हेमन्त श्रीमाल की रचनाएँ

फागुन आया रे

फागुन आया रे
गलियों गलियों र।ग गुलाल
कुमकुम केसर के सौ थाल भर-भर लाया रे
फागुन आया रे

होंठ हठीले रंगे गुलाबी और नयन कजरारे
बिन्दिया की झिलमिल में लाखों चमक रहे ध्रुवतारे
लहँगा नीला चुनरी लाल
पीले कंचुक में कुसुमाल तन लहराया रे
फागुन आया रे

अ।ग-अ।ग में र।ग लिए चलती-फिरती पिचकारी
चला रही बैरागी मन पर इन्द्रधनुष-सी आरी
इक तो तीरेनज़र का वार
उस पर पिचकारी की धार, तप बहकाया रे
फागुन आया रे

घर-आँगन चौपालों पर ये कैसी होड़ लगी है
आगे आगे नन्दोई पीछे सलहज दौड़ रही है
हारा कर-करके फरियाद
फिर भी बेचारे दामाद को नहलाया रे
फागुन आया रे

चाँदी जैसी धूप और कुन्दन-सी चन्द्रकिशोरी
सुबह साँझ ने दबा रखी है मुँह में पान गिलौरी
कलियों-कलियों ने पट खोल
अपने घट का घूँघट खोल मद छलकाया रे
फागुन आया रे

बुरा न मानो मीत आज तो होली है भई होली
कहकर मौसम ने मधुबन के मुँह पर मल दी रोली
सूरज ने संध्या के साथ
रजनी ने संध्या के साथ, मुँह रंगवाया रे
फागुन आया रे

ये शरद की चाँदनी 

शोख चंचल चुलबुली है, ये शरद की चाँदनी

इस कदर मादक नहीं था मरमरी कोमल बदन
उम्र में शामिल हुआ है एक अल्हड़ बाँकपन
रूप में ख़ुद आ घुली है, ये शरद की चाँदनी

स्वप्न बुनती जा रही है जो मिलन के हर जगह
सेज पर फिर बिछ रही है एक चादर की तरह
दूधिया साबुन धुली है, ये शरद की चाँदनी

संगमरमर-सी ऋचा का कामभेदी व्याकरण
और स्वर्णिम ओढ़नी का पारदर्शी आवरण
जान लेने पर तुली है, ये शरद की चाँदनी

बरसते मेह का

चुम्बन ले जो रोज़ गुलाबी देह का
हमसे अच्छा भाग बरसते मेह का

पहले तो गौरी के तन को ये जमकर नहलाए
नहलाने की ओट लिए फिर अन्तर तक सहलाए
करता है इज़हार लिपटकर स्नेह का
हमसे अच्छा भाग बरसते मेह का

अलकों से पलकों पर ढुलके फिर होंठों को लूटे
ठोड़ी तक आते-आते तो इसका धीरज छूटे
दौड़ करे मधुपान उमर के गेह का
हमसे अच्छा भाग बरसते मेह का

इक छी।टा हमने मारा तो अब तक है नाराज़ी
सौ-सौ बार भिगोया जिसने उसकी “हाँ जी-हाँ जी”
दान उसे विश्वास हमें सन्देह का
हमसे अच्छा भाग बरसते मेह का

आवारा न हो जाएँ

रोको इन हवाओं को आवारा न हो जाएँ
पत्ता ही पत्ते का हत्यारा न हो जाए

मज़हब की लड़ाई में डर है तो महज़ इतना
टुकडे़ टुकडे़ ऑंगन दोबारा न हो जाए

चाहत के घरौंदो तक बारूदी सुरंगें हैं
भूले से कोई पागल अंगारा न हो जाए

कुर्सी ने बना डाले गलियारे ही गलियारे
अब तो ये दुआ है कि अँधियारा न हो जाए

पत्थर उठा लेते हैं लोग

बात छोटी हो मगर अक्सर उठा लेते हैं लोग
व्यर्थ ही आकाश को सर पर उठा लेते हैं लोग

रूबरू तो मुस्कुराकर मर मिटोगे आप पर
पीठ फिरते ही मगर खंजर उठा लेते हैं लोग

उठ न जाये तर्जनी कोई हमारी ओर भी
“कैप” कुछ नीचे झुका “कॉलर” उठा लेते हैं लोग

आइना हो सामने तो मुस्कुराना चाहिए
किन्तु यह क्या? हाथ में पत्थर उठा लेते हैं लोग

दो मुट्ठी भी धान नहीं 

उत्तर दो ऐ दौलतवालो! क्या हम भी इन्सान नही।
मेहनत की बूँदों के बदले दो मुट्ठी भी धान नही

साँसें गिरवी रखकर भी हम आस नहीं कर पाते हैं
सपनों की क्या बात करें जब पेट नहीं भर पाते हैं
हम वो पत्ते जो पकने के पहले ही झर जाते हैं
आँचल रीता पाकर बच्चे होते ही मर जाते हैं
मुर्दा घोषित कर दो या फिर कह दो हम बेजान नहीं

बापू की बूढ़ी आँखों को ऐनक बहुत ज़रूरी है
बरसों से तीरथ दर्शन की माँ की आस अधूरी है
उस पर दो बहिनों की चिन्ता जिनकी उम्र सिन्दूरी है
घरवाली क्या कहे बेचारी उसकी भी मज़बूरी है
निर्धन के दिल में भी होते क्या कोई अरमान नहीं

रक्त स्वयं का स्वेद बनाकर तुम्हें समर्पित करते हैं
उससे ज़्यादा दे देते है जितना अर्जित करते हैं
क़दम क़दम पर हम मेहनत के अक्षर अंकित करते हैं
तुमसे कुछ लेने से पहले तुमको अर्पित करते हैं
माँगा है तो हक माँगा है, भीख नहीं अनुदान नहीं

हम भी चोरी कर सकते हैं डाके डलवा सकते हैं
चाकू की नोकों के बल पर चेन उतरवा सकते हैं
बन्दूकें दिखला-दिखलाकर बस को रुकवा सकते हैं
बस तो क्या है रेलों तक को अगवा करवा सकते हैं
अब भी सम्हलो जाग न जाए भीतर का शैतान कहीं

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