रंजीत वर्मा की रचनाएँ

 

नहीं देख पाऊंगा यह सच

दिल्ली की सड़कें कितनी वीरान है
यह मैंने जाना
तुम्हारे जाने के बाद

तुम जहां नहीं होती
वहां छांह नहीं होती
और उफ
यह धूप होती है कितनी तेज
कोई आसरा नहीं होता
हर आहट हो जाती है दूर

प्रेम की तड़प खत्म नहीं हुई हमारी
इस उत्तर आधुनिक युग में भी
क्या मैं उम्मीद करूं कि
हवाओं के झोंकों से भरा दरख्त बनकर
तुम आओगी मेरे जीवन में
गिरोगी मेरी आत्मा पर
ठंडा बहता झरना बनकर
तुम्हारी पलकें झुकेंगी
और छुपा लेंगी मुझे अंदर कहीं

बिखरे केश में ढंक जाता है तुम्हारा चेहरा
चांद और बादल का ऐसा
अलौकिक दृश्य
एक तुम्ही रच सकती हो
एस धरती पर

मुझे पता है
मैं खत्म हो जाऊंगा एक दिन
तब भी नहीं देख पाऊंगा यह सच।

मैं तुम्हारे साथ रहूंगी हमेशा 

सबसे बुरे दिनों में
मुझे तुम्हारा साथ मिला
जब मेरे पास जीने का कोई
मकसद नहीं बचा था
और फाकाकशी
मुझे संभलने का मौका नहीं दे रही थी

ऐसे अंधेरे वक्त में
जब पांव डगमगा जाते हैं अक्सर
मुझे तुम्हारा साथ मिला

तुम दूर से आती दिखती थी
और पत्थर पर बैठा मैं
तुम्हें उठते हुए चांद की तरह देखता था
रोटी की लड़ाई लड़ता हुआ मैं इस तरह
चांद के करीब चला जाता था

चांद ठहरता नहीं हमेशा पूरी रात
तुम भी चली गई एक दिन
एक ऐसे ही अंधेरे वक्त में
ज्ब पांव डगमगा जाते हैं अक्सर

मेरी आंखों में गहरे कहीं
तुम अमिट प्यास की तरह बस र्गए

मेरी धमनियों में दौड़ते रक्त से
तुम्हारे नाम का संगीत उठता रहा
और वर्षों भटकता रहा मैं
अनजान रास्तों पर

और लौटता रहा बार बार
समझने की कोशिश में

कि आखिर किसने कहा था

मैं तुम्हारे साथ रहूंगी हमेशा।

जिस तरह मैं भटका

एक ऐसे समय में
मैंने तुम्हारा साथ दिया
जब समय
मेरा साथ नहीं दे रहा था

वे हो सकते हैं
उत्तेजक और अमीर
लेकिन जिस तरह मैं भटका
मिलने को तुमसे पूरी उम्र
भटक कर दिखाएं वे
एक पूरा दिन भी

एक ऐसे समय में
जब प्रेम करना
मूर्खता माना जा रहा था
और अदालतें खिलाफ में
फैसले सुना रही थीं
प्रेमिकाएं
अपने वादों से मुकर रही थीं
और प्रेमी पंखे से झूल रहे थे
मैंने प्रेम किया तुमसे
तमाम खतरों के भीतर से गुजरते हुए
मैंने तुम्हे दिल दिया
जब तुम्हे खुद अपना दिल
संभालना मुश्किल हो रहा था

तुम्हारे सांवले रंग में
गहराती शाम का झुटपुटा होता था हमेशा
एक रहस्य गढ़ता हुआ
मैं एक पेड़ की तरह होता था जहां
अंधेरे में खोता हुआ

एक ऐसे समय में
ज्ब आगे बढ़ने के करतब
कौशल माने जा रहे थे
बादलों की तरह भटकता रहा मैं
मिलने को तुमसे पूरी उम्र
भटककर दिखाएं वे मेरी तरह
एक पूरा दिन भी।

दिल मशाल बन जाए जलता हुआ

असमानता तब पैदा होती है
जब कोई चीज़ एक के पास होती है
और दूसरे के पास नहीं
कोई ज़रूरी नहीं कि वह धन हो
या सत्ता की ताक़त
वह जाति धर्म रंग या चेहरे की बनावट
या इसी तरह की वह कोई दूसरी चीज़ भी हो सकती है
मसलन वह एक के द्वारा पढ़ ली गई
और दूसरे के द्वारा नहीं पढ़ी जा सकी
कोई किताब भी हो सकती है
कोई ख़बर
कोई मन्त्र कोई सूत्र
कोई जादू-टोना भी वह हो सकता है

हाथ में बन्दूक लिया हुआ आदमी
किसी निहत्थे के सामने असन्तुलन पैदा करता है
और पण्डिताऊ ज्ञान तो प्राचीनतम हथियार है
यह बताने को कि सब बराबर नहीं होते
और यह बात वह
जितनी भाषा में कह सकता है
हो सकता है तुम्हारे पास
उतने शब्द भी न हों
हो सकता है तुम्हें यह भी पता न हो
कि एकतरफ़ा फ़ैसला सुनाए जाने की तैयारी
जब हो चुकी हो पूरी
तो वैसे बुरे वक़्त में
अपना पक्ष ताक़तवर शब्दों में
कैसे रखा जाता है दुनिया के सामने ठीक-ठीक

दरअसल यह सोच की विद्रूपता है
जो असमानता पैदा करती है
एक के पास, दूसरे के पास नहीं होने से
इसका कोई रिश्ता नहीं
इनका श्रेष्ठता से कोई सम्बन्ध नहीं

सबसे ज़्यादा अकड़ में वह दिखता है
जो पूरे आत्मविश्वास से मूर्खतापूर्ण बातें कर लेता है
बल्कि कहना चाहिए कि मूर्खों के पास
जो आत्मविश्वास होता है
उसे कहीं और ढूँढ पाना मुश्किल है
और फिर जो असमानता वह पैदा करता है
वैसी लहूलुहान असमानता कोई पैदा नहीं कर सकता
इतिहास घायल है ऐसे उदाहरणों से

मूर्खों जैसा आत्मविश्वास
आप चाह कर भी अपने अन्दर पैदा नहीं कर सकते

कहने की ज़रूरत नहीं
हम इतिहास के अछोर अन्धेरे समय में खड़े हैं
दिल मशाल बन जाए जलता हुआ
कोई ऐसा बात करो कॉमरेड!

बहुरूपिया

कभी शिव तो कभी काली
कभी हत्यारा तो कभी हनुमान
कभी बाघ तो कभी
ख़ून से लथपथ
बेतहाशा भागता कोई इंसान
कभी जोकर तो कभी मजनूँ
बहुरूपिये के हज़ार रूप होते थे
हज़ार स्वांग भरता था वह
हम उससे डरते थे
इसके बावजूद उसके पीछे दूर तक चले जाते थे
नए लोगों को उससे डरता देख हँसते थे
फिर लौट जाते थे उस जगह से
जहाँ वह अभिनय करना बन्द कर देता था

इस बीच कई साल निकल गए
उसके बारे में कुछ सुना नहीं तभी एक फ़िल्म देखी ‘द लॉस्ट बहुरूपिया’
उस फ़िल्म में उसका कारुणिक अन्त दिखाया गया था
और उसका हमेशा के लिए चला जाना
बाद में कई लोगों को कहते सुना
कि वह वापस आ गया है
इस बार वह बिलकुल नई धज में है
बल्कि कहना चाहिए कि यह वो नहीं है
जो गया था किसी गहरी मानवीय त्रासदी की तरह
यह कोई और है
जो बहुरूपिया का रूप धर कर आया है
कभी यह अपने बाल सँवारता है
कभी मोम का पुतला बन जाता है
तो कभी डबडबाई आँखों और भरे गले से
कुछ बोलने का लेकिन नहीं बोल पाने का
शानदार अभिनय करता नज़र आता है

बच्चे हँस रहे हैं
चुटकुले गढ़ रहे हैं
जा रहे हैं उसके पीछे हँसी-ठिठोली करते
उस जगह से लौटने के लिए
जहाँ वह अभिनय करना बन्द कर देगा

मार्क्स ने कहा था
इतिहास जब खुद को दोहराता है तो
प्रहसन की तरह होता है
तो क्या अन्त में जब पर्दा गिरेगा
लोग ठीक उसी तरह सहमे हुए बाहर निकलेंगे
जब इतिहास पहली बार
त्रासदी की तरह घटित हो रहा था
और तानाशाहों का पर्दा एक-एक कर गिर रहा था।

न्यायपालिका

न्यायपालिका के मुखिया की पलकें भीग गईं
उसने रूमाल निकाला और
करीने से दोनों आँखें पोंछी
भर्राई आवाज़ में
एकिकनियम का गणित समझाया
लम्बित मामलों की संख्या
जजों की संख्या का अनुपात बताया
फिर फ़ैसले में लगने वाले
दिन महीने साल का हिसाब दिया
और थककर बैठ गया

वहाँ वह भी था
जो न्यायपालिका को
घुटनों के बल देखना चाहता था
उसने कहा
जब जागो तब सवेरा
दरअसल वह कहना चाहता था
अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे।

फुलकली देवी

बहुत गहरे से उठती
उद्विग्न गण्डक की हहराती आवाज़
रात के सीने पर अनवरत
पटकती रहती है सर अपना
और सिसुआ मंगलपुर के
थरथराते अन्धेरे में फैल जाती है
हवा के तेज़ निर्बाध थपेड़े
और लगातार डूबते जा रहे
गाँव के कगार पर खड़ा
कोई आदमी आख़िर क्या सोच सकता है
जहाँ सरकार के नाम पर
दिखता हो महज एक ठेकेदार
और देश की सबसे निचली अदालत
भी दूर हो इतनी
कि पानी की हहराकर उठती आवाज़
भी कभी पहुँच नहीं पाती उस तक
डूबता जा रहा है पूरा गाँव धीरे-धीरे

इस देश का लोकतन्त्र जबकि
सिर्फ सत्ता को ताक़तवर बनाता हो
ऐसे में एक आदमी
आखिर क्या सोच सकता है
रात के अन्धेरे में
डूबते गाँव के कगार पर खड़ा

क्या कहता है संविधान
बताए अगर जो पढ़ रखा हो किसी ने
सुना है बाबा साहब अम्बेडकर ने लिखा था इसे
दलितों के आदमी थे वो
और यहाँ शुरू से ही दलितों के गाँव
डूबते रहे हैं इस देश में
चाहे बाढ़ में चाहे बाँध में
कुछ न कुछ ज़रूर होगा संविधान में
बाबा ने कुछ न कुछ ज़रूर लिखा होगा
और अगर कुछ नहीं है तो
फिर किस बात के बाबा
और किस बात का संविधान

गण्डक के कगार पर खड़ा
यह सिसुआ मंगलपुर है
जहाँ फुलकली देवी रहती है
दबंगों के जबड़े से
हक़ की ज़मीन छीन लाई थी जो
अपने वीरतापूर्ण दिनों में पिछले साल
लेकिन आज रात क्या वह बचा सकती है
अपने सिसुआ मंगलपुर को गण्डक में डूबने से
जैसे डूब गए थे एक दिन
मैनेजरी बाज़ार, बैसिया बाज़ार
इस इलाके के हुआ करते थे जो
कभी सौदा सुलुफ़ के नामी हाट

जैसे डूब गए थे एक दिन
सिसुआ खाफटोला
पुजरा मल्लाह टोला
दादियों-परदादियों की कहानियों से भी
पुराने हुआ करते थे जो गाँव
जहाँ शाम होते ही
बच्चों के उठ रहे शोर के बीच
जनम लेने लगती थी अचानक
कोई प्रेम कहानी
चूडिय़ों के किसी रंग के पीछे से
फिर कहीं स्वप्नलोक की तरह गुम हो जाती थी
क्या पता कल दिन निकलते ही
सिसुआ मंगलपुर भी दर्ज कर लिया जाए
सरकार के रिकॉर्ड में बेचिरागी
और कई कहानियाँ ज़िन्दगी में उतरने से पहले ही
इस विप्लव में समा जाएँ

फुलकली देवी नहीं बचा पाएगी
अपने गाँव को डूबने से
उसके पीछे किसी की ताक़त नहीं है
न ठेकेदार की, न संविधान की
न अदालत की
तो क्या सर दोआब जी टाटा ट्रस्ट बचाएगा
गिरधारी करता है जिसका बखान
अपने गीतों में

कौन बचाएगा डूबने से
असंख्य अजन्मी प्रेम कहानियों को
फुलकली देवी की शौर्यगाथाओं को
इस बुरे वक़्त में
फुलकली देवी ख़ुद को बचा ले
यही बहुत है।

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