोझ कि
हर मिनट मरना भी नाक़ाफ़ी

कहता हूँ कि ख़ुद से कि
अपने को मैं बहुत कम जानता हूँ
फिर क्यों इतना भय ?

साँस लेने के लिए मैंने मास्क चढ़ा रखा है
यह जो कमीज मैंने पहनी हुई है कवच है दरअसल
सुरक्षा के लिए अपने पते पर मैं धमकी भरे
गुमनाम पत्र भेजता हूँ
छाती पर साइनाइड और कमर में बारूद भरकर
भीड़-भरे तहखाने में सुरंग की तरह बिछा रहता हूँ

रोज़ मेरे लिए प्रयोग होते हैं
रोज़ नयी बीमारियाँ घेर लेती हैं मुझे
रोज़ मैं बड़ा होता हूँ
रोज़ मैं कम होता हुआ बीत रहा हूँ

इतने पर भी मैं
अपने पक्ष में खड़ा होने की सोचता हूँ
कि अनन्तकाल के लिए
भंग हो जाती हैं संसद

नशे में आदमी

ख़ूब पीने के बाद
वह ख़ुद पर दया करता है
तब उसके देवता
उसे अकेला छोड़ देते हैं

लड़खड़ाता वह देखता है
अपना बीत चुका कल
जहाँ भी होता है वह
उसके साथ होते हैं उसके
अनेक अन्त

धुएँ में डूबने से पहले
वह डूब रहता है धुँधलके में
वहाँ होती है एक तीखी गन्ध
उसका दिमाग सुन्न करती
छा जाती है उस पर

उसके हाथ पर
उसके पैर
वह ख़ुद अपना साथ नहीं देता
रात तब चमकती है
उसकी बगल में

रोशनदान पर बसी
चिड़ियों की खुल जाती है नींद
वे तय नहीं कर पातीं कि भागें
या साथ दें उसके कोहराम में

सन्नाटा बढ़ता रहता है
उसके गिलास में
ज़रा-सी जो बची रहती है
वह चाहता है
बची रहे हमेशा के लिए
जब कि उसे पता नहीं चलता
कल कितना दूर है कल से

वह निढाल होने को होता है
और एक स्मृति
ढुलक आती है पसीने की तरह
उसके कपाल पर

वह काटकर फेंक देना चाहता है
अपनी उँगलियाँ
नसों से बहता ख़ून
अच्छा लगता है उसे
ऐसा करके वह
केवल जतलाना चाहता है
अपना डर
जिसे बाँटनेवाला कोई नहीं होता

शीशों को तोड़ता
वह फाड़ देता है कपड़े
कुछ आदिम शब्द गूँजते हैं
उसके कण्ठ में
खो जाते हैं कुछ अन्तरिक्ष में

वह रोने लगता है
ज़ोर से
कोई उस पर रोए या
हँसकर टाल दे
कठिन होता है फैसला करना

याद करने के लिए
उसके पास अगली सुबह
कुछ नहीं होता
सिवा इसके कि वह
भूलना चाहता था रात को कुछ
जो न जाने कहाँ गुम गया
उसकी नींद में

पत्थरों में

पत्थर में
पानी था
पेड़ों की स्मृति में पत्ते
घोंसलों की गन्ध में
चहचहा रहे थे

चाँद था
जो अपनी खिड़की से
हिला रहा था हाथ

चीड़ों पर
शहद की तरह लिपटा था
उजाला

सूरज नहा-धोकर
बैठा था
छुट्टी वाले दिन

चिड़ियों को
फुर्सत नहीं थी
रुककर
धूप से बात करने की

पत्थरों में केवल
होती है आग
किसने कहा यह सबसे पहले

उसे डाँटना मत

वह भी पत्थरों में ही
मिलेगा
उनके पुरखों की तरह…

कपड़े टाँगने की चिमटी का खोना

तेज़ हवा और तीखी सर्दी में आफ़त है
कपड़े टाँगने की चिमटी ढूँढ़ना

उड़ गये कपड़े तो रहेंगे नहीं
जो रहने के बाद फिर नहीं रहता
रहते जीवन तक दुख देता है
कपड़ों का न रहना
सिन्थेटिक धागों का कम होना नहीं है सिर्फ़

कपास की बनी जेब से खनकते सिक्कों का खो जाना है
सिक्के जिनका बाज़ार-भाव गिरने के बावजूद आदमी से ज़्यादा है

कपड़े न हुए कण्ठ की फाँस हो गये
कपड़े टाँगने की चिमटी न हुई दाँत हो गये

खुले मैदान अब रहे नहीं
आपस में कपाल सटाये छतें हैं खड़ी
जहाँ दूसरे की दीवार का गिरना कोई नहीं सुनता
चिमटी गिरने की आवाज़ सुन लेते हैं सब
जो गिर गया वह हो जाता है हरेक का

फिर बच्चों के लिए तो
हर चीज़ उनके रास्ते पर गिरी है
पृथ्वी तक उनके लिए पैरों पर पड़ी गेंद है
वे चिमटी को क्यों छोड़ेंगे

गिरे हुए को उठाकर हक़दार को देना मुश्किल है
हर समय के हर मौसम में

कपड़े टाँगने की चिमटी ही तो है खोने पर इतना क्लेश क्यों?
यही सोचते हैं हम और एक-दूसरे की चिमटी चुराकर
अपने कपड़ों कोा बचाते हैं

कपड़े ही तो हैं सोचकर उतारते हैं सरेआम
और जो नहीं देखता, उसे चिल्लाकर बताते हैं:
देखो, हमें देखो!

जीवन का स्वाद

सब्ज़ी उगने का जादू नहीं देखता हर कोई
बाज़ार से ख़रीदकर खानेवाली नस्ल भी मुश्किल में पड़ गयी है अब

सब्ज़ियों के हैं कई संकट जुड़े हैं उनके रंगों और स्वाद से
खाना बनाने से पहले सब्ज़ियाँ काटना गुज़रना है कड़ी परीक्षा से
तीखी महक और बचे हुए मीठेपन को
एक ही थाली में सलीके से रखने का हुनर
जेब और दुकान में सुखद सम्बन्ध बनाने जितना कठिन है

दाल को छौंकना और भात उबालने से बड़ा काम है उन्हें
सही अनुपात में पकाना
विवाह के प्रेम में झगड़े का कारण
सब्ज़ियों के समीकरण समझ नहीं पाना है

लड़ाके और कटखने पड़ोसियों को भी हम जानने लगते हैं
सब्ज़ियों के नाम से
सब्ज़ियाँ धारण किये रहती हैं अपने गुणों को
भूख के कारण
जाति-भेद से शुरू भाषा-अन्तराल तक व्याप जाती है यह
अन्तहीन वार्ता
आलू सिखाता है कि हर जगह हिलमिलकर रहना, नष्ट होकर खिलना
मिर्चे हैं कि हर स्वादहीन का मुँह जलाना
सब्ज़ियाँ अनन्त हैं फिर भी सबको नहीं मिलतीं

एक जीवित औरत को सुहानी शाम भिण्डी में बदल देती है
और मरते हुए-से आदमी को प्राण दे देती है हरी सब्ज़ियाँ

बन्दगोभी की तरह पृथ्वी को छीलती हुई गृहिणियाँ
सब्ज़ियों का लोहा इकट्ठा करके दुनिया भर की गृहस्थियों को
बदल देती हैं अस्पताल में
जहाँ दुनिया के सबसे बड़े रोग भूख का इलाज होता है

शुक्र है सब्ज़ियाँ गोश्त नहीं खातीं
आदमी के लिए छुपाई महँगी सब्ज़ी को भी चाट जाते हैं कीड़े
सूँघने को ज़रूर मिलती है जानवरों को आदमी की उगायी
सबसे विरल वनस्पति

आदमी कितना बेचारा कि केवल नमक न होने से
स्वादिष्ट खाना भी बेस्वाद!

करवा चौथ

एक दिन ईश्वर को पराजित करने को जुटती हैं औरतें
इतना डरती हैं कि उसे पूजने लगती हैं
आदिकालीन होता है उनका दिन
आदिम होता है उनका डर
प्राचीन होती हैं औरतें

वे रचती हैं अपने चेहरे
रंगती हैं धरती
लाल चटख होते हैं उनके कपाल
सृष्टि के जाने किस नियम को मानकर औरतें
अपने भय को गाती हैं चौराहे पर

सदियों से भूखी औरतें
पानी से भरी थाली में कँपकँपाती देखती हैं अपनी परछाई
और फेंक देती हैं पीठ पीछे
भय तब भी दिखता है

तेंदुआ छिपा रहता है पत्तों के पीछे उनकी घात में
और दबोचने से पहले हर लेता है शक्ति

जब नहीं थमता कोलाहल
वे अर्पित कर देती हैं गीत में पिरोकर अपना डर

अग्नि और चन्द्रमा और जाने किस-किसको
खुश होती हैं कि आकाश तक पहुँचता होगा उनका हाहाकार
जिसे सोख लेंगे बादल

कभी-कभी वे डरती हैं कि पृथ्वी से भेजे उपग्रह
या उनसे रुष्ट कोई अतृप्त पूर्वज
कहीं उसे वापस न भेज दे उनके पास

और वे ईश्वर को प्रसन्न करने के उपाय सोचती हुई
खु़शी की तरह उच्चारने लगती हैं अपना भय…

वह आदमी जो लेटा है

वह आदमी जो लेटा है
उसके सिरहाने धरा पानी का बर्तन
लग रहा है कि सचमुच ही हो जैसे उसका सिर

अभी जब वो बीड़ी पी रहा था तो लगा कि गमला हो
जिसमें दोपहर को खिला कोई फूल
मुरझाना भूलकर दिपदिपा रहा हो रात में

औरत जो उसके साथ है ठेठ औरत है भंगिमा से
लेकिन शब्दों की मजबूरी या कल्पना की सीमा कि
वह चादर लग रही है
जिसे जब-जब आदमी ओढ़ लेता है
और जब-तब गिरा देता है शरीर से

दृश्य पूरा करने को बच्चा भी है
जो तपती हुई छत पर
लू की मार से त्रस्त चिड़िया की तरह
मुँह खोले हाँफ रहा है
जिसे सपने में भी कोई देवता हँसाने नहीं आता
वह चौंक रहा है नींद में
जैसे कोई खाई में धकेल रहा हो उसे

इस व्यापार में करुणा भले हो, प्रेम नहीं है
घृणा शायद हो लेकिन निरासक्त शान्ति के बीचोंबीच
जो हाहाकार है उसके लायक संगीत इस वातावरण में नहीं है

रात होने के बावज़ूद नहीं हो रही है स्तब्धता उजागर
सिर्फऋ पथराई हुई है चुप्पी
जो दृश्य में चिपचिपाती साँसों से ऊबकर
लपक रही है आकाश की तरफ…

हन्त्या

हन्त्या[1]

देवता क्रोध की तरह आते हैं छा जाते हैं मुसीबत की तरह
जिस पर कृपा करते हैं उसका कपाल फोड़कर
सौभाग्य उतरता है
और सब उसकी आँच से हो जाते हैं ऊष्मित

देवता माँगते हैं अंगार
और राख शरीर पर लपेटकर कुपित होते हैं
देवता शिकायत करते हैं कि हम उन्हें भूल गये
याद तो पड़ता नहीं भूल-चूक क्षमा!
हम दण्ड[2] निकालते हैं देवता के नाम से
और वह अनिष्ट की सूचना धमकाने के स्वर में देता है

क्या है यह सब नाटक
हमारे पूछने पर बूढ़े डपटते हैं हमें
समझदार दिखते हुए वे कहते हैं कि जो मानता है
उसके लिए यह सब कुछ है
और मानता है अगर तो कुछ-न-कुछ अपराध
उसने किया होगा ज़रूर

देवता कभी पितरों के बहाने आते हैं
कभी विश्वास के भरोसे

कभी मन में आता है कि देवता होकर भी
इच्छा पूरी करवाने के लिए उन्हें मिलता भी कौन है?
एक अदना आदमी!

गूँज

गाँव की पगडण्डी से
दिख रही है
एक हाँफती-हुई नदी

चीड़ चुप हैं
उनकी पीली पत्तियों पर फिसलकर
मैं पहुँच गया हूँ
अपने बचपन में

वहाँ खलिहानों में
अन्न की खुशबू बची है
चलते हुए आदमी को
टूटे हुए हल में बदलते देख
अभी टूटी है मेरी नींद

खेतों में अँधेरा पक रहा है
और जल रहे हैं पेड़
चिड़िया चीख रही है
-‘पानी’
रेत झर रही है
उसकी चोंचसे
रास्ता भूली हवा
रेतीले सूरज की आँखें
खोले बगै़र
लौट रही है अपने शाप में

सिर्फ़ धूल उड़ रही है
सुनाई नहीं दे रहीं
वहाँ रेंगती गीली आवाजे़ं

मैंने चाँद को दिखाते हुए पानी पिया 

चाँद पूरा था
उमस पृथ्वी की देह से होकर पहुँच रही थी उस तक
वह काले बादलों के बीच से सभ्यता की तरह गुज़र रहाथा
या कहें कि
काले बादल काल की तरह उसे पछाड़ते हुए गुज़र रहे थे

मुझे प्यास लगी
ख़ूब गहरी
प्यास का माप नहीं था कोई आकार नहीं
जिस बर्तन में पानी था मैंने उसे प्रेम से देखा
और चाँद को दिखाते हुए खू़ब पानी पिया

चाँद को कितनी राहत मिली पृथ्वी की देह से होकर

उमस पहुँच रही थी उस तक

होने का मतलब

पूछने को रहे हमेशा बहुत-से सवाल
मैं हर बार यही पूछता रहा
मैं यहाँ क्यों हूँ?

जवाब पाने के लिए मैंने सोचा
अब मुझे लेट जाना चाहिए
सबसे व्यस्त चौराहे पर कि
बत्ती के लाल होने का मतलब
उन्हें भी याद आ जाए
जिनकी पुतलियों में बन्द हो चुके हैं
रंग पहचानने के ख़ाने

मैं यहाँ क्यों आया हूँ?
इसका जवाब तब भी न मिलने पर
मैं खु़द को
पैरों की तरफ़ से काटना शुरू कर दूँ

इतनी ज़ोर से चीखू़ कि
फटने के बाद मेरे कमज़ोर फेकड़े
सबूत रहें मैं शहर की हवा से नहीं मरा

विश्वविद्यालयों में मेरे शव को घुमाकर
प्रश्न-पत्र में पूछा जाए कि
यह आदमी यहाँ क्यों आया!

निचाट सूनी आँखों वाला मूक आदमी
कैसे बना सवाल पूछने के लायक?

जो परीक्षा में बैठे
इस प्रश्न को अनिवार्य रूप से हल करे…

प्लास्टिक युग में

यह प्लास्टिक युग है। इसका कोई सम्भ्रान्त वैज्ञानिक नाम
भी होगा। आदमी नृशंस है और उसका नृतत्त्वशास्त्र है।
उसके लिए सबसे ज़रूरी हैं हड्डियाँ

चमड़े की उत्तेजना से आदमी की नस्ल का सम्बन्ध नहीं
ख़ून केवल धर्म के आता है काम। इस हड्डीखोर समय में
हर चीज़ का अनन्त सिलसिला है। चीज़ों का अन्त नहीं है।
सम्बन्ध का अन्त कर रहे होते हैं हम कि पता चलता है यह
एक और भंगुर सम्बन्ध की शुरूआत है

नश्वर आदमी ने प्लास्टिक जैसी यह कैसी अमर चीज़
को पैदा कर दिया कि पल्ले पड़ गया दुर्वह बोझ

दुनिया को मोमजामे से ढककर सुरक्षित किया लेकिन
कोई भी जामा आदमी को ऐसा पाजामा तक नहीं
दे सकता कि वह गुण्डागर्दी और राजनीति से बच सके!

थोड़ा-सा पानी ढेर सारा नमक

कल के किसी बाज़ार में जब उसके रास्ते खुले होंगे
मैं अपने चमड़े के बदले कपड़े लेना चाहूँगा
साफ़ कहूँ कि चाहिए तो मुझे लोहा पर मैं उसे उठा नहीं सकूँगा
भूख के बदले तब रोटी की ज़रूरत मुझे नहीं पड़ेगी

आज मैंने सोचा तो हँसने लगा कि
मैं ऐसी कितनी वारदातों में बच निकला
नग्नता के विशाल सुनसान में मुझे शर्म नहीं आयी
मेरे साथ सभी मेरी ही तरह थे
अपने वल्कल वस्त्रों को पहने हुए हमें
अपने नाखूनों पर यकीन था

यकीन था उस सभ्यता पर जो हमारे हँसने से
टूटने की कगार पर काँप रही थी
हमारे दाँत दिखाई न दें इसलिए हमने
अपने चेहरों पर बाल उगा लिये

काल हमारी देह पर जाने
किस अनश्वर मन्त्र को लिख रहा था
हम पानी में नहीं गलते
धूप में झुलसने का डर भी हमें नहीं था
हम तो उसे बचाने के लिए अपनी बनाई दीवारों में जा छुपे

हम ध्वनि के इशारे समझने लगे
स्पर्श के इरादे भी हमें ज्ञात हो गये
हमने अरण्य में वनस्पतियों को फूँक डाला

अपने समुदाय की तरफ़ से मैं कहता हूँ कि हड्डियाँ कहीं और
गिरवी हैं हमारी
हमें शरण देने के नाम पर बहस बाद में करना
अभी तो हमें थोड़ा-सा पानी दो
जिसमें ढेर सारा नमक हो…

रुपये का पेड़

सोचता था पैसे कभी रुपये बन जाएँगे
छुड़ा लूँगा अपना चेहरा
जिनसे उधार ली है पहचान
हो सका तो मन का क़र्ज़ भी चुका दूँगा

जितना दिखाई देता था मैं, सच था
मैं अपने भीतर भी था पर गिरा हुआ नहीं
बसा हुआ था
वहाँ भी बाहर का अदृश्य अन्धकार घेरे हुए था मुझे
सिर काँटों से बिंधकर टुकड़े-टुकड़े
और पैर अपने बोझ से दोहरे हो रहे थे
मैं भाग कैसे सकता था

मेरी आँखों की जगह खनकते सिक्के चाहनेवालेां की नज़र
मुझे अतल में भी पकड़ लेती
मैंने उन्हें पतन से बचाये रखा

खु़द मैं बीज होना चाहता था
उम्मीद थी कि घास हो जाऊँगा
मेरे पेड़ होने को लेकर वे बेकार में ही
खरपतवार हो गये
और घेर ली मेरी जगह

मैं एक आदमी हो गया
जिसने पाया कि उसकी भूख मिटाने के लिए
कहीं भी नहीं उगतीं वनस्पतियाँ
भूख से ध्यान हटता तो किसी को बचाने पर लगाता
मैं तो लड़ाकू हो गया
फिर भी जीतने के पैसे इतने कम थे कि मैं उन्हें क्या बचाता
वह मुझे बचाते भी तो कब तक

मेरी ज़रूरतें कितना खातीं मेरा शरीर
अपनी ज़रूरतों के लिए मैं बन गया उनकी ज़रूरत
सोचता था पैसे कभी रुपये बन जाएँगे
देखा कि पैसे के लिए मैं सिक्का बन गया
और दूसरों की लगायी क़ीमत पर चल गया…

एक कथा है पानी की

एक कथा है पानी की
बहता रहता है कथा का पानी भी

इतने सारे पानी के बारे में
कितना कुछ है कहना
कुछ कहने से पहले
फिर वही दीर्घ आलाप मैं लेता हूँ
जीभ की नोक से आखि़री जीवकोष तक
बिछ जाता है पानी का स्वाद

अमृत की तरह बहते हुए इसे पीना
जून में धुले हुए तौलिये को पाना है
कुछ गिलास पानी जिसे पसीने की तरह
जलना है खू़न में

इसके कई चित्र हैं
पनघट का प्राचीन बिम्ब
और बादल की शाश्वत तस्वीर के बाहर
प्यास की तरह सुलगती रहती हैं
उसकी स्मृतियाँ

उसे बुझाने के लिए हम मिट जाते हैं

मच्छरदानी तो लगाते थे दादाजी

मच्छरदानी तो दादाजी लगाते थे
जैसे इसी काम के लिए होता था उन्हें रात का इन्तज़ार
कहा करते थे कि मच्छरदानी में सोने का मज़ा खुले में है
यह खुली जगह छत पर भी मिले तो चलेगा

हमने बहुत बाद में जाना कि चाँद के सरासर सामने
सप्तर्षियों को बाँधने और तारों को फँसाने का गुमान होता है
आती है हँसी अब सोचकर कि अपनी सुरक्षा के लिए छटपटाता
आदमी खुद को बहेलिया समझता है
और जानबूझकर शिकार हो जाता है अपने भय का

इन दुश्चिन्ताओं से अलग एक और भी पहलू है
मच्छरदानी के अन्दर सोने का कि
ढीठ मच्छर ख़ून चूसने के बाद मस्त होकर
मच्छरदानी की छत और दीवारों पर चिपक जाते हैं
पर भूलते नहीं होंगे कै़द में रहने का अनुभव
जो तमाम दवाओं के विष का स्वाद लेना सीख गये हैं
उनके लिए तो यह मौत जैसा ही होगा

खू़न चूसनेवालों के खिलाफ़ मोर्चा बाँधते फिर याद आते हैं दादाजी
मच्छरदानी को सलीके से लगाना धैर्य का काम है
दादाजी इत्मीनान से करते थे यह काम
फ़ौजी अनुशासन झलकता था इसमें, बर्दाश्त नहीं करते थे
बाहरी हस्तक्षेप
सुझाव ज़रूर सुनते थे

मच्छरदानी को समेटकर रखना मुसीबत लगती है
ज़रा देर हो जाय नींद खुलने में
मच्छरदानी धूप को बुलाती है और फँसा लेती है

लपेटकर चारपाई पर रखता हूँ मच्छरदानी
तो लगता है दादाजी थककर आराम कर रहे हैं
हमारे सामने तो वे कभी सोये नहीं
उनकी टाँगों की तरह लगती हैं चारपाई की डण्डियाँ
कमज़ोर लेकिन झुकने से इनकार करती हुई…

थकान में जागती हुई भूख

खेल के मैदान में सोया हुआ कुत्ता गीली घास पर
सुन रहा है उन बेचैन पैरों की धमक
जो कुछ देर पहले तक जल रहे थे

बरसकर शान्त पड़े आसमान के नीचे नीम पर कूदती
गिलहरी उसके लिए उत्तेजना नहीं है
यूकलिप्टस की पत्तियों से ज्यादा हरे हैं तोतों के दुख
उनकी आहट से कुत्ते के कान खड़े होते हैं
मिटती हुई थकान में जागती हुई भूख
चुनौती की तरह खड़ी हो रही है
उसी से टूट रही है नींद

मैदान में कहीं रुके हुए पानी में उड़ती हुई चिड़िया के पंख
हिल रहे हैं और गूँज रही हैं ध्वनियाँ
कुत्ता उन्हें सूँघकर फिलहाल पानी पर गुस्सा करना स्थगित
कर देता है

जहाँ उसकी पूँछ बाक़ी शरीर से जुड़ी है वहाँ अब भी सिहरन है
उसके दिमाग़ की तरह यह हिस्सा नींद में जागा हुआ है

अचानक बारिश से चकित पृथ्वी के हर कोने में
दौड़ रही हैं उसकी आँखें
किसी अँधेरे में कुछ लाल पंख गिरे हैं
छटपटाने की आवाज़ से वह चौंककर देखता है
कौवे पानी में सहमे हुए, आसमान से गिरते
रुके हुए पानी में अपनी परछाईं पर झपट रहे हैं

उसकी गुर्राहट गले में मचलकर पेट में समा रही है
जहाँ तक सोचा जा सकता है वह जगह उसकी है
जख़्मों पर बैठती मक्खियों पर वह दाँत किटकिटाता है
अपने पैरों को चाटकर उन पर टिका देता है अपना सिर
उसके पंजे कोमल हैं
चाटने के लिए उन पर खू़न नहीं
देर रात की ओस है…

इन्सानों के बीच में भेड़िये का वंशज 

अभी तुम छोटे हो
फेफड़ों में दम है और लचक है जीभ में
बाद में बस थोड़े समय बाद हर खटके पर गुर्राने वाले तुम
रातभर अन्धकार डूबी अपनी ही छाया से सहमकर चिल्लाओगे
थककर हाँफने से पहले ढूँढ़ लेंगी तुम्हारी आँखें कोई निरापद कोना

अपने भेड़िये पूर्वजों के उलट, जिनके जबड़े हँसते हैं क्रूरता से
तुम भूल गये हो ठीक से रोना तक
जाने क्या चीज़ कम है तुम्हारे जीवन में जिसकी ढूँढ़ में
आकाश की ओर मुँह करके पुकारते हो सर्द आवाज़ में
कौन जान सकता है तुम्हारी पशुवत् विवशता
हम केवल फटकारना जानते हैं
अपने ही रोने से डरे हुए हमें धमकाया है इस खौफ़नाक समय ने

डर से ज़्यादा कुरूप क्या होगा?
हिलते हुए पर्दे! पत्तों का खड़कना!! अपने इन छोटे डरों को भूलकर
हमारे डरों को बाँटते हो और हम छोटे हो जाते हैं

हमारे बीच रहते हुए भी ठण्डा नहीं पड़ा तुम्हारा लहू
एक-दूसरे का ख़ून चूसकर
हम अपने भीतर के जानवर को पालते हैं
तुम्हें देने के लिए महँगा हो गया है मांस
भरमाने के लिए तुम्हें, हमारे पास प्लास्टिक की हड्डियाँ हैं
हमें पता है कि
उनकी रगड़ से निकले अपने ही ख़ून से शान्त हो जाओगे तुम
नहीं तो हण्टर है ही हमारे पास

तुम्हें हमने सिखा दिया है कि साथ रहोगे हमारे तो
अपने स्वजनों को काटोगे या उन्हें जो हमारे नहीं हैं

दुलार से भरकर खु़द उठाकर लाते हो रस्सी
शायद जान गये होगे तुम कि
बँधने का शौक इन्सानों में पाया जाता है
बन्धु! केवल काया का अन्तर है
एक अदृश्य पूँछ की हरकत उनमें भी महसूस की जा सकती है
टुकड़ा फेंकने की देर है बस
मनुष्यों में भी होती है श्वान योनि
फिर भी ईमान के हिसाब से बेहतर होती है तुम्हारी नस्ल

जो तुम्हें खिलाते हैं वे भी कहीं से माँगते हैं
मिलता नहीं है माँगने पर तो छीन लेते हैं
सिर्फ़ जंजीर का फ़र्क है
उनके साथ में होती है तो वे काबू करते हैं
तुम कमाते हो, छुपाते नहीं हो अपनी ख़ुशी

मनुष्य के खोने और छोड़ने की गन्ध सूँघ लेते हो तुम
लाड़ में आकर गुस्सा करते हो झूठमूठ का
बाहर खिंच पड़ती जीभ से पहचानो कि वफ़ा के कीटाणुओं से है
तुम्हारी लार का सम्बन्ध
इस भक्ति का तुम्हें मिलता क्या है
भुलाने पड़ते हैं समय के साथ तमाम शोक
माहिर होना पड़ता है इस कला में कि
निरादर जूठन को महाभोज समझकर खाने में नहीं, खिलाने में है
फिर भी तुम तृप्त होते हो
और हमारे गले में तुम्हारे नाम का पट्टा पड़ जाता है

मर जाने से भी नष्ट नहीं होते सम्बन्ध
गड्ढा खोदकर नमक डाल देते हैं तुम्हारी लाश पर
अँधेरे को चीरती दो आँखें पीछा करती हैं
हमें डराती नहीं हैं
रखवाली करती हैं पूर्वजों की तरह, जब हम डरे होते हैं।

मेमने

ठण्डी हवा चलने पर
हवा से पहले निकलते हैं
मौसम को कोसने के लिए तय शब्द
स्त्रियों के मुख से

खाँसी से पहले खिचखिच करते पुराने स्वेटर
बाहर आ जाते हैं सन्दूकों से

चुराये हुए वक़्त में तन्मय होकर
सर्दी के खिलाफ़ डालते हुए फन्दे
मौसम की भूल को पकड़ती हैं स्त्रियाँ

स्वेटर में छिपे हैं आदमी के डर
कवच के नीचे पशु की पीड़ा है
आदमी इसे भी याद नहीं रखता
किसी और डर से…

याद करो, सिर झुकाये मेमने को याद करो
उसकी खाल में ही छुपे हैं उसके क्लेश
जो आये हैं
आदमी से दोस्ती के चलते
डरो कि मूक हमदर्दी है आदमी से उसकी
जो कि गँवा चुका है
अपनी हार्दिकता
विण्डचीटर[1] के नीचे भी कहाँ छुपते हैं
उसके छल!

जीवित 

पता नहीं कैसे रह लेते हो तुम इतनी-सी जगह में
लू के थपेड़ों से पिटकर उस घर में घुसों तो वहाँ
जैसे बह रही हों भाप की नदियाँ
कितनी गर्मी होती है मनुष्य की साँसों में
इतनी शक्ति होती है देह में कि एक जीवित बिजलीघर

क्रोध भी ढूँढ़ लेता है शमन का रास्ता
ऊब भी बह जाती है अक्षत एकान्त में
मनुष्य की निराश साँसों का निकास-द्वार आकाश में खुलता है

धरती तपती है बादल खींच लेते हैं नमी
मनुष्य की गर्मी चिपचिपाती है देह पर
मनुष्य तपता है आकाश सह नहीं पाता उसका ताप
पिघल जाता है बूँदों में

पता नहीं कैसे रह लेते हो तुम इतनी-सी जगह में
तुम तैरते हो भाप की नदी में
तभी जलते नहीं हो दुखों की आग में!

चार आदमी

छत पर ताश खेलते चार आदमी
रात को पूरे चन्द्रमा की उजास
और गली की बत्ती के भरोसे व्यक्त करते
बीच-बीच में अपनी खीज
निश्चिन्त अगली सुबह आने वाले रविवार की तरह
निरासक्त लगभग जैसे बीत चला शनिवार
डूबकर बचते, बचकर डूबते, अपनी विजय
और पराजय के बीच परखते अपनी आँख की रोशनी
दिमाग़ का हुनर हाथ की हरकत
छत पर ताश खेलते.

इतना सारा कुछ

तो कुछ चीज़ों के बारे में
इसीलिए जान सका कि वे मेरे पास नहीं हैं
एक शोर है चारों तरफ़ मचा हुआ कि
मुझे उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है

सुख ऐयाशी में बदल गया है
चुराये, लूटे या ठगे बिना
मिलना सम्भव नहीं रहा ईमानदारी से
हालाँकि ईमानदारी के बारे में भी काफ़ी शोर है
कई तरह की ईमानदारी
सब ईमानदार हैं अपनी नज़र में
दूसरे बेईमान हैं
क्योंकि उनकी ईमानदारी में नहीं आते

एक सजावटी औरत बताती है कि वह
मेरे मनोरंजन के बारे में चिन्तित है
पर हम दोनों को पता नहीं कि
हमारी ख़ुशियों की चाबी किसके पास है

डॉक्टर बताते हैं कि मुझे विटामिन्स की ज़रूरत है
और मेरा शरीर चीखता है कमी खून की है
चक्कर खाकर जो मैं गिर पड़ा तोा यह नहीं कि
नज़रें कमज़ोर हैं बल्कि
रीढ़ की हड्डी सीधी रखना भूल गया

कभी न मिल सकी
और भुला दी गयी चीजे़ इतना शोर कर रही हैं कि
जो पास में हैं उन्हें इस्तेमाल करना दूर
याद रखना मुश्किल हो रहा है

निरापद

इज़्जत बचाने के लिए उचक्कों से दोस्ती करनी पड़ रही है
चोर से बचने के लिए पुलिस का नम्बर नहीं मिलाता
राहजन की छाया में चलना पड़ता है कि
लुटेरे की नज़र न पड़े
ठग के सामने लेना पड़ता है डाकू का नाम
जेबकतरों के सामने खुद को दिखाना पड़ता है ऐसे कि
हम बटमार हैं
सेंधमार की तरह घुसना पड़ता है अपने ही घर में
और गाँव में साथ ले जाना पड़ता है अजनबी को

धर्म का नाम लेना सन्दिग्ध हो गया है या व्यर्थ
राजनीति कहते ही समझ आ जाता है कि
समय पर काम पर जाने
और लौटने में भी राजनीति है

घर जाने के समय कहना पड़ता है जाना है बाज़ार
और नौकरी बजाने से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है कि
लगे मस्ती कर रहे हैं

किसी की गलती पर
कहना नहीं कि माफ़ किया
हँसना कि हमसे भी हुई हैं कई भूलें
कई पैर छूकर लगता है दे रहे हैं गाली
फिर भ उनसे मिलाना पड़ता है हाथ

हर उपलब्धि एक भय है
पा जाने पर पता चलता है गँवा रहे हैं बहुत सारा

यही काम रह गया ख़तरे से खाली कि कुछ न करें
जो गुज़र रहा है उसे देख-सुनकर
यही बोलने में भलाई है कि
हमें आता ही नहीं बोलना

प्रतिपक्ष

राजनीति में संस्कृति और उसमें धर्म जैसा कुछ
देखने लगे सम्पादकीय
आदमी में शैतान और उसमें निश्चित तौर पर
काँइयापन था पहले से ही
इसे ले गये कहानीकार

पाँचसितारा चेहरों की उँगलियों से निकली कला-रचनाओं में
गरीबी और दुख और अपमान दिखाते-दिखाते
पत्रकार डूब गये बोतल में, उबर नहीं सके नशे के बावजूद

अफ़सर पहले से ही करते थे काव्य में मनोरंजन की जुगलबन्दी
प्यार को कै़द किया उन्होंने और बना दिया पत्थर का
कवि विश्वविद्यालयों और अख़बारों से बाहर हो गये
करने लगे राजनीति के खुले बाज़ार में फ्रीलांसिंग

इंजीनियरों को इन्सानों के ऊपर पुल बनाना था कि
नेताओं को करना था उसका उद्घाटन
उनके जुकाम का स्वास्थ्य-बुलेटिन जारी करने की दुकान थी
डॉक्टरों के पास
हमेशा की तरह बुराइयों के बारे में
कोमल विचार रखने वाले बौद्धिक एकमत थे कि कहाँ नहीं है राजनीति

सिर्फ़ उस आदमी ने इसका विरोध किया
काम के बदले अनाज देने के नाम पर जिसके कपड़े उतार दिये गये
रहता वह पहले से फुटपाथ पर था
हफ़्ता वसूलने के बाद भी उसे खदेड़ दिया गया वहाँ से

यह कैसा जादुई सच कि उसके मरने पर पता चला
वह सभी राष्ट्रीय दलों का स्थानीय सदस्य था…

समय समाप्त और बाक़ी है रास्ता 

वज़नी हो जाता है हमें योग्य करार देनेवाले
क़ाग़ज़ों का पुलिन्दा
पाते हैं हम ख़ुद को सफल हो सकने की दौड़ में
पता नहीं कहाँ पहुँचना है हमें
पूछते हैं तो अपनी ही शिकायत घिघियाहट लगती है

हमें कर दिया जाता है घर से दूर
हमारे अन्दर बसा वह पराया हो जाता है इतना कि
फिर कुछ टूटने की आवाज हमें विचलित नहीं करती
हम एक दुनिया हो जाते हैं अलग निर्जन में उजाड़
खुद को अकेला मारने की आदत पड़ जाती है

दौड़ कहीं ख़त्म नहीं होगी हम सोचते हैं
और लगता है हम केवल परिचय-पत्र हैं
चेहरा हमारा पहनकर कोई सन्त हो गया कोई शैतान
और जैसे भी बन पड़ा दौड़ जीत गया

अँधेरे में भाग रहे होते हैं हम कि रिमोट थामे
अन्धा कर देनेवाले उजाले में
कोई बदल देता है हमारा चैनल
कई आदमियों में बँटकर लड़ने लगता है
हमारे भीतर का आदमी
अच्छी-भली भाषा बोलते-बोलते
डरावने हो जाते हैं हम अबूझ बोली में बदलकर

हमारा हुलिया लापता बच्चे का हो जाता है
दीवारों पर चिपकी होती है हमारी खाल
जिस आदमी को पता होता है कि हम भगौड़े नहीं हैं
हम दौड़ रहे हैं
वह जारी करता है दौड़ में जीते लोगों की सूची
उसके पैनल में कहीं नहीं होते हम

हम कराहते हैं कि
पहले से ही तय था कौन होंगे विजयी
तो हमें बहकाया क्यों?

वह आवाज़ गायब कर देता है हमारी
और सिस्टम से मिलती है हमें
आगामी दौड़ में सफल होने की शुभकामना!

परीक्षा में प्रार्थना-पत्र

स्तब्ध है परीक्षा-भवन
प्रश्न हैं कई जिन्हें उत्तर होना चाहिए
उत्तर हैं कुछ ऐसे जो प्रश्नों से भी ज़्यादा कठिन हैं

मैं फिर पहुँचा देर से
डिस्टर्ब हुए सिर झुकाये परीक्षार्थी
परेशानी में पड़ गये निरीक्षक
हाज़िरी भेजी जा चुकी है कण्ट्रोल-रूम
मैं अनुपस्थित होकर भी वहाँ हूँ
अन्दर आने दिया उन्होंने सौ झंझटों के बाद
रोल नम्बर ने मुझे जगह दी बैठने की
परिचय-पत्र ने शिनाख्त की मेरी

पत्र लिखने का प्रश्न करते हुए मैंने सोचा
कई तरह के पत्र लिखने पड़े हैं मुझे
जितने लगते हैं आसान होते नहीं हैं
दुख यह कितना बड़ा कि उतने दोस्त नहीं लौटे ज़िन्दगी में वापस
लौट आयीं चिट्ठियाँ तमाम: फिर भी जवाबी कम ही मिले

नौकरी के लिए आवेदन किया: प्रेम का निवेदन
घर को बचाने के लिए पत्र लिखा
बीमारी के वक्त माँगा अवकाश
प्रार्थना के विरोध में खड़ा एक आदमी
सभी पत्रों में गिड़गिड़ाता रहा

मैंने तय किया किसी भी पत्र में
शीघ्र कृपा करके अनुकूल होने की याचना नहीं करूँगा

मैं हर बार की तरह लिखूँगा
प्रार्थी-हेमन्त कुकरेती
हर बार की तरह पढ़ा जाएगा-क,ख,ग

ढूँढ़ते हैं ऐसा सपना

जब जागती है प्रार्थना
हत्यारे की आत्मा में तना हुआ चाकू
पीला पड़कर काँपने लगता है

विदूषक में फूटती है हँसी
और वह अपने लिए रोता है जी भरकर

मैं दूध लाने के लिए तोड़कर अपनी नींद
सोये हुए बेटेको देखता हूँ
वह मुस्कुरा रहा है देवताओं की
किसी भूल पर

यादें जागती हैं: जागते हैं लापता दोस्त
पीटर की कब्र मॉस्को में है
अयूब दफ़न है लेबनान
इतनी जल्दी सो गये दोनों कि
नींद तक स्तब्ध है अब तक

समय काटने को ही नौकरी माना जाता है
रोज़ श्मशान से बस पकड़कर
जाता हूँ एक पागलखाने में
इसी आने-जाने का पैसा पाता हूँ मैं

यहीं मेरा पड़ोस है
इसी नगर में है मेरा उठना-बैठना
कट रहा है जीवन इसी दुनिया में

लोगों को देखता हूँ
वह अकसर मृत मिलते हैं या सोये हुए
एक अन्तहीन लाइन में लगे हुए मिलते हैं बच्चे
अपने बुढ़ापे में उनींदे
बूढ़े कभी नहीं मिलते चैन की नींद सोये हुए

जिसके टूटने का डर नहीं हो
सब ढूँढ़ते रहते हैं ऐसा सपना
और अचानक जागकर देखते हैं
वह कौन है जो रो रहा था…

इतने ऊँचे से

इतने ऊँचे से देखता हूँ
नीचे मैदान में धीरे-धीरे रिस रहा है पानी
सूरज अपनी किरणें सामनेवाले घर की खिड़की के काँच से टकराकर
फेंक रहा है मेरी आँखों की तरफ़

लड़के खेल रहे हैं नीचे
गीली ज़मीन पर उनके गरम तलुवे पड़ते हैं तो भाप उड़ती है
यहाँ से भी दिख रही है उनकी ख़ुशी
उनकी आवाज़ तो जा रही होगी अन्तरिक्ष में

यह क्या किया उन्होंने कि
पृथ्वी को गेंद की तरह उछाल दिया
कई सधे हाथ मज़बूत कन्धों से जुड़े आतुर हैं उसे लपकने को

रसोई से पके हुए अन्न की खु़शबू
आसपास और नीचे भी जा रही होगी
देखता हूँ और सुनता हूँ
सोचकर कहता हूँ कि ऊँचाई से
चौड़ाई और गहराई ही नहीं
अपने से भी ज़्यादा ऊँचाई दीखती है

सिर्फ़ देखना पड़ता है कि
कई हमसे भी नीचे रहने को विवश हैं
और हम सभी से ऊँचे नहीं हैं
इसे ध्यान में रखता हूँ
इसीलिए हर ठोकर पर ठिठककर बच जाता हूँ: गिरता नहीं हूँ

मेरे पैर के नीचे ज़मीन होती है
सिर पर आसमान
इस सच को मैं अपने बिलकुल पास रखता हूँ
और डराता नहीं हूँ किसी को…

देखकर समय का अन्धकार

ख़ूब चलने के बाद मैं और चलता हूँ
रुकने के बाद भी मैं रुकता नहीं
जो चल रहा है मैं उसमें हूँ
पृथ्वी में मेरा होना दर्ज़ है ऐसे ही सूर्य के
चलने का दस्तावेज़ मेरे उल्लेख के बिना अधूरा है

नक्षत्र जो विश्वास दिलाते हैं अँधेरे को पीकर रोशनी फैलाने का
जमे हुए अन्धकार में, मेरे साथी हैं
जो दिशा उजली है मेरी आँख है भेदती है अँधेरे की चट्टान
मेरी उँगलियों पर गिनो सृष्टि के प्रकाशवर्ष

दो फसलों के बीच जो बचे हुए दाने हैं
मेरी भूख है तो उन्हें कहा जाता है अन्न
हारते नहीं मौसम से सूखकर जीवन रस बनते हैं बीज
गलाकर काया प्रकाशित करते हैं पृथ्वी की हरी रोशनी

हाहाकार में जीवन के निशान बचाने के लिए
मैं अपने समय से लड़ता हूँ
यह घर में आदमी को बचाये रखने के लिए ज़रूरी है

मैं जानता हूँ अँधेरे में जीने की मजबूरी
चलकर आता हूँ मैं अपने सुरक्षित एकान्त से
और चला जाता हूँ दूर
वहाँ होता है सब के पास
चोट खाने पर मुझे दर्द होता है
सोचता हूँ अपने रोने के साथ ही कभी-कभी
देख लेने चाहिए आँसू जो बहते हैं किसी के अँधेरे में
सूखने से पहले सुन लेनी चाहिए उनकी आवाज़

मैं देखता हूँ अपने समय का अन्धकार
और यह देखना जानना है उजाले को
मेरी हँसी रुलाई से उपजी है
मैं उन सारी लकीरों को बदल देना चाहता हूँ
जिनके अर्थ डरे हुए हैं विवश…

अँग्रेज़ मेहमान का प्रश्न

बड़ी मेहरबानी की उस अँग्रेज़ ने
था वह उनसे अलग नहीं जो ज़्यादा पैसा जमा करने के बाद
अविश्वसनीय फक्कड़ और सहने लायक उदार हो जाते हैं
उसके पूर्वजों ने जिस देश पर राज किया
वहाँ वह नौकरी करने आया बड़ी मेहरबानी की

दोस्त मेरा कृतज्ञ हुआ
उसे अपनी एक पीढ़ी से अर्जित अँग्रेज़ी सुनाकर
और पुश्तैनी अमीरी दिखाकर
सोचा दोस्त ने अँग्रेज़ ले जाएगा उसे अपने साथ
उस भद्र पुरुष ने दोस्त को कृतज्ञ होने के कई अवसर दिये

गया वह दोस्त के साथ उन बस्तियों में
जहाँ जीवन खट्टी सड़ाँध का नाम है
दोस्त शर्मिन्दा होता रहा
सुगन्धित रूमालसे मुँह ढककर उसने ग़रीबी को नहीं
ग़रीबों को हज़ार गालियाँ दीं
बताया कि पापी को पार्टी में शामिल करने
और पाप को सनातन समस्या बनानेवाली उसकी सरकार की
भरसक कोशिशों के बावजूद ये निकम्मे लोग
कभी ऊँचा नहीं उठाएँगे अपना जीवन-सतर

सरकारी भाषा में भी वह दे नहीं सका अँग्रेज़ मेहमान के
इस प्रश्न का उत्तर
कि अपनी ग़रीबी की गरमी से परेशान ये लोग
सड़कों पर सोकर क्या उसकी सरकार का विरोध कर रहे हैं
या उस व्यवस्था से विद्रोह
जिसमें उसका जन्म हुआ

चाँद पर नाव (कविता) 

आओ! चाँद पर नाव चलाते हैं
उसने गम्भीर होकर कहा
आसपास हत्यारे थे उनके हत्या करने के विचार
इन दिनों छुट्टियाँ मनाने परिवार सहित गाँव गये थे

जुलूस में गये हुए पड़ोसी गला बैठ जाने से
गरारे कर रहे थे
परिवार में दूर के सम्बन्धी के मरने की
चार दिन पुरानी ख़बर
रोटी के साथ परोसी गयी
स्कूल से भागे हुए बच्चे ज़्यादा ख़ाने से परेशान थे
हँस-हँसकर पेट दुख रहे थे औरतों के
जोा सर्दियों को बुन रही थीं
अपने पतियों के मज़ाक़ के साथ

सूरज वक्त पर उगता था रात समय पर होती थी

राजधानी में सूखे का डर नहीं था
सरकारी घोषणाएँ डरी हुई थीं मित्र देश के गृहयुद्ध से
बच्चे जन्म ले रहे थे बूढ़ों की उम्र बढ़ रही थी

उसने मज़ाक में नहीं कहा था कि
चाँद पर नाव चलाते हैं
यह बात उससे गम्भीरता से कहलवाने में
किसकी भूमिका थी?

समाज में जो जहाँ था उसे वहाँ नहीं होना चाहिए था

आसपास रेत थी नाव नहीं थी कहीं
चाँद इमारतों के पीछे छटपटा रहा था

होते हुए बड़े 

बड़े होते-होते ढेर सारी चीजे़ं हम तोड़ चुके होते हैं
उम्र बढ़ती है पर ज़रूरी नहीं कि कम हो जाएँ मुश्किलें
करते रहते हैं कितनी मूर्खताएँ
भावुकता की मार झेलकर छलनी हो जाते हैं हमारे शरीर
कमज़ोर पड़ जाते हैं दिमाग़

कितने सारे लोग बर्दाश्त करते हैं हमें
सहते हैं हमारे अन्याय चुप रहते हैं माफ़ नहीं करते
इसी तरह हमें मिलती है सज़ा

हमारे साथ इस दुनिया में आये लोग दुनिया से चले जाते हैं
कुछ लोग आकर रह जाते हैं सिर्फ़ हमारे लिए
हमें कभी नहीं मिलते कुछ हमें ढूँढ़ते रहते हैं
कुछ के लिए हम खोदते हैं पहाड़
कुछ हमारा पीछा करते हैं पत्थर लेकर

हमेशा तो हँस नहीं सकते हम
शोक में डुबा नहीं सकता हमें बड़े से बड़ा दुख
सदा के लिए
बड़े-बड़े आदमी आते रहते हैं हमारे जीवन में
कष्टों की तरह
अपनी विवशताओं और उनकी इच्छाओं के खिलाफ
हम बड़े हो जाते हैं

ज़्यादा खाने के लिए भूखे रहते हुए हम कहीं बड़े होते हैं
कहीं प्यासें अड़ी होती हैं हमें बुझाने को
इस तरह बड़े होने में हम कहीं होते हैं छोटे

कौन नहीं जानता हमारे बड़े होने में छोटे होते जाते हैं कपड़े
सबको पता है कि
कपड़े पहनते हुए वह कपड़ों के सामने भरसक छुपाता है शर्म
और सिन्थेटिक रेशे की तरह हो जाता है नंगा
हमें बड़ा करते हुए कई चीजे़ं खो जाती हैं
टूट जाते हैं हम कुछ चीज़ों के लिए
चोरी हो जाती हैं कुछ चीजे़ं छीन ली जाती हैं हमसे

हमारे बड़े होने का चक्कर लुटने और गुमा देने का है
या चीज़ों के आगे कम पड़ने का

बड़े होते-होते हम टूट चुके होते हैं बड़ी बुरी तरह

आवाजे़ं

मन के संकेत जाने कब बिसर गये
अब हम बखूबी समझते हैं मशीनों के इशारे

नदी को आदमी ने बालटी में भरकर उलट दिया मशीन में
बिजली की ठेस से निकली बजर की आवाज़
कहा उसने इतना ासमय काफ़ी है कपड़े साफ़ करने को

जाने क्यों आदमी की तेज़ होती साँसें रुकने लगीं
यह थी आदमी के डरने की आवाज़
क्या पता किस आवाज़ से डरकर बच्चा उठा नींद से रोते हुए
हम छुड़ाते रहे अपनी काया का मैल

असर नहीं करती प्यार की आवाज
घर के कुएँ में गूँजती रहती है किसी के खीजने की आवाज़
एक कमरे में होती रहती है भागने-गिरने की आवाज़
दूसरे में पकते हुए अन्न की खुशबू से भरपेट अघाये हुए आदमी की आवाज़

तीसरे में पीछा करती है टूटे हुए सपनों की आवाज़
चौथे कमरे में आखि़रकार अकेले पड़ने की आवाज दबोचे रहती है हमें

इतने कमरों में कोई कोना नहीं मिलता
जहाँ कोई बाहरी आवाज़ नहो
और हम सुन सकें अपनी आवाज़

भीख माँगने में नाकाम होने के बाद

भीख माँगने में भी नाकाम होने के बाद
मैं दुनिया में गया
वहाँ कीड़े जैसी मौत मेरे इन्तज़ार में थी
इस तरह मरना मुझे बुरा नहीं लगा

नफ़रत है मुझे सख़्त उन लोगों से
जो हारे हुओं की मौत को समारोह में बदलकर यश कमाते हैं
ज़रा उनको देखो जिनका जीवन
ऐसे मरे हुए आदमी के कारण नरक हो गया
दोष इतना था कि वे उसके घर में रहते थे

कहकर मैं रुका तो देखा लोगों की तालियाँ जमी हुई हैं
एक हाथ में मौत और दूसरे में जीवन!
मृत्यु को इस तरह पिटवाने में मुझे ख़ूब आनन्द आया

ठीक तो ठहराना था मुझे अपनी मौत को

अच्छा तमाशा ख़त्म
बदबू उठने से पहले अपनी मिट्टी को उनसे बचाना है
जो इसमें अमरता ढूँढ़ने लगेंगे

मित्र!
तुम उनके कारण मारे गये
जो कहते थे तुम्हें पैसों की क ज़रूरत
तुम खाना तो खाते नहीं
कपड़े किसलिए चाहिए तुम्हें: जब घर तुम्हारा है नहीं

अभय!
उन्हें यह भी नहीं पता कि धरती पर रहनेवाला यह आदमी
आकाश देखता रहा
आग उगलता रहा
प्यास लगने पर पानी पीने को नहीं मिला समय पर
हवा खाकर जाने कैसे बेहया ज़िन्दगी जीता रहा

करुणा!
ये लोग वही होंगे
जिनके काम करते हुए इस आदमी ने अपने हाथ कटवा दिये

मन लगाकर

बिजली के तार पर अटकी पतंग
फरफराती है: छूटती नहीं
बारिश गला देती है उसे

रात को जाने कहाँ से
एक पुराना गीत हवा में लरजता है
टूट जाता है मुझ तक आते-आते

सप्तर्षि अपनी चारपाई मेरे नज़दीक बिछाते हैं
आकाश कुछ और धँस जाता है उनके खलल से

कुत्ते अपने पूर्वजों की नीतिकथा को
याद करके आदमी के और नज़दीक कर देते हैं
बिल्लियों को

रात को दरे से लौटता आदमी
अपने अगले दिन की भूमिका से डरकर
ढह जाता है बिस्तर पर

पृथ्वी की थकान रात के संवादों का अन्तराल तोड़ती है
और कै़द से छूटने का इन्तज़ार
मन लगाकर करने लगता है
दिन

देश का प्रेम

देश को भी दलाल चाहिए
चलाने के लिए
कुत्ते को घुमाते हुए बताते हैं
समकालीन

इसी रास्ते भारतभाग्य विधाता लौटता है
प्रेम में पुलकित होकर

हमारे सारे विरोध एक होकर भी
सही बदलाव नहीं ला सके तो
मैं कहूँगा
तुमने ठीक आदमी नहीं चुने
मेरे साथ मेरे मुँह पर नहीं कहते
कि मैं मक्कार हूँ
या बार-बार ठगा गया एक इन्सान

नुक्स जो मुझमें दिखते हैं
नहीं बताते कि
कमियाँ दरअसल मुझमें
आयीं कहाँ से

खम्भे की तरफ़ टाँग उठाये
पाँच दशक पुराना बूढ़ा
बताता है
वहाँ से!

उस दिशा में कोहराम है
घुटकर रह गया है प्रेम
जनगण का

यह कैसा ग्लोब बनाया हमने
कि कहीं नहीं बची
घर जाने की राह

आखि़री आज़ादी

उसने कहा मैं बहुत गोरा हूँ
मेरे सामने आओ तो चेहरा ढककर
हम उसके पैरों की तरफ़ देखने से भी डरते रहे

कुछ साल बाद वह आया
मुझे भूख ज़्यादा लगती है इन दिनों पचता कम है
हमारी रोटियाँ सहमकर सूख गयीं

वह फिर आया खू़ब महँगे कपड़े पहनकर
क्या सूझी उसे और कपड़े उतार फेंके
मारे शर्म के हमारे कपड़े उधड़ने लगे

अब फिर उसके आने पर हमने देखा कि
मोटा था पहले से
मोटा होने के बावजूद लम्बा भी लग रहा था
आते ही बोला मुझे चाहिए अधिक जगह
हम तो हटे ही अपने घर भी हटा लिये
सोचकर कि उसक रास्ते में आते हैं

बदशक्ल समय के उस प्रतिनिधि को
हम चुनते हैं
और वह फैसला करता है हमारे बारे में
सुनते हैं, वह इन दिनों लगातार आएगा
हमारी भूख़ हमारी शर्म और हमारी ज़मीन को
अपने नाम कर लेगा
कहेगा-अभी तुम इनके लायक नहीं हो
वक़्त आने पर सौंप दूँगा
वक़्त जिसे वह कभी नहीं आने देगा

जब मैं खुश हुआ

जब मैं ख़ुश हुआ
मैंने सूरज को
दिनभर की कै़द से
आज़ाद कर दिया

सप्तर्षियों का मुँह तकती
हिरनियों को
मैंने बता दिया
कस्तूरी का पता

चाँद पर ऊँघती बुढ़िया को
मैंने गिनकर दीं
पूरी इकतीस पृथ्वियाँ

प्यासी सीप में
मैंने चुआया अपनी तर्जनी का
एक बूँद खून

मैंने बादल का चेहरा चूमा
और आकाश पर लिखा एक नाम
डूबने से डरे बगै़र
बारिश में तैरायी यादों की नाव

अपनी खाल से बुना
मैंने रातरानी के लिए स्वेटर
नाखूनों की सुई बनाकर
ओस के लिए गठे एक जोड़ी जूते

मैं जब ख़ुश हुआ
मैंने टटोले आँसुओं के सिक्के

मैं हँसा कि
गिरी नहीं उनकी क़ीमत!

जाते हुए अँधेरे में मेज़

अँधेरे में दुख की तरह चमक रही है मेज़
धूप वहाँ है जहाँ छाया का स्पर्श किये बगैर हवा को जाना है

अकेले पेड़ के पास पीली पड़ती घास
और मेज़ पर बैठी रास्ता भूली चिड़िया उदास है
कम होतीं चीज़ें घबराकर आपस में टकराना छोड़ रही हैं
उनका आवाज़ करना कराहने जैसे दुख को गुँजाता है

मेज़ का जीवन मुश्किल होकर सहने लायक भी नहीं रहा
जो भीतर घुटता रहा ऐंठ रहा हैअब भी चल रही हैं आरियाँ
उड़ रहा है दिल बुरादे में

मेज़ के जीव में पेड़ के प्राण हैं
आत्मा जड़ों में है छुपी हुई देह पर कीलें जड़ी हैं
उसका जन्म कष्टों में सम्भव हुआ
दिखता नहीं बहता था जो ख़ून यातना की यह राह

भरी-पूरी सुबह में ओस के साथ कितनी अकेली
और कितनी ज़्यादा कम लग रही है यह मेज़

कमज़ोर सूरज की काँपती हुई उँगलियाँ
उसको छू रही हैं बहुत डरकर
वह पेड़ का कटा हुआ हाथ है सिहरन होती है उसमें
और उसे देखने वाला पेड़ अपनी जड़ों में
घुटकर रह जाता है

तमाम पेड़ों की पत्तियाँ गिर रही हैं उसकी याद में

मेज़ की टाँगों के बीच आँखें बन्द किये
बसन्त की सिसकियाँ जाते हुए अँधेरे को घना
और धूमिल कर रही हैं सुबह को

मवेशियों की प्रार्थना

पहाड़ झड़ गये हैं अपनी शाखों से
पेड़ों की जड़ों के नीचे सुलग रही है आग

पृथ्वी के गर्भ में सदा के लिए
सोने की सोच रहे हैं झरने
बीज बनने की जगह पर उग आया है
पथराया शोर

कहाँ जाएँ हम
हवाएँ भी बैठ गयी हैं छुपकर
रोक दी गयी हैं दिशाएँ

रात की तरह काट रहे हैं हमें
हमारे पैर
लोहे की तरह बज रहे हैं जंगल

बस कुछ ही देर है
गड्ढे में बैठ जाएगी धरती

गिर रहे हैं पीले पत्ते
आँखों में खुल रहे हैं रेत के मैदान

आज के बाद केवल शीशों में मढ़े मिलेंगे
साबुत पहाड़…

सिलबट्टा

जाने कहाँ की सभ्यता से निकला है वह
पत्थर नहीं है वह केवल
एक दुनिया है उसकी
और हमारी रसोई में वह सबसे पुरानी धरती है
जिस पर सबसे पहली माँ जीवन के स्वाद को बढ़ाने के लिए
पीस रही है प्राचीन वनस्पतियाँ

क्या वह पूजा-कथाओं का कोई देवता है ऐसा
जिस पर नहीं लगाना पड़ता हल्दी-चावल का तिलक
न उसे प्रसन्न करने के लिए पढ़नी पढ़ती है कोई आदि कविता
उदास लगता है वह
एक कोने पर पड़ा हुआ सुनता है मशीन का रौरव
जिसमें बाहर निकलने पर मसाले अपने रस से छिटक जाते हैं

परिवार के इस बुजुर्ग से समय मिलने पर ही
हो पाती है बातचीत
और समय कितना कम है हमारे समय में
हमारी नसों में बसे नमक और बहते हुए खू़न में
उसका भी अंश है
हर दाने के साथ हमारे भीतर प्रवेश करता है
उसके कई घर हैं कई द्वार कई खिड़कियाँ
कई चेहरे हैं उसके

कई सदियों से जीवित है वह
जैसे पेड़ हर वर्ष अपने तने में बढ़ा लेते हैं एक वृत्त
वह हर बार हमारे लिए लेता है जन्म
उसकी कई कहानियाँ हैं अनेक संस्मरण

किसे याद करें जो भुला दिया हो
कुछ भी नहीं है ऐसा
कि दूर ही नहीं हुआ वह कभी हमारे जीवकोषों से
वह पुरखा है हमारा जो कई-कई सदियों से हममें बसा है।

शाश्वत

(एक गढ़वाली लोकगीत से प्रेरित)

पृथ्वी बची रहेगी
नष्ट हो जाएगी दुनिया
बनेगी फिर से
मैं ही रचूँगा सृष्टि

हमेशा नहीं रहेगी
दुख की ज़मींदारी
पत्थर काटकर उभरते
बचे रहेंगे
सुख के हाथ

सदा रहूँगा मैं
बस बदल जाएँगे लोग…

नक़्शे में खून 

यह नक़्शा पुरानी दीवार पर ऐसे चिपका है
कि मुझे देखकर डर रहा हो

क्या-क्या समेट सकता है यह नक़्शा अपनी रेखओं में
मेरा भय कि हर सुबह मुझे वहाँ पहुँचना है
जहाँ मेरा कोई इन्तज़ार नहीं करता
मेरी ख़ुशियाँ क्या इसके सागरों में डूब गयी हैं?

जब हम दुखी होते हैं तो पहाड़ की तरफ़ दौड़ते हैं
पठारों पर छुपते हैं
या महानगर में आ जाते हैं मरने के लिए
नक़्शे में कोई नहीं भागता

नक़्शा कोई बाघ है क्या
जिसके दाँतों पर मेरा मांस लगा है
अपनी आज़ादी से ऊबे हुए
लोगों का कोलाहल है नक़्शे में
एक मक्खी मँडरा रही है नक़्शे पर
कहाँ है उसकी जगह?

बाहर आकाश घिर रहा है
मैं भागता हूँ अपने घर
नक़्शे में उसका कोई ठिकाना नहीं है
वहाँ धूल है जिस पर मेरा खू़न टपक रहा है टप्-टप्-टप्

हमारी नींद

एक-दूसरे का ग़म खाकर
अभी हम सोने की सोच ही रहे थे कि
मछलियाँ जीवित होकर छटपटाने लगीं
झुलस गयीं हमारे हिस्से की वनस्पतियाँ
नदी छलछलायी थाली में

रोगी थे हमारे शरीर
हमारे बिलों में पहाड़ों की हवा?
और पानी कैसे मिलते?
वहाँ अभावों की पीली पड़ती हुई
चिट्ठी-पत्री थी
उन्हीं को बचाना मुश्किल हुआ जा रहा था

ताजे़ फल और सब्ज़ियाँ खानी थीं हमें
हमें थमा दी गयीं गोलियाँ
कि उन्हें खाकर मरो
कैसे कटता रोग

हमारा पसीना दुनिया के बैंक में
जिसके खाते में जमा था
वह खाने की जगह हमें खाता था
ख़ून हमारी नसों में कैसे बहता
उसे तो वह चूस रहा था
अब हम रोते हैं तो वह शिकायत करता है
कि उसे सोने नहीं देते
हम आपस में बोलते हैं तो वह रिपोर्ट लिखता है कि
हम दंगा कर रहे हैं

हम सो कैसे सकते हैं
हमारे सपनों के तो शेयर खरीद लिये गये हैं

चप्पलें

रूठी हुई चप्पलें पैरों में चुभती हैं
और अच्छे-भले लगते आदमी की तरह
एक दिन अचानक टूट जाती हैं

चप्पलों के निश्चित इलाके़ में
नंगे पैर जाना होता है
उनकी आदिम बेडौलता को ढकते हुए
चप्पलें उन पर हावी हो जाती हैं

हमारे तलुवे कठोर होते हुए चटकने लगते हैं
चप्पलें उनसे ऊबी हुई घिसती रहती हैं

चप्पलें कभी बेकार नहीं मरतीं
इतनी शानदार होती है उनकी मृत्यु कि
हमारी गर्दन तक झुक जाती है

पैर जानते हैं कि
हर बार उनके हिस्से की ठोकर
झेलनेवाली चप्पलें
उन्हें बचाने के लिए ही
टूट गयी हैं

ज़ख़्म पर चीरा

ज़ख़्म पर चीरा डालकर निकाली जा चुकी है
अपने ही जीवकोषों से बनी गाँठ
अस्थि और मज्जा में बची हुई गन्दगी को जला देने के लिए
खौलता हुआ तेज़ाब-सा डाल दिया है रूई में लपेटकर
शान्त हो जाएगी जलन
झेलने की आदत डाल देते हैं घाव

ज़मीन है जिस्म के बाहर
वहाँ छिटक गये ख़ून के छींटे उसे छलका रहे हैं
सीमेण्ट जैसे कठोर चिकने मुख
विवर्ण हो गये हैं मास्क के नीचे

कराहटें अभी गूँज रही हैं
आत्मा के कण्ठ में बैठ गयी है आवाज़
कपड़े सूखे नहीं हैं पसीने से लथपथ
गीले हैं चोट की तरह: सूखेंगे खाल की तरह…

मुश्किल से सिला गया था घायल शरीर
फिर भी कितना कुछ बिखर गया
दर्द के बहाने हैं अनेक,
बहुत सारे रास्ते हैं प्राण निकलने के
भीगी पट्टियाँ लाचार हैं और अधिक रक्त रोकने से

पाथफाइण्डर मंगल की यातनाओं के चित्र भेज रहा है
नर्स की आँखों में है जीवित मशीन
मेरी बेचैनी का एक्स-रे उसके चेहरे पर छपा है

बाहर करुणा से भरे हैं मित्र या सहमी हुई शक्लें
पत्थर को भी भेद देती है नज़र-कहता है कोई
और भय में डूबा हुआ चेहरा देखकर
देखने लगता है दूसरी तरफ़

सताये हुए हैं सब
पीड़ा के मारे हुए लोग जब पूछते हैं-कैसे हो?
जु़बान पर चढ़ा हुआ-‘ठीक हूँ’-वाक्य टूट जाता है

सहने का पूरा अभ्यास नहीं है अभी
धीरे-धीरे आएगा
धीरे-धीरे भर जाएँगे कष्ट
धीरे-धीरे उनकी स्मृति मिटने को होगी कि
बार-बार खुल जाएँगे उनके टाँके
नहीं बचा सकते तो हँसते हुए सहना सिखा दो!

सहा नहीं जाता यह महादंश

वसन्त में रोना सुनकर

यह मेज़ जिस पर कुहनियाँ टेककर
मैं पीली पड़ती घास के बारे में सोच रहा हूँ
एक पेड़ की स्मृति में विकल है

कच्चे हरे रंग से छलकती
इस याद में बुरादे की गन्ध भी है
और आरी की आवाज़ से तो देखो
यह अब भी रह-रहकर काँप रही है
पेड़ की पहली-पहली कोंपलों को जैसे हवा ने छुआ
इस सिहरन को भी महसूस करो

यह वसन्त का बिगड़ना नहीं
मार्च की धूप का राख होना है
जो शब्दों के चेहरों को ढक गयी है

इस लकड़ी में कुछ काग़ज़ हैं स्याही और दर्द से काले
इसमें मेरी नावें हैं रेत में धँसी हुईं

छोटा था बहुत तो चौराहे पर गाली देते हुए लोगों
और अकेले में सिसकती आवाज़ों से
परेशान होकर अकसर पूछता
कहाँ है वह दरवाज़ा जिसकी देहरी से दुख आते हैं
और चारों तरफ़ आँसुओं की आवाजाही क्यों है!

अब भी उमड़ता है यह सैलाब
जब कोई भरे कण्ठ से कहता है
गीली आवाज़ में कोई कहानी

जैसे उलट गया हो सब कुछ

पेड़ शाखाओं को समेटता हुआ लौट आया हो
अपने बीज में…

लय

जो सबसे ज़्यादा आसान दिख रहा है
बेहद मुश्किल में है
जिसे कहते हैं जीना
यह साँसों की आवाजाही है, बस

समय ऐसा है कि सबूत के लिए
मिटा दिया जाता है सच
सच के लिए कहा जाता है
बोल इसलिए रहे हैं कि
हमें झूठ बोलने की सुविधा नहीं है

लोग हँसते नहीं हैं कि समझा जाएगा
उसे उनका रोना
छुपाते हैं आँसू कि कुछ लोग पूछेंगे
वे सुखी क्यों हैं?

चीख़ों से पता चलता है कि कहीं
हमारे आसपास कुछ हो रहा है ग़लत
घुटती हुई-सी आहें बताती हैं कि
उसका विरोध किया जा रहा है

उजले चेहरे अपने समय की कालिख से
धूमिल पड़ रहे हैं
बच्चों की भूख के लिए पानी भी नहीं बचा
फसलें गोदामों में नहीं
बरबाद हो रही हैं तहख़ानों में
हड्डियों को जंग नहीं, चाट रहा है नशा
बेमतलब किया जा रहा है वज़नी शब्दों में रखकर
इसी समय में

उन्हीं पुराने रास्तों पर दौड़ते हुए हम घिस गये हैं
इतनी हो गयी है टूट-फूट कि
बेकार है मरम्मत करना
फिर भी हम आते हैं और जाते हैं

इस वक़्तकटी को हम कई सुन्दर नामों से
पुकारते हैं
तब अपनी ही आवाज़
किसी अन्धे विवर में गुम होती लगती है

जीवन की तुकों को बटोरते हुए लगता है
गँूगा हो जाऊँगा

एक आदमी लगभग डाँटते हुए पूछता है कि
लय में
क्यों नहीं कहते अपनी बात?
उसे बताता हूँ कि जिसे कहते हैं लय
वह साँसों से बड़ी है

वही नहीं है हमारे पास

यह शहर अपने दरवाजे़ पर 

यह शहर अपने दरवाजे़ पर
स्वागत नहीं करता
उतारता है इज़्ज़त

बड़ी उम्मीद लेकर
आते हैं आप दूर से
आने और लौटकर जाने की
डगमगाती नाव में बैठकर
पाते हैं कि
क्या ग़लत जगह आ गये हम!

नाम-पता वही है
वही है आदमी भी
जिसके नाम का पट्टा पहने
भेड़िया हो गया है कमरा

अभी तुम साबुत हो तो
उसके जबड़ों पर
किसका खू़न है

वह आदमी बहुत अच्छा है कि
सुन्दर है दिखने में
पहने हुए है कितने साफ़ कपड़े
बोलता है कितनी प्यारी आवाज़ में
बार-बार कहता
घर आइए कभी…

इसकी जु़बान तो सुनो
इतनी शुद्ध कि संगमरमर
लेकिन यह क्या
वह चाय का कप नहीं
अपना रौब निकालकर रखता है
आपके सामने
कहिए! क्या काम है?

जानकर कि वह
आपका नाम भूल गया
आप कुछ का कुछ कहने लगते हैं
शर्मिन्दा होते हैं कि साहब क्या सोचेंगे
कुछ गालियाँ जो आप खु़द को देते हैं
काम आती हैं इसी वक़्त
आप व्यस्त हैं फिर तकलीफ़ दूँगा
कहकर चल देते हैं

कितना बड़ा आदमी
जिसे देखिए
यहाँ हर कोई ऐसा ही

चार चिट्ठियाँ लिखने के बाद
आप फ़ोन करते हैं उसके घर
एक मशीन बोलती है
यहाँ कोई नहीं है
कोई सन्देश हो तो कहिए!

बची-खुची इज़्ज़त सँभालते
आप देखते हैं कि
दीवारें पटी हैं इबारत से
‘फिर आइए
आपका हार्दिक स्वागत है…!’

मैं

मैं पृथ्वी का अटूट धैर्य हूँ
और आकाश की अतल चुप्पी
पानी से भी ज़्यादा पतले मेरे दुख
काटते रहते हैं मुझे
आग की तरह लपकता हूँ सुखों की तरफ़
फिर भी हवा जैसे व्यापक हैं मेरे डर

हो सकता है कि मैं एक पर्दा होऊँ
खिड़कियों पर हिलता छुपाता छिपकलियों को
एक कोने पर टँगा हुआ
लकड़ी का मन्दिर भी हो सकता हूँ मैं
ज़मीन से उठा
ताँबे की मूर्तियों से घिरा हुआ सन्न

शायद मुझे पसीने से लथपथ कमीज़ माना जाता हो
दरवाजे़ पर लटकी हुई
पत्थर की दीवारें हैं जिसकी
ऐसे एक अकेले घर के शोर में छोड़ा हुआ पेट-भर खाना
या पटका हुआ जूता भी लग सकता हूँ मैं
धूल में सना हुआ बेदम बेरंग
धूप में पिघलने को छत पर फेंकी
प्लास्टिक की कुर्सी भी कह सकते हैं मुझे
मुझसे थरमस का काम भी लिया जा सकता है
मेरा काँच टूट गया है
और बच्चे मुझमें झूठमूठ का दूध भरकर खेलते हैं घर-घर

कई बार केवल क्रोमोज़ोम समझा जाता है मुझे
दो के मिलने से तीसरा बना हुआ
चौथे में बसने से पाँचवाँ छठे में रचा हुआ
मैं कैमिकल हूँ या धर्म या भूख
जिसने शाश्वत होने की साँसत में डाल रखा है
मैं काठ की मेज़ हूँ या उससे गिरकर ठण्डे फ़र्श पर छटपटाती टॉर्च
अँधेरे को उकसाती अपनी रोशनी में टिमटिमाती
मोमबत्ती की लौ
या जाने कहाँ से आती हवा से हिलता कैलेण्डर
कष्ट के दिन धरे हुए हैं जिसकी छाती पर
बिस्तर पर सोई किताब जिसमें उफ़न रहे हैं सागर
या बहुत पुराने अचानक मिल गये ख़त में
उभरती कोई परछाई
जिसे अब भी पहचाना जा सकता है

मैं खुली जेल हूँ या खुलने के इन्तज़ार में बन्द पड़ा मकान
कहीं नहीं जाता रास्ता हूँ या बाढ़ से घिरा गाँव
जहाँ बूढ़े और स्त्रियाँ बच्चों की तरह रो रहे हैं
काँसे में ढला तानाशाह का सिर
अपने सन्नाटे में स्तब्ध करता हुआ
जेब में पड़ा चाबियों का गुच्छा
जिनसे कोई ताला नहीं खुलता
खिड़की के पल्लों में दब गयी उँगली
जिसका नाखू़न उखड़ गया है और जिसके लिए रात
अनन्त हो गयी है

जीने की ललक से रँगी बूँद से लाल हुई
चे ग्वेरा की आखिरी कूद में उड़ी हवा हूँ
या भाप बनकर करुण आँखों में मुस्करता
बुद्ध के चरणों पर गिरा आँसू

चटाई का भीगा कोना
जो जून में सूखेगा जब प्यार किया जाएगा
और ठण्डक से पहचाना जाएगा किसी का आना
बहुत पहले खो गया और आज दिखा सिलाई उधड़ा नन्हा-सा स्वेटर
तलवारों के बीच जश्न मनाते चेहरे:
बारूद से चीथड़ा हो गयी सिसकी
गैस-चैम्बर में घुटती हुई चीखें: तेल में लिथड़ा हुआ कपोत
चींटियाँ जिसे उठाकर ले जा रही हैं क्या मैं वह दाना हूँ
या दो उचक्कों की जीत के लिए लड़ रहे
उन सैनिकों की स्मृति हूँ जो कभी नहीं लौटेंगे

औरत की पीठ पर छपी चमड़े की बेल्ट
बच्चे के गाल पर खुदी उँगलियाँ
अबूझ लिपि में लिखी दवा की पर्ची
नौकरी पाने की उम्मीद
मन जैसी किसी जगह में बची हुई
ऐसे कई दूसरे उपयोग भी सोचे गये हैं मेरे

इतनी सारी चीजे़ें जिस आदमी को बरतती हैं
इतनी सारी चीजे़! वही हूँ क्या मैं
क्या पता चीजे़ं मुझे देखती हों
एक बेकार चीज़ की तरह फालतू
मुस्कराती हो मेरे कण्ठ में गूँजती आवाज़ सुनकर कि
मैं हूँ क्या!

क्या केवल एक छाता
जिससे अक्तूबर में भादों टपक रहा है
शब्दस्फीत एक पंक्ति की कविता
या बचपन का खिलौना
जिसमें बचा है अब भी मुझसे खेलने का चाव
मैं क्या उम्र हूँ जिसे यूँ ही गँवाया जा रहा है
या जाया होता वक़्त
जो घड़ी के बाहर तक फैलकर दबोच रहा है

मैं एक प्रश्न हूँ कि मैं क्या दूँ?
मैं एक उत्तर हूँ कि मैं हूँ!

सिल्वर स्क्रीन 

(रंगकर्मी स्व. मनोहर सिंह की स्मृति में)

विदूषक अपनी जगह से उठे और चले आये जीवन में
एक समय में जो बुद्धू मशहूर थे
अब उनकी पैंतरेबाजी देखते ही बनती थी

बुरे आदमी समाज के मंच पर सबसे आगे थे
आलोकवृत्त से घिरे वे अपने फैलाये अँधेरे में धधक रहे थे
कुलीन भाषा उनकी भव्य उपस्थिति में डरा रही थी सबको
सबको उकसाया उन्होंने कि
सफलता की ऊँचाइयाँ छूने के लिए गिरना बेहद ज़रूरी है
और इसकी कोई इन्तिहा नहीं है

जिसे केन्द्रीय चरित्र कह रहा था पटकथा लेखक
वह हारा हुआ सताया आदमी था
अकसर चुप देखा गया उसे या रोता हुआ
लड़ना चहता था वह पर उससे कहा गया: प्रार्थना करे
थोड़ा-सा प्यार चाहता था जरा-सी इज़्ज़त
उसे बताया गया कि नफ़रत करना सीखे
इज़्ज़त की ज़रूरत क्या है अगर लोगों को डराना सीख लो

मजे की बात कि यह सब पर्दे के पीछे से दिेय गये आदेश थे
दर्शक तो दर्शक लेखक तक को पता नहीं था
कौन है यह किसकी आवाज़ है
निर्देशक समझता था यह लेखक का खेल होगा कोई
लेखक मान बैठा था निर्देशक की शरारत होगी

अपने अपमान को पीता मनुष्य जितना सच्चा अभिनय करे
छुपता नहीं है उसका सच
ऐश्वर्य को पशु भी पहचानते हैं
अपने समय का अक्षत सौन्दर्य
सस्ते वेश्यालयों में पनाह माँगते देखा गया
या उस निर्माता की गोद में जो स्मगलर था
पौरुष के अतुल प्रतीक बूढ़े हो गये बदल गये विवश पिताओं में
उनके लिए भूमिका लिखी जाने लगीं
जिन्हें अगली सदी में अवतार लेना था
चमचमाते नक्षत्र बुझ गये
बूढ़े अदाकारों का मेकअप उनकी झुर्रियाँ उभारने लगा
कारगर नहीं रहे चण्डूखाने के शिगूफे़ और अख़बारों की सुर्खियाँ
मिट्टी हो गयी सारी साज-सँभाल
बहुत कम यादों में बचा हुआ वह जादू जैसा अभिनय
मामूली काम पाने की गुहार में दब गया

महान प्रेक्षालय हो गये जर्जर
जिन्हें नवाजा गया था पुरस्कारों से फालतू भीड़ में चुप हैं
एक ऐसा हुजूम घेरे हुए है जिसकी नहीं है कोई शक्ल
हरेक दूसरे से छीनने-लूटने की जुगत में है
खुद बचे रहने के लिए किसी को मारने के शोर में
हिंसा का मलबा इकट्ठा हो रहा है
स्त्रियों का पवित्र शोक रोमांचित नहीं करता
बच्चों की लुकाछिपी लगते हैं प्रेम के बिम्ब

क्लाइमेक्स में जो दिल चीरकर दिखा रहा है
वह मूकाभिनय नहीं कर रहा
उसकी आवाज़ दबा दी गयी है
किसी और की आवाज़ में रुलाई बनकर
फूट रहा है उसका स्वगत

कहानी कहाँ है पूरी एक अधूरा आलेख है जीवन
जिसके पात्र ढूँढ़े जा रहे हैं: घटनाओं को अभी घटना है

गूँजती आवाज़ खो गयी है उजाले में
रोशनी बन गयी है धुआँ…

बटन

वह दायें तरफ़ टँके रहते हैं
कमीज़ पहनने पर हो जाते हैं बायें तरफ़
इस तरफ़ दिल होता है
दुनिया भर में कुछ ही होते हैं इस तरफ़ चलनेवाले लोग
अलग होते हैं औरों से

कुछ लोगों की निगाहें बटनों को बीच में देखती हैं
बड़े तेज होते हैं वे जो बीच में चलने की सलाह देते हैं

बटन जिन छेदों पर टँके रहते हैं कमीज़ के
वह आँखें होती हैं कपड़े की
उस आदमी पर भी रखती हैं नज़र
जो उन्हें पहने रहता है

बड़े काम करते हैं मामूली लगते बटन
कपड़ों को बाँधकर रखते हैं
या हमें टूटकर बिखरने से रोकते हैं
कुछ दिखाने भर के बटन कॉलर को अकड़ाकर रखते हैं
गर्दन ज्यादा टेढ़ी करते हैं जेब के ऊपर टँगे बटन

उन्होंने आदमी की शर्म को सँभाला हुआ है
ऐसी काट के कपड़े भी हैं चलन में जिन पर
बटन की ज़रूरत ही नहीं है
हो सकता है इसी तर्ज़ पर बनने लगें ऐसे आदमी
कपड़ों की ज़रूरत ही नहीं रहे जिन्हें

हाथी दाँत से बने या महँगी धातु के चमकदार बटन
गिरकर कभी नहीं मिलते
खो जाते हैं जाने किस अँधेरे में
बने-बनाये कपड़ों के नीचे उलटी तरफ टाँक देते हैं
तीन-चार बटन
जाने कैसे बचा हुआ है जोड़ने का यह मनुष्य अनुभव
मशीनों को सिर्फ़ काटना सिखाया है हमने
पुरानी फ़िल्मों में स्त्री तोड़ती है दाँतों से धागा
नज़दीकी जताने का यह तरीका ठेठ रीतिवादी है
नायक की उँगली में सुई चुभने के बाद होती है प्रेम की
बाक़ायदा शुरूआत
कई महान अभिनेताओं की अमिट छवियाँ
इसी रसायन से बनी हैं

बच्चे इकट्ठे करते रहते हैं बटन: हर बटन उनका है
कई बार लगता है
उनके लिए पृथ्वी एक बटन है छिटककर भटकती हुई
जिसे वे अपनी कमीज़ पर टाँकना चाहते हैं
कथा कहनेवाले कवि उदयप्रकाश के बचपन की कमीज़ में
चाँद ही टँक गया था बटन बनकर

रंग-बिरंगे बटन अच्छे लगते हैं बच्चों के कपड़ों पर
बड़ों के कपड़ों पर अटपटे
हालाँकि कई बार पहनने की इच्छा होती है
जिसे दूसरों के कारण दबाना पड़ता है
बढ़ती उम्र आदमी को मसखरा बना देती है
कम हो जाती है उसकी हँसी
संजीदा दिखने के लिए जरूरी हो जाते हैं
उदास भरे रंग
कपड़ों की आड़ी-तिरछी सिलाई जीवन के टेढ़े-मेढ़े रास्ते हैं
बेमेल ज़िन्दगी से लड़ते हम बाहर ढूँढ़ते हैं
कपड़ों के रंग से मेल खाते बटन
हमारी छीजी हुई काया के चीथड़े की
प्राचीन दुख की तरह जरा-सी जगह घेरता है बटन
मुक्त कर देता है इतने सारे को

कभी जल कभी जाल 

आँख की तरह दिल

उसने आँख की जगह
निकाल कर रख दिया दिल
रुकी हुई दुनिया चलने लगी

वे यादें थीं
गाढ़े ख़ून-सी बूंद-बूंद टपकती
उसके सीने को ढंकते
नदी थे उसके बाल
जिसमें नहा रही थीं
बत्तख सी उंगलियां

हाथों में था एक फूल दहकता
जिससे कपटी मौसम में वह
अपनी इच्छाओं को कह रही थी

दुनिया झुकी हुई थी
उसके सामने हाथ फैलाए

वह धर ही देती
उसके हाथ पर अपनी आंखें
जो दिल की तरह उछल रही थीं
हर डर पर …

प्रेम कविता में दरवाजा

उसने तय किया भूख मिट जाए
वह प्रेम की कविता लिखेगा
जिसमें प्रेम नामक शब्द कहीं नहीं होगा
अद्भुत प्रेम कविता होगी वह

इसके लिए नफ़रत और युद्ध
युद्ध और विनाश जैसे शब्द ज़रूरी थे

उसे बसों में भूल गए
रूमालों की बात नहीं करनी थी
उन चिठ्ठियों के बारे में भी
उसने नहीं सोचा
जो पीली पड़ती जा रही थीं

बच्चों को वह भूल गया
मिलने आए लोगों से मिलना
उसने ज़रूरी नहीं समझा
अब तक उसे सूझ नहीं रहा था
कि शुरू कैसे करे?

उसे दरवाज़े का ख़याल आया
यही है मुसीबतों की जड़
इसी रास्ते आते हैं कविता में ख़लल …

उसकी प्रेम कविता में दरवाज़ा बन्द था
बन्द थे झरोखे

लिख-लिख कर वह शब्दों को
फेंक रहा था बियावान में

जो डरा रहा था 

उसकी कमर पर
वह अपने होठों की तितली
चिपकाना चाहता था
दुख हुआ कि कभी जो तितली से ज़्यादा सुन्दर था
अब ठीक से होंठ भी नहीं थे

वह प्यार था
या उसका न होना
जो उन्हें डरा रहा था

मिलने पर

मिटाया तो और उभर गया
जलाया तो पी गया आग को

पहले तो ऐसा नहीं था

मैं उससे मिला तो
अपने बारे में पता चला

एक विदागीत की अधूरी पंक्तियाँ

चिड़िया तो तू मेरी ही ठहरी
मेरी आंखों में ही था
तेरा पहला घोंसला

मैंने ही सिखाया था
निडर उड़ना

लौटते कैसे हैं
बस यह सिखाना भूल गया ….

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