फना' निज़ामी कानपुरी

फना’ निज़ामी कानपुरी की रचनाएँ

ऐ हुस्न ज़माने के तेवर भी तो समझा कर

ऐ हुस्न ज़माने के तेवर भी तो समझा कर
अब ज़ुल्म से बाज़ आ जा अब जौर से तौबा कर

टूटे हुए पैमाने बेकार सही लेकिन
मै-ख़ाने से ऐ साक़ी बाहर तो न फेंका कर

जलवा हो तो जलवा हो पर्दा हो तो पर्दा हो
तौहीन-ए-तज़ल्ली है चिलमन से न झाँका कर

अरबाब-ए-जुनूँ में हैं कुछ अहल-ए-ख़िरद शामिल
हर एक मुसाफिर से मंज़िल को न पूछा कर

बर्क़ को जितनी शोहरत मिली

बर्क़ को जितनी शोहरत मिली
आशियाँ की ब-दौलत मिली

ज़ब्त-ए-ग़म की ये क़ीमत मिली
बे-वफ़ाई की तोहमत मिली

उन को गुल का मुकद्दर मिला
मुझ को शबनम की क़िस्मत मिली

क़ल्ब-ए-मै-ख्वार को छोड़ कर
मुझ को हर दिल में नफ़रत मिली

उम्र तो कम मिली शम्मा को
ज़िंदगी खूब-सूरत मिली

मौत लाई नई ज़िंदगी
मैं तो समझा था फ़ुर्सत मिली

हर गुनह-गार को ऐ ‘फ़ना’
गोद फैलाए रहमत मिली

दुनिया-ए-तसव्वुर हम आबाद नहीं करते

दुनिया-ए-तसव्वुर हम आबाद नहीं करते
याद आते हो तुम ख़ुद ही हम याद नहीं करते

वो जौर-ए-मुसलसल से बाज़ आ तो गए लेकिन
बे-दाद ये क्या कम है बे-दाद नहीं करते

साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर
अफ़सोस तो करते हैं इमदाद नहीं करते

कुछ दर्द की शिद्दत है कुछ पास-ए-मोहब्बत है
हम आह तो करते हैं, फरियाद नहीं करते

सहरा से बहारों को ले आए चमन वाले
और अपने गुलिस्ताँ को आबाद नहीं करते

ग़म हर इक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं

ग़म हर इक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं
अब्र उठे और बस जाए ज़रूरी तो नहीं

बर्क़ सय्याद के घर पर भी तो गिर सकती है
आशियानों पे ही लहराए ज़रूरी तो नहीं

राह-बर-राह मुसाफिर को दिखा देता है
वहीं मंज़िल पे पहुँच जाए ज़रूरी तो नहीं

नोक-ए-हर ख़ार ख़तरनाक तो होती है मगर
सब के दामन से उलझ जाए ज़रूरी तो नहीं

गुँचे मुरझाते हैं और शाख़ से गिर जाते हैं
हर कली फूल ही बन जाए ज़रूरी तो नहीं

घर हुआ गुलशन हुआ सहरा हुआ

घर हुआ गुलशन हुआ सहरा हुआ
हर जगह मेरा जुनूँ रूसवा हुआ

ग़ैरत-ए-अहल-ए-चमल को क्या हुआ
छोड़ आए आशियाँ जलता हुआ

हुस्न का चेहरा भी है उतरा हुआ
आज अपने ग़म का अंदाज़ा हुआ

पुर्सिश-ए-ग़म आप रहने दीजिए
ये तमाशा है मेरा देखा हुआ

ये इमारत तो इबादत-गाह है
इस जगह इक मै-कदा था क्या हुआ

ग़म से नाज़ुक ज़ब्त-ए-ग़म की बात है
ये भी दरिया है मगर ठहरा हुआ

इस तरह रह-बर ने लूटा कारवाँ
ऐ ‘फना’ रह-ज़न को भी सदमा हुआ

मुझे रूतबा-ए-ग़म बताना पड़ेगा

मुझे रूतबा-ए-ग़म बताना पड़ेगा
अगर मेरे पीछे ज़माना पड़ेगा

बहुत ग़म-ज़दा दिल है कलियों के लेकिन
उसूलन उन्हें मुस्कुराना पड़ेगा

सुकूँ ढूँडने आए थे मै-कदे में
यहाँ से कहीं और जाना पड़ेगा

ख़बर क्या थी जश्न-ए-बहाराँ की ख़ातिर
हमें आशियाँ जलाना पड़ेगा

बहार अब नए गुल खिलाने लगी है
ख़िज़ाँ को चमन में बुलाना पड़ेगा

सुकूत-ए-मुसलसल मुनासिब नहीं है
असीरो तुम्हें ग़ुल मचाना पड़ेगा

‘फना’ तुम हो शाएर तो अफ़साना-ए-ग़म
गज़ल की ज़बानी सुनाना पड़ेगा

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