सय्यद ज़मीर जाफ़री की रचनाएँ

अगर हम दश्त-ए-जुनूँ में न ग़ज़ल-ख़्वाँ होते

अगर हम दश्त-ए-जुनूँ में न ग़ज़ल-ख़्वाँ होते
शहर होते भी तो आवाज़ के ज़िंदाँ होते

ज़िंदगी तेरे तक़ाज़े अगर आसाँ होते
कितने आबाद जज़ीरे हैं कि वीराँ होते

तू ने देखा ही नहीं प्यार से ज़र्रों की तरफ़
आँख होती तो सितारे भी नुमायाँ होते

इष्क़ ही शोला-ए-इम्कान-ए-सहर है वर्ना
ख़्वाब ताबीर से पहले ही परेशाँ होते

माज़ी ओ दोश का हर दाग़ है फ़र्दा का चराग़
काश ये शाम ओ सहर सर्फ़-ए-दिल-ओ-जाँ होते

ज़ब्त-ए-तूफ़ाँ की तबीअत ही का इक रूख़ है ‘ज़मीर’
मौज आवाज़ बदल लेती है तूफ़ाँ होते

तजर्बात-ए-तल्ख़ ने हर-चंद समझाया मुझे

तजर्बात-ए-तल्ख़ ने हर-चंद समझाया मुझे
दिल मगर दिल था उसी महफ़िल में ले आया मुझे

हुस्न हर शय पर तवज्जोह की नज़र का नाम है
बार-हा काँटों की रानाई ने चौंकाया मुझे

दूर तक दामान-ए-हस्ती पर दिए जलते गए
देर तक उम्र-ए-गुज़िश्ता का ख़्याल आया मुझे

हर नज़र बस अपनी अपनी रौशनी तक जा सकी
हर किसी ने अपने अपने ज़र्फ़ तक पाया मुझे

हर रवाँ लम्हा बड़ी तफ़्सील से मिलता गया
हर गुज़रते रंग ने ख़ुद रूक के ठहराया मुझे

ग़ुंचा-ओ-गुल महर ओ मह अब्र ओ हवा रूख़्सार ओ लब
ज़िंदगी ने हर क़दम पर याद फ़रमाया मुझे

बड़ी हैरत से अरबाब-ए-वफ़ा को देखता हूँ मैं 

बड़ी हैरत से अरबाब-ए-वफ़ा को देखता हूँ मैं
ख़ता को देखता हूँ और सज़ा को देखता हूँ मैं

अभी कुछ देर है शायद मिरे मायूस होने में
अभी कुछ दिन फ़रेब-ए-रहनुमा को देखता हूँ मैं

ख़ुदा मालूम दिल को जुस्तुजू है किन जज़ीरों की
न जाने किन सितारों की ज़िया को देखता हूँ मैं

ये क्या ग़म है मिरे अषआर को नम कर दिया किसने
ये दिल में किस समुंदर की घटा को देखता हूँ मैं

‘ज़मीर’ इक क़ैद-ए-ना-महसूस को महसूस करता हूँ
किसी नादानी-ए-ज़ंजीर-ए-पा को देखता हूँ मैं

शब को दलिया दला करे कोई

शब को दलिया दला करे कोई
सुब्ह को नाश्ता करे कोई

इस का फै़सला करे कोई
किस से कितना हया करे कोई

आदमी से सुलूक दुनिया का
जैसे अण्डा तला करे कोई

चीज़ मिलती है सर्फ़ की हद तक
अपना चमचा बड़ा करे कोई

बात वो जो कहा सर-ए-दरबार
इश्क़ जो बरमला करे कोई

सोचता हूँ कि इस ज़माने में
दादी अम्माँ को क्या करे कोई

जिस से घर ही चले न मुल्क चले
ऐसी तालीम क्या करे कोई

दिल भी इक शहर है यहाँ भी कभी
ओमनी बस चला करे कोई

ऐसी क़िस्मत कहाँ ‘ज़मीर’ अपनी
आ के पीछे से ता करे कोई

हम ज़माने से फ़क़त हुस्न-ए-गुमाँ रखते हैं

हम ज़माने से फ़क़त हुस्न-ए-गुमाँ रखते हैं
हम ज़माने से तवक़्क़ो ही कहाँ रखते हैं

एक लम्हा भी मसर्रत का बहुत होता है
लोग जीने का सलीक़ा ही कहाँ रखते हैं

कुछ हमारे भी सितारे तिरे दामन पे रहें
हम भी कुछ ख़्वाब जहान-ए-गुज़राँ रखते हैं

चंद आँसू हैं कि हस्ती की चमक है जिन से
कुछ हवादिस हैं कि दुनिया को जवाँ रखते हैं

जान-ओ-दिल नज़्र हैं लेकिन निगाह-ए-लुत्फ़ की नज़्र
मुफ़्त बिकते हैं क़यामत भी गिराँ रखते हैं

अपने हिस्से की मसर्रत भी अज़िय्यत है ‘ज़मीर’
हर नफ़स पास-ए-ग़म-ए-हम-नफ़साँ रखते हैं

हम न्यूट्रल हैं ख़ारजा हिकमत के बाब में

हम न्यूट्रल हैं ख़ारजा हिकमत के बाब में
नय हाथ बाग पर हैं न पा हैं रिकाब में

यूँ काँपता है शैख़ ख़याल-ए-षराब से
जैसे कभी ये डूब गया था शराब में

इस बात पर भी हम ने कई बाब लिख दिए
जो बात रह गई थी ख़ुदा की किताब में

तन्क़ीद-ए-जाम-ओ-मय तो बहुत हो चुकी हुज़ूर
अब क्या ख़याल है ग़म-ए-हस्ती के बाब में

रिंदों की बे-हस्ती भी ख़बर-दार चीज़ थी
अक्सर झगड़ पड़े हैं हिसाब-ओ-किताब में

लुत्फ़ इस मुशाइरे में मिला कॉकटेल का
जमुना का रस भी आन मिला है चनाब में

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