बृजेश नीरज

बृजेश नीरज की रचनाएँ

ऐसा क्यों होता है

ऐसा क्यों होता है
रात का बुना सपना
खो जाता है
दिन के उजाले में

दिन की देह से टपकी
पसीने की हर बूँद
सोख लेती है
बंजर जमीन

मौसम के हर बदलाव के बाद
और मोटी-खुरदरी हो जाती है
हथेली की त्वचा

ऐसा क्यों होता है?

डार्विन का सिद्धान्त

कितने कठिन होते हैं
जीवन के प्रश्न
कठिन
कि असफल हो जाती है पाइथागोरस प्रमेय
कुछ काम नहीं आते
त्रिकोणमितीय सूत्र

भौतिकी के नियम
रासायनिक समीकरण
समाजशास्त्रीय गणित
सिर्फ़ क़िताबों में सिमटकर रह जाते हैं

जीवन को सरल नहीं बना पाते
अर्थशास्त्रीय नियम

पर सारे इन्तज़ाम ऐसे ज़रूर हैं कि
आदमी समझ जाए
डार्विन का सिद्धान्त

इस देश में

इस देश में
चीख़
संगीत की धुन बन जाती है
जिस पर थिरकते हैं रईसज़ादे
पबों में

सुन्दर से ड्राइंगरूम में सजती है
द्रौपदी के चीरहरण की
तस्वीर

रोटी से खेलती सत्ता के लिए
भूख चिन्ता का विषय नहीं बनती
मौत की चिता पर सजा दी जाती है
मुआवजे की लकड़ी

किसान की आत्महत्या
आँकड़ों में आपदा की शिकार हो जाती है

धर्म आस्था का विषय नहीं
वोटों की राजनीति में
महन्तों और मुल्लाओं की कठपुतली है

झण्डों के रंग
एक छलावा है
बहाना भर है चेहरे को छुपाने का

तेज़ धूप में पिघलते
भट्टी की आग में जलते
आदमी की शिराओं का रक्त
पानी बनकर
उसके बदन पर चुहचुहाता है
गन्ध फैलाता है हर तरफ

इस लोकतन्त्र में
आदमी की हैसियत रोटी से कम
और भूख उम्र से ज़्यादा है

नहीं सूझती राह

रोशनी की तलाश में
बहुत दूर आ गए हम
नहीं मिली अँधेरों से निजात

वह छोर कहीं पीछे छूट गया
जहाँ उगता है सूरज
होती है सुबह

दुनिया के अन्धेरे कोने के
बियाबान में
धरती, आकाश, पेड़-पौधे, सबका
सिर्फ एक रंग-काला

घुप्प अन्धकार में होता है
दिशा-भ्रम
स्याह कोने में गुम हो गई
रोशनी की ओर जाने वाली राह

सड़क पर नहीं उतरे

सड़क पर नहीं उतरे हम
चुपचाप देखते रह गए तस्लीमा का देश से निर्वासन
सह गए दाभोलकर का मर जाना
रुश्दी की गुमनामी हमें नहीं कचोटती
कलबुर्गी की हत्या भी बर्दाश्त कर गए हम

प्रतिरोध के नाम पर शोक सम्वेदनाएँ
देखिए मोमबत्तियाँ मत जलाइएगा
यूँ भी मोमबत्तियों से चट्टानें नहीं पिघलतीं

साथी जो साथ नहीं

तुम इसे इत्तेफ़ाक कह लो
पर सच यही है कि
तुम साथ नहीं होते
जब शिराओं में जमने लगता है
समय
ज़मीन लाल हो कर बंजर हो जाती है
पीपल की जड़ें धरती से उखड़ कर
धँस जाती हैं दीवारों में
हिलने लगती है दीवार
दरक जाती है छत

तुम साथ नहीं हो
जब पतझड़ में झड़ गए
शब्दों की शाख से अर्थ के पत्ते

तुम साथ हो कर भी
साथ नहीं होते
हर उस कठिन दौर में
जब जीना, मरने से बदतर हो जाता है

आख़िर तुम क्यों साथ नहीं हो
मैं यह समझने की कोशिश में हूँ

प्रेम की कुछ बातें

क्या मित्र तुम भी कैसी बातें ले कर बैठ गए
मैं नहीं रच पाता प्रेमगीत
रूमानी बातों से बासी समोसे की बास आती है मुझे
माशूक की जुल्फ़ों की जगह उभर आती हैं
आस-पास की बजबजाती नालियाँ
प्रेमिका के आलिंगन के एहसास की जगह
जकड़ लेती है पसीने से तर-ब-तर शरीर की गन्ध

तुम हँस रहे हो
नहीं, नहीं, मेरा भेंजा बिलकुल दुरुस्त है

देखो मित्र,
भूखा पेट रूमानियत का बोझ नहीं उठा पाता
किसी पथरीली ज़मीन पर चलते
नहीं उभरती देवदार के वृक्षों की कल्पना
सूखते एहसासों पर चिनार के वृक्ष नहीं उगते
बारूद की गन्ध से भरे नथुने
नहीं महसूस कर पाते बेला की महक

जब प्रेम
युवती की नंगी देह में डूब जाना भर हो
तब कविता भी
पायजामे बँधे नाड़े से अधिक तो नहीं

ऐसे समय
जब बिवाइयों से रिसते ख़ून के कतरों से
बदल रहा है मखमली घास का रंग
लिजलिजे शब्दों का बोझ उठाए
कितनी दूर चला जा सकता है

शक्ति द्वारा कमज़ोर के अस्तित्व को
नकार दिए जाने के इस दौर में
जब पूँजी आदमी को निगल रही हो
मैं मौन खड़ा
बौद्धिक जुगाली करती
नपुंसक कौम का हिस्सा नहीं बनना चाहता

सब ख़ामोश हैं

सब ख़ामोश हैं
चुपचाप सहते हैं सब
सब कुछ

बारिश में भीगती रही चिड़िया
भीग गए पंख
स्थगित रही उड़ान
बह गया घोंसला

सर्दियों में काँपती रही पत्तियाँ
ठिठुरते रहे फूल
पाला खा गया कलियों, कोंपलों को
धुन्ध में गुम हो गया सारा हरापन

धीरे-धीरे गर्म होते रहे दिन
तपती रहीं रातें
चुपचाप पिघलती रही सड़क
बहता, सूखता रहा पसीना
बढ़ती रही गन्ध
लेकिन छाँव की आस में दीवारें चुप हैं

मौसम लगातार बदल रहा है
पिघल रही है शिखरों पर जमा बर्फ
सूख रही हैं नदियाँ
बढ़ रही है रेत
बंजर होती ज़मीन

विचार भटक गए राह
सन्दर्भ पीछे छूट गए कहीं
हाथ से रेत की तरह फिसलते प्रसंग
बौने हो गए अर्थ
लम्बे होते शब्दों के साए
टुकड़ों में बँटी धरती पर
झण्डे के रंगानुसार
गढ़ ली गईं नयी परिभाषाएँ

माहौल बदल रहा है
भूख बढ़ रही है
लेकिन सब ख़ामोश हैं

भारी हो गया है ख़ामोशी का यह बोझ
बोलना जरूरी है अब
कुछ बोलो
समय आ गया है
हवा बहो !

सब ठीक हो जाएगा

धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा
बीत जाएगी रात
होगी सुबह
अमावस के बाद फिर छिटकेगी
चाँदनी

सब ठीक हो जाएगा एक दिन
ख़त्म होगा पतझड़
बरसेगा पानी
भर जाएगी नदी की सूखी छाती
ठूँठ पर उगेगी कोंपल
लहलहाएगी फ़सल

सब ठीक हो जाएगा
एक दिन मिलने लगेगा काम
मिलेगी पूरी मजूरी
भरने लगेगा परिवार का पेट

ठीक हो जाएगा सब
बन्द हो जाएगा आँसुओं का झरना
मुस्कुरा उठेंगी आँखों की कोरें
घर के आँगन में खेलेंगी
ख़ुशियाँ

सब कुछ ठीक हो जाएगा
रात में देखे सपने
पूरे होंगे दिन में
कम हो जाएगी
धरती और आकाश की दूरी
तारे होंगे हाथों के क़रीब

धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा
बस एक आस ही साथ रहती है सदा
और इसी उम्मीद में
एक दिन धीरे से पीछे छूट जाती है
ज़िन्दगी

मरा हुआ आदमी

इस तन्त्र की सारी मक्कारियाँ
समझता है आदमी
आदमी देख और समझ रहा है
जिस तरह होती है सौदेबाज़ी
भूख और रोटी की
जैसे रचे जाते हैं
धर्म और जाति के प्रपंच
गढ़े जाते हैं
शब्दों के फ़रेब

लेकिन व्यवस्था के सारे छल-प्रपंचों के बीच
रोटी की जद्दोजहद में
आदमी को मौक़ा ही नहीं मिलता
कुछ सोचने और बोलने का
और इसी रस्साकसी में
एक दिन मर जाता है आदमी

साहेब!
असल में आदमी मरता नहीं है
मार दिया जाता है
वादों और नारों के बोझ तले

लोकतान्त्रिक शान्तिकाल में
यह एक साज़िश है
तन्त्र की अपने लोक के ख़िलाफ़
उसे ख़ामोश रखने के लिए

कब कौन आदमी ज़िन्दा रह पाया है
किसी युद्धग्रस्त शान्त देश में
जहाँ रोज़ गढ़े जाते हैं
हथियारों की तरह नारे
आदमी के लिए
आदमी के विरुद्ध

लेकिन हर मरे हुए आदमी के भीतर
सुलग रही है एक चिता
जो धीरे-धीरे आँच पकड़ेगी

धीरे-धीरे हवा तेज़ हो रही है

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