मधुभूषण शर्मा ‘मधुर’की रचनाएँ

दस्तक

अच्छी किसे न लगती, दर पे ख़ुशी की दस्तक
इक ज़िन्दग़ी की आहट, इक रोशनी की दस्तक !
हो मुल्क और मज़हब , चाहे किसी का कोई
दरकार है सभी को , बस दोस्ती की दस्तक !
अब दोस्ती की कोई , तहज़ीब है तो इतनी
ये ख़ुदा के नेक बन्दों की है बन्दगी की दस्तक !
हर दिन तलाशता है , चेहरा खिली सुबह का
हर शब की है तमन्ना , हो चाँदनी की दस्तक !
अब चाँद और तारे , जागीर कब किसी की
यह नूर हैं इलाही दरियादिली की दस्तक !
आओ कि हम समझ लें नापाक सब इरादे
कह दें कि बस सुनेंगे पाकीज़गी की दस्तक !

अमूमन है होती
सहर कोई जैसी
नज़र आ रही थी
सहर ये भी वैसी

दी धरती की चौखट
पे सूरज ने दस्तक
तो ली ज़िन्दगी ने
नई एक करवट

फिर आँखों में जागे
यूँ सपनों के जमघट
कि सुनती थी हर सू
इरादों की आहट

लो चिड़िया कबूतर
ने छोड़ आशियाना
शुरू ढूँढ़ना कर
दिया आबो-दाना

गुलों पे भी शबनम
थी मोती-सी चमकी
तरो-ताज़ा कलियों
ने भी आँख झपकी

बढ़ी धीरे- धीरे
से गलियों में आहट
मिले हाथ आँखों
में ले मुस्कराहट

बढ़ा शोर आहिस्ता
आहिस्ता ऐसे
कि पास आ रही हो
कोई रेल जैसे

लगीं होने हर सू थी बातें ही बातें
कि कुछ सुन रहा था तो सुनती थी बातें
कहीं दूधिया -सी कहीं सब्ज़ा -सब्ज़ा
हुआ शहर सारे पे बातों का कब्ज़ा

नहीं कोई तनहा नज़र आ रहा था
यूँ झुरमुट अकेले को धकिया रहा था
कि बच्चे से बच्चा
कि धक्के से धक्का
कि डालर से सिक्का
कि काशी से मक्का
समझ भी रहा था, या समझा रहा था
बहल भी रहा था, या बहला रहा था

अमूमन है होती
सुबह कोई जैसी
नज़र आ रही थी
सुबह ये भी वैसी

मगर दूर बैठे
थे कुछ ऐसे साए
घड़ी पर थे अपनी
जो नज़रें जमाए

धमाके पे होने
लगा जब धमाका
तो इक दूसरे की
था आँखों में झाँका

नज़र आ रही थी
वहाँ एक वहशत
कि देखे जिसे तो
दहल जाए दहशत

अरे तौबा – तौबा
ये कह क्या रहे हैं
कि मज़हब नहीं वो
जो फ़र्मा रहे हैं

हुआ काम उसका
लिया जिससे पैसा
चलो देखते हैं
कि मंज़र है कैसा

अमूमन है ढलती
हर इक शाम जैसे
ढली शाम हाए
नहीं थी ये वैसे

था धरती पे मुर्दा -सा
सूरज का मस्तक
था वहशत का मंज़र
या दहशत की दस्तक

था आँखों में उमड़ा
इक अश्कों का जमघट
था बेबस सन्नाटा
या लाचार मरघट

यूँ चिड़िया कबूतर
के थे पंख बिखरे
कि दाने लहू में
सने उनके सिसके

हुए फूल वाकिफ़
है क्या चीज़ आतिश
कि कलियों ने देखी
है क्या चीज़ कालिख

था गलियों में बढ़ता
गया सूनापन- सा
छुटे हाथ आँखों
में ले गीलापन- सा

उठा शोर आहिस्ता
आहिस्ता ऐसे
कि लाशों पे गिद्धें
जमा होतीं जैसे

फिर उठने लगीं कोने-कोने से चीखें
कि गुस्से से नफ़रत से रोने से चीखें
कहीं सुर्ख़ खूँ- सी कहीं ज़र्द चीखें
चढ़ीं शहर पे परत-दर-परत चीखें

लगी भीड़, तनहा हर इक चल रहा था
अकेला भी झुरमुट में यूँ ढल रहा था
कि बच्चे से बच्चा
कि धक्के से धक्का
कि डालर से सिक्का
कि काशी से मक्का
धमक भी रहा था या धमका रहा था
दहल भी रहा था या दहला रहा था

अमूमन है ढ़लती
हर इक शाम जैसे
ढ़ली शाम हाए
नहीं थी ये वैसे

अच्छी किसे है लगती बेहूदगी की दस्तक
अलगाव की नुमाईश या तीरगी की दस्तक
क्यूं कर किसी के दर पे वहशत की थपथपाहट
क्यूं कर किवाड़ झेलें ये दरिन्दगी की दस्तक

कि दरिन्दगी के होते मस्जिद कहीं न मंदिर
शैतान की है बस ये आवारगी की दस्तक
दरकार कब किसी को बारूद , बम या गोली
दहशत के ये तमाशे , हैवानगी की दस्तक

अब बेनक़ाब कर दो हैवानियत के चेहरे
रह जाए अनसुनी- सी हर तंगदिली की दस्तक
कह दो ये वहशतों से कि सही न जाएगी अब
इस गुलिस्ताँ में हम से वीरानगी की दस्तक

 

लोगों की शक्लों में ढल कर सड़कों पे जो लड़ने निकले हैं

लोगों की शक्लों में ढल कर सड़कों पे जो लड़ने निकले हैं
वो कुछ तो बूढ़े अरमाँ हैं कुछ शोख़ -से सपने निकले हैं

ऐ रहबर ! अपनी आँख उठा, कुछ देख ज़रा, पहचान ज़रा
ग़ैरों-से जो तुझको लगते हैं वो तेरे अपने निकले हैं

बहला न सकीं जब संसद में रोटी की दी परिभाषाएँ
तो भूख की आग से बचने को हर आग में जलने निकले हैं

बदले परचम हाक़िम लेकिन बदली न हुकूमत की सूरत
सब सोच समझ कर अब घर से तंज़ीम बदलने निकले हैं

जिस हद में हमारे कदमों को कुछ ज़ंजीरों से जकड़ा है
बिन तोड़े उन ज़ंजीरों को उस हद से गुज़रने निकले हैं

हम आज भगत सिंह के जज़्बों को ले कर अपने सीनों में
जो राह दिखाई गांधी ने वो राह परखने निकले हैं

अन्ना हज़ारे के प्रयास को समर्पित एक ग़ज़ल

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