हरी चंद अख़्तर की रचनाएँ

जिस ज़मीं पर तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा होता है

जिस ज़मीं पर तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा होता है
एक इक ज़र्रा वहाँ क़िबला नुमा होता है

काश वो दिल पे रक्खे हाथ और इतना पूछे
क्यूँ तड़प उठता है क्या बात है क्या होता है

बज़्म-ए-दुश्मन है ख़ुदा के लिए आराम से बैठ
बार बार ऐ दिल-ए-नादाँ तुझे क्या होता है

मेरी सूरत मिरी हालत मिरी रंगत देखी
आप ने देख लिया इश्क़ में क्या होता है

ऐ सबा ख़ार-ए-मुग़ीलाँ को सुना दे मुज़्दा
आज़िम-ए-दश्त कोई आबला-पा होता है

हम जो कहते हैं हमेशा ही ग़लत कहते हैं
आप का हुक्म दुरूस्त और बजा होता है

सैर-ए-दुनिया से ग़रज़ थी महव-ए-दुनिया कर दिया 

सैर-ए-दुनिया से ग़रज़ थी महव-ए-दुनिया कर दिया
मैं ने क्या चाहा मिरे अल्लाह ने क्या कर दिया

रोकने वाला न था कोई ख़ुदा को इस लिए
जो कुछ आया उस के जी में बे-मुहाबा कर दिया

हाँ उसी कम-बख़्त दिल ने कर दिया इफ़शा-ए-राज़
हाँ उसी कम बख़्त दिल मुझ को को कर दिया

इश्क़ जा इन तेरी बातों में नहीं आने के हम
अच्छे अच्छों को जहाँ में तू ने रूस्वा कर दिया

ज़िंदगी बैठी थी अपने हुस्न पर भोली हुई
मौत ने आते ही सारा रंग फीका कर दिया

मोहसिन के पहले तो सब मुझ पर हक़ीक़त खोल दी
और फिर ख़ामोश रहने का इशारा कर दिया

हुस्न को पहना चुके जब ख़ुद-नुमाई का लिबास
इश्क़ ने सर पीट कर पूछा कि ये क्या कर दिया.

शबाब आया किसी बुत पर फ़िदा होने का वक़्त आया 

शबाब आया किसी बुत पर फ़िदा होने का वक़्त आया
मरी दुनिया में बंदे के ख़ुदा होने का वक़्त आया

उन्हें देखा तो ज़ाहिद ने कहा ईमान की ये है
कि अब इंसान को सज्दा-रवा होने का वक़्त आया

ख़ुदा जाने ये है औज-ए-यकीं या पस्ती-ए-हिम्मत
ख़ुदा से कह रहा हूँ ना-ख़ुदा होने का वक़्त आया

हमें भी आ पड़ा है दोस्तों से काम कुछ यानी
हमारे दोस्तों के बे-वफ़ा होने का वक़्त आया

नवेद सर-बुलंदी दी मुनज्जिम ने तो मैं समझा
सुगान-ए-दहर के आगे देवता होने का वक़्त आया

सुना कर हाल क़िस्मत आज़मा कर लौट आए हैं

सुना कर हाल क़िस्मत आज़मा कर लौट आए हैं
उन्हें कुछ और बेगाना बना कर लौट आए है

फिर इक टूटा हुआ रिश्ता फिर इक उजड़ी हुई दुनिया
फिर इक दिलचस्प अफ़्साना सुना कर लौट आए हैं

फ़रेब-ए-आरज़ू अब तो न दे ऐ मर्ग-ए-मायूसी
हम उम्मीदों की इक दुनिया लुटा कर लौट आए हैं

ख़ुदा शाहिद है अब तो उन सा भी कोई नहीं मिला
ब-ज़ोम-ए-ख़ुवेश इन का आज़मा कर लौट आए हैं

बिछ जाते हैं या रब क्यूँ किसी काफ़िर के क़दमों में
वो सज्दे जो दर-ए-काबा जा कर लौट आए हैं

उम्मीदों से दिल बर्बाद को आबाद करता हूँ

उम्मीदों से दिल बर्बाद को आबाद करता हूँ
मिटाने के लिए दुनिया नई ईजाद करता हूँ

तिरी मीआद-ए-ग़म पूरी हुई ऐ ज़िंदगी ख़ुश हो
क़फ़स टूटे न टूटे मैं तुझे आज़ाद करता हूँ

जफ़ा-कारो मिरी मज़लूम ख़ामोशी पे हँसते हो
ज़रा ठहरो ज़रा दम लो अभी फ़रीयाद करता हूँ

मैं अपने दिल का मालिक हूँ मिरा दिल एक बस्ती है
कभी आबाद करता हूँ कभी बर्बाद करता हूँ

मुलाक़ातें भी होती हैं मुलाक़ातों के बाद अक्सर
वो मुझ को भूल जाते हैं मैं उन को याद करता हूँ

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