फ़सीह अकमल

चश्म-ए-हैरत को तअल्लुक़ की फ़ज़ा तक ले गया

चश्म-ए-हैरत को तअल्लुक़ की फ़ज़ा तक ले गया
कोई ख्वाबों से मुझे दश्त-ए-बला तक ले गया

टूटती परछाइयों के शहर में तन्हा हूँ अब
हादसों का सिलसिला ग़म-आश्ना तक ले गया

धूप दीवारों पे चढ़ कर देखती ही रह गई
कौन सूरज को अंधेरों की गुफा तक ले गया

उम्र भर मिलने नहीं देती हैं अब तो रंजिशें
वक़्त हम से रूठ जाने की अदा तक ले गया

इस क़दर गहरी उदासी का सबब खुलता नहीं
जैसे होंटों से कोई हर्फ़-ए-दुआ तक ले गया

जाने किस उम्मीद पर इक आरज़ू का सिलसिला
मुझे से पैहम दूर होती इक सदा तक ले गया

ख़ाक में मिलते हुए बर्ग़-ए-ख़िजाँ से पूछिए
कौन शाख़ों से उसे ऊँची हुआ तक ले गया

दे गया लिख कर वो बस इतना जुदा होते हुए

दे गया लिख कर वो बस इतना जुदा होते हुए
हो गए बे-आसरा हम आसरा होते हुए

खिड़कियाँ मत खोल लेकिन कोई रौज़न वा तो कर
घुट न जाए मेरा दम ताज़ा हवा होते हुए

वक़्त ने गर्दन उठाने की न दी मोहलत हमें
अपना चेहरा भूल बैठे आईना होते हुए

ख़ुद उसी के अहद में अज़्म-ए-वफ़ादारी न था
वर्ना क्यूँ मुझ से बदलता आश्ना होते हुए

गर्दिश-ए-दौराँ का हम पर भी असर होता ज़रूर
हम ने देखा है मगर उस को ख़फ़ा होते हुए

जाने किस के सोग में ये शहर है डूबा हुआ
मय-कदे सुनसान हैं काली घटा होते हुए

ग़ुबार-ए-तंग-ज़ेहनी सूरत-ए-ख़ंजर निकलता है

ग़ुबार-ए-तंग-ज़ेहनी सूरत-ए-ख़ंजर निकलता है
हमारी बस्तियों से रोज़ इक लश्कर निकलता है

ख़ुदा जाने कहाँ उस की रिफ़ाक़त हो गई ज़ख़्मी
कि शब में इक परिंदा चीख़ता अक्सर निकलता है

मता-ए-चश्म-ए-हैराँ के सिवा अब कुछ नहीं बाक़ी
दिल-ए-आतिश-गिरफ़्ता का यही जौहर निकलता है

लहू पी कर ज़मीं जब भी नई करवट बदलती है
किसी का सर निकलता है किसी का घर निकलता है

हमारी फ़त्ह के अंदाज़ दुनिया से निराले हैं
कि परचम की जगह नेज़े पे अपना सर निकलता है

हमारे शहर में कम-क़ामतों की भीड़ ऐसी है
उसी का क़त्ल हो जाता है जिस का सर निकलता है

नज़र वालों से मत पूछो हद-ए-इम्काँ कहाँ तक है
कहीं सूरज निकलता है कहीं मंज़र निकलता है

अगर जीने की ख़्वाहिश है जबीं संग-आश्ना रखना
कि हर मुख़्लिस की मुट्ठी में यहाँ ख़ंजर निकलता है

जो तू नहीं है तो लगता है अब कि तू क्या है

जो तू नहीं है तो लगता है अब कि तू क्या है
तमाम आलम-ए-वहशत ये चार सू क्या है

किसी की याद में आँखें छलकती रहती हैं
तो और मस्लक-ए-उश्शाक़ में वज़ू किया है

उदास कर गया ये कौन मसनद-ए-गुल को
ये शोर ओ शैन है कैसा ये हा-ओ-हू क्या है

तिरे हुज़ूर भी अपने ही मसअलों में रहे
समझ न पाए कि आँखों के रू-ब-रू क्या है

सुख़न-तराज़ हो जब वो तो ऐसा लगता है
दिलों पे नूर की बारिश है गुफ़्तुगू क्या है

हर एक आँख में आँसू हर एक लब पे फ़ुगाँ
ये एक शोर-ए-क़यामत सा कू-ब-कू क्या है

किसी के सामने इस तरह सुर्ख़-रू होगी \

किसी के सामने इस तरह सुर्ख़-रू होगी
निगाह ख़ून-ए-तमन्ना से बा-वज़ू होगी

ब-रोज़-ए-हश्र खड़े होंगे मुंसिफ़ी के लिए
ख़ुदा मिला तो मुक़ाबिल से गुफ़्तुगू होगी

तमाम उम्र के ज़ख़्मों का है हिसाब किताब
हमारी फ़र्द-ए-अमल भी लहू लहू होगी

क़बा-ए-ज़ीस्त जो है ख़ारज़ार-ए-हस्ती में
वो किस के सोज़न-ए-तदबीर से रफ़ू होगी

हमीं पे ख़त्म हैं जौर-ओ-सितम ज़माने के
हमारे बाद उसे किस की आरज़ू होगी

किताबों से न दानिश की फ़रावानी से आया है

किताबों से न दानिश की फ़रावानी से आया है
सलीक़ा ज़िंदगी का दिल की नादानी से आया है

तुम अपने हुस्न के जल्वों से क्यूँ शरमाए जाते हो
ये आईना मिरी आँखों की हैरानी से आया है

उलझना ख़ुद से रह रह कर नज़र से गुफ़्तुगू करना
ये अंदाज़-ए-सुख़न उस को निगह-बनी से आया है

नदी है मौज में अपनी उसे इस की ख़बर क्या है
कि तिश्ना-लब मुसाफ़िर किस परीशानी से आया है

सितारों की तरह अल्फ़ाज़ की ज़ौ बढ़ती जाती है
ग़ज़ल में हुस्न उस चेहरे की ताबानी से आया है

कुछ नया करने की ख़्वाहिश में पुराने हो गए

कुछ नया करने की ख़्वाहिश में पुराने हो गए
बाल चाँदी हो गए बच्चे सयाने हो गए

ज़िंदगी हँसने लगी परछाइयों के शहर में
चाँद क्या उभरा कि सब मंज़र सुहाने हो गए

रेत पर तो टूट कर बरसे मगर बस्ती पे कम
इस नई रूत में तो बादल भी दिवाने हो गए

बादलों को देख कर वो याद करता है मुझे
इस कहानी को सुने कितने ज़माने हो गए

जोड़ता रहता हूँ अक्सर एक क़िस्से के वरक़
जिस के सब किरदार लोगो बे-ठिकाने हो गए

‘मीर’ का दीवान आँखें जिस्म ‘क़ाएम’ की ग़ज़ल
जाने किस के नाम मेरे सब ख़ज़ाने हो गए

रेत पर इक ना-मुकम्मल नक़्श था क़ुर्बत का ख़्वाब
फ़ासला बढ़ने के ‘अक्मल’ सौ बहाने हो गए

मुद्दत से वो ख़ुशबू-ए-हिना ही नहीं आई

मुद्दत से वो ख़ुशबू-ए-हिना ही नहीं आई
शायद तिरे कूचे की हवा ही नहीं आई

मक़्तल पे अभी तक जो तबाही नहीं आई
सरकार की जानिब से गवाही नहीं आई

दुनिया का हर इक काम सलीक़े से किया है
हम लोगों को बस याद-ए-ख़ुदा ही नहीं आई

जिस वक़्त कि वो हाथ छुड़ाने पे ब-ज़िद था
उस वक़्त कोई याद दुआ ही नहीं आई

लहजे से न ज़ाहिर हो कि हम उस से ख़फ़ा हैं
जीने की अभी तक ये अदा ही नहीं आई

रूख़्सत उसे बा-दीदा-ए-नम कर तो दिया था
फिर इस से बड़ी दिल पे तबाही नहीं आई

मिलती तो ज़रा पूछते अहवाल ही उस का
अफ़्सोस इधर बाद-ए-सबा ही नहीं आई

मुनव्वर जिस्म-ओ-जाँ होने लगे हैं

मुनव्वर जिस्म-ओ-जाँ होने लगे हैं
कि हम ख़ुद पर अयाँ होने गले हैं

ब-ज़ाहिर तो दिखाई दे रहे हैं
ब-बातिन हम धुआँ होने लगे हैं

जिन्हें तारीख़ भी लिखते डरेगी
वो हंगामे यहाँ होने लगे हैं

बहुत से लोग क्यूँ जाने अचानक
तबीअत पर गिराँ होने लगे हैं

फ़ज़ा में मुर्तइश भी बे-असर भी
हम आवाज़-ए-अज़ाँ होने लगे हैं

सियासी लोग अब चोले बदल कर
ख़ुदा के तर्जुमाँ होने लगे हैं

जो हम को जाँ से बढ़ कर चाहते थे
नसीब-ए-दुश्मनाँ होने लगे हैं

वो चिंगारी जो ऐन-ए-मुद्दआ है
तो हम शोला-ब-जाँ होने लगे हैं

कभी थे नफ़ा अपना आप हम भी
मगर अब तो ज़ियाँ होने लगे हैं

अज़ीयत-कोशियों का फ़ैज़ देखो
मसाइल दास्ताँ होने लगे हैं

बयाँ हम को करेगा वो कहाँ से
कि हम तो ख़ुद बयाँ होने लगे हैं

ज़रा आपे में रक्खो ख़ुद को ‘अक्मल’
कि बच्चे अब जवाँ होने लगे हैं

मुज़्तरिब दिल की कहानी और है

मुज़्तरिब दिल की कहानी और है
कोई लेकिन उस का सानी और है

उस की आँखें देख कर हम पर खुला
ये शुऊर-ए-हुक्मरानी और है

ये जो क़ातिल हैं उन्हें कुछ मत कहो
इस सितम का कोई बानी और है

उम्र भर तुम शाइरी करते रहो
ज़ख़्म-ए-दिल की तर्जुमानी और है

हौसला टूटे न राह-ए-शौक़ में
ग़म की ऐसी मेज़बानी और है

मुद्दआ इज़हार से खुलता नहीं है
ये ज़बान-ए-बे-ज़बानी और है

आईने के सामने बैठा है कौन
आज मंज़र पर जवानी और है

प्यार जादू है किसी दिल में उतर जाएगा

प्यार जादू है किसी दिल में उतर जाएगा
हुस्न इक ख़्वाब है और ख़्वाब बिखर जाएगा

अपनी आँखों को ज़रा हद्द-ए-अदब में रखना
वर्ना धोके में कोई जाँ से गुज़र जाएगा

अब किसी और का तुम ज़िक्र न करना मुझ से
वर्ना इक ख़्वाब जो आँखों में है मर जाएगा

आईना टूटे हुए दिल का दिखा दूँ मैं अगर
बेवफ़ा ख़ुद तिरा चेहरा भी उतर जाएगा

दिल दुखाया न किसी शख़्स का दिल तोड़ा है
मेरे हमराह यही ज़ाद-ए-सफ़र जाएगा

ये वो सफ़र है जहाँ ख़ूँ-बहा ज़रूरी है

ये वो सफ़र है जहाँ ख़ूँ-बहा ज़रूरी है
वही न देखना जो देखना ज़रूरी है

बदलती सम्तों की तारीख़ लिख रहा हूँ मैं
हर एक मोड़ पे अब हादसा ज़रूरी है

नुक़ूश चेहरों के अल्फ़ाज़ बनते जाते हैं
कुछ और इससे ज़ियादा भी क्या ज़रूरी है

ये सोने वाले तुझे संगसार कर देंगे
ये कह के देख कभी जागना ज़रूरी है

अँधेरी रात में उस रहगुज़ार पर यारो
मिरी तरह से ये जलता दिया ज़रूरी है

जहाँ जहाँ से मैं गुज़रूँ उदास रातों में
वहाँ वहाँ तिरी आवाज़-ए-पा ज़रूरी है

बहुत सी बातें ज़बाँ से कही नहीं जातीं
सवाल कर के उसे देखना ज़रूरी है

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