ज़ेब गौरी

ज़ेब गौरी की रचनाएँ

इक पीली चमकीली चिड़िया काली आँख नशीली-सी

इक पीली चमकीली चिड़िया काली आँख नशीली-सी ।
बैठी है दरिया के किनारे मेरी तरह अकेली-सी ।

जब मैं नशेब-ए-रंग-ओ-बू[1] में उतरा उसकी याद के साथ,
ओस में भीगी धूप लगी है नर्म हरी लचकीली-सी ।

किसको ख़बर मैं किस रस्ते की धूल बनूँ या फूल बनूँ,
क्या जाने क्या रंग दिखाए उसकी आँख पहेली-सी ।

तेज़ हवा की धार से कटकर क्या जाने कब गिर जाए,
लहराती है शाख़-ए-तमन्ना[2] कच्ची बेल चंबेली-सी ।

कम रौशन इक ख़्वाब आईना इक पीला मुरझाया फूल,
पसमंज़र[3] के सन्नाटे में एक नदी पथरीली-सी ।

धोका खाने वाले नहीं हम ‘ज़ेब’ तेरि इस सादगी का,
मतलब गहरी आँखों जैसा बातें खुली हथेली-सी ।

बुझते सूरज ने लिया फिर से संभाला कैसा

बुझते सूरज ने लिया फिर से संभाला कैसा ।
उड़ती चिड़िया के परों पर है उजाला कैसा ।

तुमने भी देखा कि मुझको ही हुआ था महसूस,
गिर्द[1] उसके रुख-ए-रौशन[2] के था हाला कैसा ।

छट गया जब मेरि नज़रों से सितारों का ग़ुबार,
शौक़-ए-रफ़्तार[3] ने फिर पाँव निकाला कैसा ।

किसने सहरा में मेरे वास्ते रखी है ये छाँव,
धूप रोके है मेरा चाहने वाला कैसा ।

‘ज़ेब’ मौजों में लकीरों की वो गुम था कब से,
गरदिश-ए-रंग[4] ने पैकर को उछाला कैसा ।

इक गौहर आँसू का न छोड़ा दिल की जोत जगाने को

इक गौहर[1] आँसू का न छोड़ा दिल की जोत जगाने को ।
याद किसी की ख़ाली कर गई रातों रात ख़ज़ाने को ।

उड़ जाती है गीत सुनाकर जब मुझको कोई चिड़िया,
मैं भी साथ चला जाता हूँ दूर तलक पहुँचाने को ।

अपनी जगह हर लफ़्ज अलामत[2] शेर के तार-ओ-पौद[3] में है,
अलग-अलग करके मत देखो इक-इक ताने-बाने को ।

पत्ते-पत्ते बूटे-बूटे पर लिखा हैनाम उसका,
मैं भी चौरस्ते पे खड़ा हूँ अपना पता बताने को ।

मैं तो रोने हँसने वाला एक तमाशाई हूँ बस,
मुझसे और ता‍अल्लुक़ क्या है ‘ज़ेब’ मेरे अफ़साने को ।

यहीं उड़ रहा था वो कोहसार में

यहीं उड़ रहा था वो कोहसार[1] में ।
उसे ढूँढ़िए अब किसी ग़ार[2] में ।

वही एक गौहर[3] पड़ा रह गया
वही एक गौहर था बाज़ार में ।

उजाला ग‍इ‍इ शब की बारिश का है
अभी साया-ए-अब्र-ओ-अशजार[4] में ।

मेरी दोनों आँखें खोली छोड़ दीं
ये कैसा चुना मुझको दीवार में ।

तो क्या तू भी गुम था मेरि ही तरह
कहीं अपने सरवस्ता असरार[5] में ।

पड़े होंगे औराक-ए-दिल[6] भी कहीं
इन्हीं ज़र्द पत्तों के अंबार[7] में ।

अजब रंग चमका है उस फूल का
मगर जब खिला शाख़-ए-इज़हार[8] में ।

उठी एक मौज-ए-सराब[9] और मुझे
बहा ले गई सब्ज़ अनवार[10] में ।

ग़ज़ल ने भरी थी उड़ान इक ज़रा
कि फिर गिर पड़ी कूचा-ए-यार[11] में ।

Share