भगवत दुबे की रचनाएँ

आप बड़े हैं

आप निगलते सूर्य समूचा
अपने मुँह मिट्ठू बनते हैं,
हमने माना
आप बड़े हैं!

पुरखों की
उर्वरा भूमि से यश की फसल आपने पायी,
अपनी महनत से, बंजर में हमने थोड़ी फसल उगाई।
हम ज़मीन पर पाँव रखे हैं,
पर, काँधों पर
आप चढ़े हैं!

किंचित किरणों
को हम तरसे आप निगलते सूर्य समूचा,
बाँह पसारे मिला अँधेरा उजियारे ने हाल न पूछा।
आप मनाते दीपावलियाँ
लेकिन हमने
दीप गढ़े हैं!

भ्रष्ट, घिनौनी
करतूतों से तुमने अर्जित कीं उपाधियाँ,
भूख, गरीबी, लाचारी की हमें पैतृक मिलीं व्याधियाँ।
तुमने, ग्रन्थ सूदखोरी के
हमने तो बस
कर्ज़ पढ़े हैं!

ऋचाएँ प्रणय-पुराणों की

छूते ही हो गयी देह कंचन, पाषाणों की,
हैं कृतज्ञ धड़कनें, हमारे
पुलकित प्राणों की!

खंजन नयनों के नूपुर जब तुमने खनकाये,
तभी मदन के सुप्त पखेरू ने पर फैलाये।
कामनाओं में होड़ लगी
फिर उच्च उड़ानों की।

यौवन की फिर उमड़-घुमड़कर बरसी घनी घटा,
संकोचों के सभी आवरण हमने दिये हटा।
स्वतः सरकने लगी यवनिका
मदन-मचानों की।

अधरों से, अंगों पर, तुमने अगणित छन्द लिखे,
गीत, एक-दो नहीं, केलि के कई प्रबन्ध लिखे।
हुई निनादित मूक ऋचाएँ,
प्रणय-पुराणों की।

कभी मत्स्यगंधा ने पायी थी सुरभित काया,
रोमांचक अध्याय वही फिर तुमने दुहराया।
परिमलवती हुई कलियाँ
उजड़े उद्यानों की।

झोंपड़ी के कत्ल का संशय हुआ है

ग्रीष्म ने जब भी जलाये गाँव मेरे
पीर की अनुभूति से
परिचय हुआ है।

धूप में मज़दूर जब नंगे बदन थे,
देखकर आतप्त तब मेरे नयन थे।
सर्वहारा एक मुझमें तप रहा था,
खुद मेरे अहसास को
विस्मय हुआ है!

पाँव में छाले, किसी के फूटते थे,
वो गिरें तो अंग मेरे टूटते थे।
रंग जब अट्टालिकाओं पर चढ़े हैं,
झोंपड़ी के कत्ल का
संशय हुआ है!

साँस जब फूली श्रमिक की, धमनियों की,
आँख भर आयी, विटप की फुनगियों की।
भ्रूण अँकुराये लता की कोख में जब,
हार में भी जीत का
निश्चय हुआ है!

नींद जाने कब खुलेगी

बोतलें बिकने लगी हैं
आज पानी की,
गन्ध गायब हो न जाए
रातरानी की!

कैद कूलर में हुई शीतल पवन,
घट गया अमराइयों में
स्वार्थ अपना ही अगन
अस्मिता खतरे में,
छप्पर-छाँव-छानी की!

आंचलिकता है अछूतों की तरह,
रौब है अँग्रेजियत का
रातपूतों की तरह
आ रसोई तक गई
चप्पल लखानी की!

खेत सूखे और प्यासे हैं कुएँ,
बाँझ लतिका, तरू नपुंसक
मेघ सन्यासी हुए
नींद जाने कब खुलेगी?
राजधानी की!

साँड़ तगादों के

न्याय माँगने, गाँव हमारे, जब तेहसील गये,
न्यायालय, खलिहान, खेत,
घर गहने लील गये!

लिया कर्ज़,
सम्भावनाओं की फसल गयी बोई,
फलीभूत आशा के होते, लगा रोग कोई।
साँड़ तकादों के, लठैत
खेतों में ढील गये

गिरवी रखा
अँगूठा, करने बेटी का गौना,
छोड़ पढ़ाई हरवाही करने निकला छौना।
चिन्ताओं के बोझ, सुकोमल
काँधे छील गये

उर्वर की,
भूदान यज्ञ वाली ज़मीन पड़ती,
हरियाली शहरी आँखों में, सदा रही गड़ती।
फिर कछार कांक्रीट वनों में
हो तब्दील गये

नफ़रत से
तिमिराच्छादित दिखती है गली-गली,
उच्छृंखल धर्मान्धताओं की ऐसी हवा चली।
प्रेम और सद्भावनाओं के
बुझ कन्दील गये

कभी न
छँट पाया, जीवन से विपदा का कुहरा,
राजनीति का, जिन्हें बनाया गया सदा मुहरा।
दिल्ली, लोक कला दिखलाने
भूखे भील गये

छूते ही हो गयी देह कंचन पाषाणों की

छूते ही हो गयी देह कंचन पाषाणों की
है कृतज्ञ धड़कनें हमारे पुलकित प्राणों की

खंजन नयनों के नूपुर जब तुमने खनकाए
तभी मदन के सुप्तप पखेरू ने पर फैलाए
कामनाओं में होड़ लगी फि‍र उच्चफ उड़ानों की
है कृतज्ञ धड़कनें हमारे पुलकित प्राणों की

यौवन की फि‍र उमड़ घुमड़ कर बरसीं घनी घटा
संकोचों के सभी आवरण हमने दिए हटा
स्वोत: सरकनें लगी यवनिका मदन मचानों की
है कृतज्ञ धड़कनें हमारे पुलकित प्राणों की

अधरों से अंगों पर तुमने अगणित छंद लिखे
गीत एक-दो नहीं केलिके कई प्रबन्धन लिखे
हुई निनादित मूक ॠचाएँ प्रणय-पुरोणों की
है कृतज्ञ धड़कनें हमारे पुलकित प्राणों की

कभी मत्स्यगंधा ने पायी थी सुरभित काया
रोमंचक अध्या‍य वही फि‍र तुमने दुहराया
परिमलवती हुईं कलियाँ उजड़े उद्यानों की
है कृतज्ञ धड़कनें हमारे पुलकित प्राणों की

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