जया जादवानी

जया जादवानी की रचनाएँ

नाल

एक

न मैं गर्भ से बाहर आई
न नाल कटी
न बड़ी हुई कभी
धीरे-धीरे मरते हुए
गर्भ के भीतर
सोचती हूं कि
काश! किसी तरह
किसी योनि से
अपना सपना बाहर फेंक सकती!

दो

जहां भी जाती हूं
खून से लिथड़ी नाल
चली आती है
हे ईश्वर
यह देह कैसी धरती है
एक काटी नहीं कि
दूसरी निकल रही है
मेरे भीतर से…

स्त्री

एक

उसने कहा तुम मत जाओ
तुम्हारे बिना अधूरा हूं मैं
सारी की सारी गठरी धर मेरे सर पर
वह चल रहा आगे-आगे
मैं गठरी समेत उसके पीछे!

दो

जैसे हाशिये पर लिख देते हैं
बहुत फालतू शब्द और
उन्हें कभी नहीं पढ़ते
ऐसे ही वह लिखी गई और
पढ़ी नहीं गई कभी
जबकि उसी से शुरू हुई थी
पूरी एक किताब!

तीन

वह पलटती है रोटी तवे पर
बदल जाती है पूरी की पूरी दुनिया
खड़ी रहती है वहीं की वहीं
स्त्री
तमाम रोटियां सिंक जाने के बाद भी!

चार

वे हर बार छोड़ आती हैं
अपना चेहरा
उनके बिस्तर पर
सारा दिन जिसे बिताती हैं
ढूंढनने में
रात खो आती हैं!

पांच

पढ़ते हैं खुद
खुद नतीजे निकालते हैं
मेरी दीवारों पर क्या कुछ
लिख गए हैं लोग!

मैं बचा लूंगी उसे 

एकदम भभक कर बुझने से पहले
मैं बचा लूंगी उसे
हाथों की ओट से
ऐसे कैसे जायेगा प्रेम
मेरी असमाप्त कविता छोड़कर…!

देह का जादू

उगती है देह उसकी हथेली पर
वह मुट्ठी भींच लेती है

उगती है देह उसकी आंखों में
दिखता है लहराता लाल गुलाब
पौधा नहीं दिखता
कसकर मींच लेती है आंखें
चुभते हैं कांटे
झपक कर रोकती है आंसू
गुलाब भीतर खींच लेती है

उगती है देह
उसके बालों की महक में
उचक कर बैठ जाती है माथे पर
ढंकती है इधर तो
बौखलाया उधर दिखने लगता है

कस कर बांधती है चोटी
तो उसकी सलवटों में उगती है देह
देह कभी पीछे
कभी आगे उगती है
बार-बार उसे पीछे खींचती लड़की
हांफती है
पसीने से भीगते हैं वक्ष
देह उन पर उतराती है…!

सदी का सबसे भयावह सच

मैं बहुत वक्त तक सोयी रहती
अगर नहीं जगाता मुझे मेरा बच्चा
बहुत देर तक गूंजती रही मेरे कानों में
उन औरतों की चीखें
जिन्हें आधी रात घरों के बाहर खींच
उतार दिये गये कपड़े
तलवार की नोंकों पर
चढ़ा दिये गये उनके बच्चे
फिर बहुत देर तक गूंजती रही
पुलिस की जीपों के सायरनों की आवाजे़
अब सब ठीक हो गया
मैं करवट बदल कर सो गयी
जानते हुए भी कि
वे भेज दी गयी हैं
एक यातनागृह से दूसरे में
उनकी तकलीफें, शर्म, आंसू
और नफरत
जिन्हें बाद में सिर्फ
लिखा जा सकता है
सड़कों पर पड़े थे
उनके कपड़ों की तरह
खून से सने
और वे हराम के माल की तरह
बंटती रहीं दाना-दाना
और जब आयी मेरी बारी
जो कि आनी थी
मेरा बच्चा कुचला गया
उनके बूटों के नीचे
और मेरी चीखें
घुट गयीं अपने अंधेरों में
हमारी सदी का
सबसे भयावह सच है
चुप रहना!

मैं अपनी होना चाहती हूं

नहीं, मैं तुम्हारे प्याले से नहीं पियूंगी
चाहे प्यास घोंट दे मेरा गला
और मैं बिखर जाऊं जर्रा-जर्रा
मैं नहीं उगूंगी तुम्हारी जमीन पर
मुझे नहीं चाहिए
तुमसे छल कर आती
हवा और धूप
मैंने सुना है उनकी नींदों का रोना
जिन्होंने अपने सपने
गिरवी रख दिये हैं
और अब
उनकी सांसों से
मरे हुए सपनों की गंध आती है
मुझे चाहिए अपनी नींद
भूख और प्यास
मुझे चाहिए अपने आटे की
गुंथी हुई रोटी
मैं अपने जिस्म पर
अपनी इच्छाओं की रोटी
सेंकना चाहती हूं
अपनी मर्जी से
अपने लिये उगना
अपने लिये झरना चाहती हूं
मुझे नहीं करनी वफादारी
तुम्हारी रोटियांे की
रखवाली तुम्हारे घरों की
तुम्हारी मिट्टी की, तुम्हारी जड़ों की
जिनसे आती है मेरे
पसीने और लहू की बू
मैं नकारती हूं वह वृक्ष
जिसके फूलों पर कोई इख्तियार नहीं मेरा
मैं छोड़ती हूं तुम्ळें
तुम्हारे फैलाए समस्त जाल के साथ
मैं होना चाहती हूं
अपनी गंध से परिपूर्ण अपने लिये
मैं अपना आकाश
अपनी धरती चाहती हूं
मैं अपनी होना चाहती हूं!

मैं अपनी होना चाहती हूं

नहीं, मैं तुम्हारे प्याले से नहीं पियूंगी
चाहे प्यास घोंट दे मेरा गला
और मैं बिखर जाऊं जर्रा-जर्रा
मैं नहीं उगूंगी तुम्हारी जमीन पर
मुझे नहीं चाहिए
तुमसे छल कर आती
हवा और धूप
मैंने सुना है उनकी नींदों का रोना
जिन्होंने अपने सपने
गिरवी रख दिये हैं
और अब
उनकी सांसों से
मरे हुए सपनों की गंध आती है
मुझे चाहिए अपनी नींद
भूख और प्यास
मुझे चाहिए अपने आटे की
गुंथी हुई रोटी
मैं अपने जिस्म पर
अपनी इच्छाओं की रोटी
सेंकना चाहती हूं
अपनी मर्जी से
अपने लिये उगना
अपने लिये झरना चाहती हूं
मुझे नहीं करनी वफादारी
तुम्हारी रोटियांे की
रखवाली तुम्हारे घरों की
तुम्हारी मिट्टी की, तुम्हारी जड़ों की
जिनसे आती है मेरे
पसीने और लहू की बू
मैं नकारती हूं वह वृक्ष
जिसके फूलों पर कोई इख्तियार नहीं मेरा
मैं छोड़ती हूं तुम्ळें
तुम्हारे फैलाए समस्त जाल के साथ
मैं होना चाहती हूं
अपनी गंध से परिपूर्ण अपने लिये
मैं अपना आकाश
अपनी धरती चाहती हूं
मैं अपनी होना चाहती हूं!

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