संध्या नवोदिता की रचनाएँ

औरतें-1

कहाँ हैं औरतें ?
ज़िन्दगी को रेशा-रेशा उधेड़ती
वक़्त की चमकीली सलाइयों में
अपने ख़्वाबों के फंदे डालती
घायल उँगलियों को तेज़ी से चला रही हैं औरतें

एक रात में समूचा युग पार करतीं
हाँफती हैं वे
लाल तारे से लेती हैं थोड़ी-सी ऊर्जा
फिर एक युग की यात्रा के लिए
तैयार हो रही हैं औरतें

अपने दुखों की मोटी नक़ाब को
तीख़ी निगाहों से भेदती
वे हैं कुलाँचे मारने की फिराक में
ओह, सूर्य किरनों को पकड़ रही हैं औरतें

औरतें-2

औरतों ने अपने तन का
सारा नमक और रक्त
इकट्ठा किया अपनी आँखों में

और हर दुख को दिया
उसमें हिस्सा

हज़ारों सालों में बनाया एक मृत सागर
आँसुओं ने कतरा-कतरा जुड़कर
कुछ नहीं डूबा जिसमें
औरत के सपनों और उम्मीदों
के सिवाय

उम्मीद

बड़ी उम्मीदों से
मैं तुममें तलाशती हूँ एक साथी
और नाउम्मीद हो जाती हूँ
हर बार
एक पुरुष को पाकर

मैं हूँ मानवी

मैं हूँ
समर्पण हैं, समझौते हैं
तुम हो बहुत क़रीब

मैं हूँ
हँसी है, ख़ुशी है
और तुम हो नज़दीक ही

मैं हूँ
दर्द है, आँसू हैं
तुम कहीं नहीं

मैं हूँ मानवी
ओ सभ्य पुरुष !

जिस दुनिया में

संतृप्त
ऊबे हुए मेरे साथी पुरुष
अब कुछ बचा ही नहीं
तुम्हारे लिए
जहाँ
जिस दुनिया में

चीज़ें शुरू होती हैं
वहीं से
मेरे लिए

ग़लती वहीं हुई थी

तुम्हारे अँधेरे मेरी ताक में हैं
और मेरे हिस्से के उजाले
तुम्हारी गिरफ़्त में

हाँ
ग़लती वहीं हुई थी
जब मैंने कहा था
तुम मुझको चाँद ला के दो

और मेरे चाँद पर मालिकाना तुम्हारा हो गया

जिस्म ही नहीं हूँ मैं

जिस्म ही नहीं हूँ मैं
कि पिघल जाऊँ
तुम्हारी वासना की आग में
क्षणिक उत्तेजना के लाल डोरे
नहीं तैरते मेरी आँखों में
काव्यात्मक दग्धता ही नहीं मचलती
हर वक़्त मेरे होंठों पर
बल्कि मेरे समय की सबसे मज़बूत माँग रहती है
मैं भी वाहक हूँ
उसी संघर्षमयी परम्परा की
जो रचती है इंसानियत की बुनियाद
मुझमें तलाश मत करो
एक आदर्श पत्नी
एक शरीर- बिस्तर के लिए
एक मशीन-वंशवृद्धि के लिए
एक गुलाम- परिवार के लिए

मैं तुम्हारी साथी हूँ
हर मोर्चे पर तुम्हारी संगिनी
शरीर के स्तर से उठकर
वैचारिक भूमि पर एक हों हम
हमारे बीच का मुद्दा हमारा स्पर्श ही नहीं
समाज पर बहस भी होगी
मैं कद्र करती हूँ संघर्ष में
तुम्हारी भागीदारी की
दुनिया के चंद ठेकेदारों को
बनाने वाली व्यवस्था की विद्रोही हूँ मैं
नारीत्व की बंदिशों का
क़ैदी नहीं व्यक्तित्व मेरा
इसीलिए मेरे दोस्त
खरी नहीं उतरती मैं
इन सामाजिक परिभाषाओं में

मैं आवाज़ हूँ- पीड़कों के ख़िलाफ़
मैंने पकड़ा है तुम्हारा हाथ
कि और अधिक मज़बूत हों हम
आँखें भावुक प्रेम ही नहीं दर्शातीं
शोषण के विरुद्ध जंग की चिंगारियाँ
भी बरसाती हैं
होंठ प्रेमिका को चूमते ही नहीं
क्रान्ति गीत भी गाते हैं
युद्ध का बिगुल भी बजाते हैं
बाँहों में आलिंगन ही नहीं होता
दुश्मनों की हड्डियाँ भी चरमराती हैं
सीने में प्रेम का उफ़ान ही नहीं
विद्रोह का तूफ़ान भी उठता है

आओ हम लड़ें एक साथ
अपने दुश्मनों से
कि आगे से कभी लड़ाई न हो
एक साथ बढ़ें अपनी मंज़िल की ओर
जिस्म की शक्ल में नहीं
विचारधारा बनकर !

हमारे समय के बच्चे 

हमारे समय के बच्चे
मखमल में नहीं पाले जाते
उनकी विश्रामशाला होती है
कंक्रीट की किसी सड़क किनारे
या मिट्टी के नरम बिछौने
अपने आप ही बड़े हो जाते हैं हमारे बच्चे

बहुत बेशर्म होते है हमारे नवजात
वे पैदा ही लोहे के होते हैं

धूप, ठण्ड या बरसात
सब बेअसर होते हैं उन पर
बम्बों में नहाते हुए सुड़क जाते हैं वे
ढेर सारा गंदला पानी
हवा कितनी ही विषैली क्यों न हो
वे जी लेते हैं किसी आक्सीजन मास्क के बगैर

धूल की सौगात
उनके सँवलाए चेहरों पर फिसलती है
आँखें भले ही मासूम हों
पर दिखती है तो कोरों में जमी कीचड़ ही
उनका रोना या मचलना
विचलित नहीं करता किसी को
हालाँकि
हवाएँ बिखर जाती हैं
सूरज सुनहरा हो उठता है
मिट्टी और ज्यादा गंधा जाती है
उनके आँसुओं से लिपटकर

फ़सलें जवान होती हैं बेताबी से
कारख़ानों की मशीनों का रुदन
और तेज़ हो जाता है

दरअसल
बच्चे हमारे समय के
कोई नाज़ुक गुलाब की कलियाँ नहीं होते
बड़े शातिर होते हैं हमारे दुधमुँहे
भूख से कुलबुलाती अँतड़ियों को समेटे
टुकुर-टुकुर देखते हैं फटी आँखों से
दूध भीगी रोटी के निवालों को
जो किसी जैकी, टॉमी या टाइगर को
परोसे जाते है
सुन्दर पॉट में
मान-मनौवल के साथ

शायद अच्छा न लगे आपको
जब पता चले
कि बच्चे मिमियाना छोड़ चुके हैं
उनकी कोमल मुस्कुराहट
खूँखार ठहाकों में
तब्दील होने लगे

अच्छा तो यह भी नहीं
कि बुरी से बुरी बात पर भी
उनकी आँखों की मासूमियत में
खून का एक कतरा भी न उतरे
अपनी पीली आँखों में वे
सिवाय डर के कुछ और न पचा पाएँ

बुरा तो यह भी है
कि बच्चे हमारे समय के
गवाँ बैठें अपना बचपना
उनकी उम्र
मुस्कुराहटों से नहीं
उनके हाथों में पल रहे ज़ख़्मों की दरारों से गिनी जाए
उनकी आँखों में
सपनों की जगह वक़्त के काँटे उग आएँ

बच्चे
कहाँ रह गए हैं अब बच्चे
उनकी उम्र तो युगों में है
सदियाँ गुज़र गई हैं
उन्हें,
अपनी नन्हीं उँगलियों से वक़्त का
ख़ूबसूरत गलीचा बुनते ।

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