जानकीवल्लभ शास्त्री

जानकीवल्लभ शास्त्री की रचनाएँ

उदयति मिहिरो, विगलति तिमिरो

उदयति मिहिरो,विगलति तिमिरो
भुवनं कथमभिरामम्
प्रचरति चतुरो मधुकरनिकरो
गुंजति कथमविरामम्॥
विकसति कमलं,विलसति सलिलम्
पवनो वहति सलीलम्
दिशिदिशि धावति,कूजति नृत्यति
खगकुलमतिशयलोलम्॥
शिरसि तरूणां रविकिरणानाम्
खेलति रुचिररुणाभा
उपरि दलानाम् हिमकणिकानाम्
कापि हृदयहरशोभा॥

मौज

सब अपनी-अपनी कहते हैं!
कोई न किसी की सुनता है,
नाहक कोई सिर धुनता है,
दिल बहलाने को चल फिर कर,
फिर सब अपने में रहते हैं!
सबके सिर पर है भार प्रचुर
सब का हारा बेचारा उर,
सब ऊपर ही ऊपर हँसते,
भीतर दुर्भर दुख सहते हैं!
ध्रुव लक्ष्य किसी को है न मिला,
सबके पथ में है शिला, शिला,
ले जाती जिधर बहा धारा,
सब उसी ओर चुप बहते हैं।

किसने बाँसुरी बजाई

जनम-जनम की पहचानी वह तान कहाँ से आई !
किसने बाँसुरी बजाई

अंग-अंग फूले कदंब साँस झकोरे झूले
सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई !
किसने बाँसुरी बजाई

जटिल कर्म-पथ पर थर-थर काँप लगे रुकने पग
कूक सुना सोए-सोए हिय मे हूक जगाई !
किसने बाँसुरी बजाई

मसक-मसक रहता मर्मस्‍थल मरमर करते प्राण
कैसे इतनी कठिन रागिनी कोमल सुर में गाई !
किसने बाँसुरी बजाई

उतर गगन से एक बार फिर पी कर विष का प्‍याला
निर्मोही मोहन से रूठी मीरा मृदु मुस्‍काई !
किसने बाँसुरी बजाई

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