फ़रीद खान की रचनाएँ

मेरा ईश्वर

मेरा और मेरे ईश्वर का जन्म एक साथ हुआ था ।

हम घरौन्दे बनाते थे,
रेत में हम सुरंग बनाते थे ।

वह मुझे धर्म बताता है,
उसकी बात मानता हूँ,
कभी कभी नहीं मानता हूँ ।

भीड़ भरे इलाक़े में वह मेरी तावीज़ में सो जाता है,
पर अकेले में मुझे सम्भाल कर घर ले आता है।

मैं सोता हूँ,
रात भर वह जगता है ।

उसके भरोसे ही मैं अब तक टिका हूँ, जीवन में तन कर खड़ा हूँ ।

वह बोल रही है

वह अब बड़ी हो गई है ।
मैं उसकी उम्र की बात नहीं कर रहा ।

वह देश के चार-पाँच बड़े शहर घूम कर आई है ।

मानो उसने अभी-अभी चलना सीखा और दौड़ रही है ।
मानो उसने अभी-अभी भाषा सीखी और बोल रही

उसकी तस्वीरों के शोर से समझ में आ रहा है
कि उसका विश्वास छू रहा है,
धरती और आसमान एक साथ ।

प्रधानमन्त्री जी

अगर यह भी तय हो जाए कि अब से मूर्तियाँ ही तोड़ी जाएँगी दंगों में
तो मैं इस तोड़ फोड़ का समर्थन करूँगा।
कम से कम कोई औरत बच तो जाएगी बलात्कार से।
नहीं चीरा जाएगा किसी गर्भवती का पेट।

मैं तो कहता हूँ कि मूर्ति तोड़ने वालों को सरकार द्वारा वज़ीफ़ा भी दिया जाए।
कम से कम कोई सिर्फ़ इसलिए मरने से तो बच जाएगा
कि दंगाईयों के धर्म से उनका धर्म मेल नहीं खाता।

इसे रोज़गार की तरह देखा जाना चाहिए।
कम से कम सभी धर्म के लोग सामान रूप से जुड़ तो पाएंगे इस राष्ट्रीय उत्सव में।
तब किसी दलित पर किसी की नज़र नहीं पड़ेगी
और ऐसे में कोई दलित बिना किसी बाधा के मूँछ भी रख पाएगा
और घोड़ी पर भी चढ़ पाएगा।

प्रधानमन्त्री जी, वैसे तो आप जनता की बात सुनते नहीं हैं।
पर यकीन मानिए मैं मुकेश अम्बानी बोल रहा हूँ।

वे मजबूर हैं, झुँझलाहट में हैं

वे मजबूर हैं। झुँझलाहट में हैं।
अगर विचार की कोई मूर्ति बन पाती तो वे उसे ही तोड़ते।
गाँधी को क्यों मारते?
क्यों तोड़ते वे बुद्ध की प्रतिमा को बामियान में,
अगर समता की कोई मूर्ति बन पाती तो।
या वे भगत सिंह को फाँसी पर क्यों चढ़ाते,
उस क्रान्ति को ही फाँसी पर न लटका देते
जिसका सपना उसकी आँखों में था?
वे क्यों तोड़ते मन्दिरों को, मस्जिदों को?
उन्हें नहीं तोड़ना पड़ता अम्बेदकर की मूर्ति को
अगर संविधान की कोई मूर्ति बन पाती तो।
देवियो सज्जनो, सदियों से झुँझलाए लोगों पर तरस खाओ.
जब उन्हें भूख लगेगी तब करेंगे बात।

Share