बुंदेला बाला की रचनाएँ

सावधान

सावधान हे युवक उमगो, सावधानता रखना ख़ूब।
युवा समय के महा मनोहर विषयों में मत जाना डूब॥
सर्वकाज करने के पहिले पूछो अपने दिल से आप।
इसका करना इस दुनिया में पुण्य मानते हैं या पाप॥

जो उत्तर दिल देय तुम्हारा उसे समझ लो अच्छी भाँति।
काज करो अनुसार उसी के नष्ट होय दुखों की पाँति॥
कभी भूल ऐसा मत करना अच्छी के लालच में आज।
देना पड़े कल्ह ही तुमको रत्नमाल सम निज कुल लाज॥

युवा समय के गर्भ रक्त में मत बोओ तुम ऐसा बीज।
वृद्ध समय के क्षीण रक्त में फूलै चिंता फलै कुबीज॥
पश्चात्ताप कुरस नित टपकैं बदनामी गुठली दृढ़ होय।
उँगली उठै बार में चलते मुँहभर बात न बूझै कोय॥

यौवन ऋतु बसंत में प्यारे कुसुम समूह देखि मत भूल।
दबादबा कर युक्ति सहित रख निज उमंग के सुंदर फूल॥
सावधान! इनको विनष्ट कर फिर पीछे पछतावेगा।
वृद्ध वयस सम्मान सुगंधित फिर कैसे महकावेगा॥

परमेश्वर की न्याय-तुला की डांडी जग में जाहर है।
उसको ऊँच नीच कछु करना मानव-बल से बाहर है॥
अहंकार सर्वदा जगत में मुँह की खाता आया है।
नय, नम्रता, मान, पाते हैं सब ने यही बताया है॥

है प्रत्येक भव्यता के हित इस जग में निकृष्टता एक।
विषय रूप मिष्ठान्न मध्य है विषमय आमय कीट अनेक॥
इंद्रिय विषय शिखर दूरहिं तें महा मनोरम लगते हैं।
निकट जाय जांचे समझोगे, रूप हरामी ठगते हैं॥

है प्रत्येक ऊँच में नीचा प्रतिमिठास में कड़ुआ स्वाद।
प्रतिकुकर्म में शर्म भरी है भ्रम खोय मत हो बरबाद॥
प्रकृति नियम यह सदा सत्य है, कैसे इसे मिटाओगे।
जग में जैसा कर्म करोगे वैसा ही फल पाओगे॥

चाहिए ऐसे बालक

परशुराम, श्रीराम, भीम, अर्जुन, उद्दालक।
गौतम, शंकर सरिस धर्म सत्त के संचालक॥
उत्साही, दृढ़ जंग प्रतिज्ञा के प्रतिपालक।
शारीरिक मस्तिष्क शक्ति बल अरिगण घालक॥
काज करें मन लाय बनें शत्रुन उर शालक।
अब भारत मातहिं चाहिये ऐसे बालक॥

दुर्बल अरु भयभीत सदा जो कहत पुकारी।
“अरे बाप! यह काज हमैं सूझत अति भारी॥”
“मैं नाहीं कर सकता” शब्द मुख तें न उचारैं।
“हाँ करिहों उद्योग” सहित उत्साह पुकारैं॥
सत्य भाव तें कहें, करैं अरु बनैं न टालक।
अब भारत मातहिं चाहिए ऐसे बालक॥

जो करना है उसे करैं अपने निज हाथन।
देश भलाई हेत करैं अभिलाषा लाखन॥
कठिन परिश्रम देखि न कबहूँ मन ते हारैं।
भारी भार निहारि न कबहूँ कंधा डारैं॥
करैं काज बनि कुलकलंक कारिख प्रच्छालक।
अब भारत मातहिं चाहिए ऐसे बालक॥

देखि कठिन कर्तव्य उसे जूजू जनि जानैं।
अपना धर्म विचार उसे अपना कर मानैं॥
ऐसे बालक जबहिं देश के मुखिया ह्वै हैं।
तब भारत के सकल दुख दरिद्र नसैहैं॥
मिटिहैं हिय को ताप और कटिहैं जंजालक।
अब भारत मातहिं चाहिये ऐसे बालक॥

संबोधन

माता
हे प्यारे कदापि तू इसको तुच्छ श्याम रेखा मत मान।
यह है शैल हिमाचल इसको भारत भूमि पिता पहिचान॥
नेह सहित ज्यों पितु पुत्री का सादर पालन करता है।
यह हिमगिरि त्योंही भारतहित पितृभाव हिय धरता है॥
गंगा यमुना युगुल रूप से प्रेम धार का देकर दान।
भारत भूमि रूप दुहिता का नेह सहित करता सनमान॥

पुत्र
यह जो बाम और नक़्शे के रेखामय अतिशय अभिराम।
शोभामय सुंदर प्रदेश है मुझे बता दे उसका नाम॥

माता
बेटा! यह पंजाब देश है पुण्यभूमि सुख शांत निवास।
सर्व प्रथम इस थलपर आकर किया आर्यों ने निजवास॥
कहीं गान ध्वनि, कहीं वेद ध्वनि, कहीं महामंत्रों का नाद।
यज्ञधूम से रहा सुवासित यह पंजाब सहित अह्लाद॥
इसी देश में बस के ‘पोरस’ ने रखा है भारत मान।
जब सम्राट सिकंदर आकर किया चाहता था अपमान॥
इससे नीचे देख पुत्र यह देश दृष्टि जो आता है।
सकल-बालुकामय प्रदेश यह राजस्थान कहाता है॥
इसके प्रति गिरिवर पर बेटा अरु प्रत्येक नदी के तीर।
देशमान हित करते आये आत्मविसर्जन छत्री वीर॥
कोई ऐसा थान नहीं है जहाँ अमर चिह्नों के रूप।
वीर कहानी रजपूतों की लिखी न होवे अमर अनूप॥
छत्री कुल अवतंस वीरवर है ‘प्रताप’ जी का यह देश।
रानी ‘पद्मावती’ सती ने यहीं किया है नाम विशेष॥
छत्रीवंश जात को चहिए करना इसको नित्य प्रणाम।
इससे छत्री वर्ग का जग में सदा रहेगा रोशन नाम॥

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