राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल की रचनाएँ

गाँव- गाँव के खेत हरे हैं

गाँव- गाँव के खेत हरे हैं
मटमैले पानी से छल-छल
उछल रहे भरके डबरे हैं
गाँव- गाँव के खेत हरे हैं।
लहराती मस्ती धानी-धानी
छिछला रहा रिमझिम का पानी
घोप उठे, काजल से बादल
पुरवाई बहती दीवानी,
घर दुआर में, घन कछार में
मृदु तान भरे स्वर धार झरे हैं।
गाँव- गाँव के खेत हरे हैं।
दिन रात ओरवती चलता है
दिन अनजाना-सा ढलता है
मधुर सुहानी साँझ समेटे
घूँघट में दीपक चलता है
दादुर झींगुर के स्वर बोझिल
पलकों पर निशिमद उतरे हैं।
गाँव-गाँव के खेत हरे हैं।

आ तेरा श्रृंगार सजा दूँ

आ तेरा श्रृंगार सजा दूँ
ओ माटी के धुँधले दीपक
आ तेरा आकार बना दूँ
आ तेरा श्रृंगार सजा दूँ

घुमड़ रही है व्यथा सृष्टि में
और मधुर तुम भरी दृष्टि में
प्राणों की कल्पने अरी,
इस जगती-सा साकार बना दूँ।
आ तेरा श्रृंगार सजा दूँ

चंचल लोचन अस्थिर पलकें
झाँके सत्य सृष्टि चिलमन के
अरी शरीरी विकल्प वेदने,
तुझमें हाहाकार जगा दूँ।
आ तेरा श्रृंगार सजा दूँ

स्मृति के ये आँसू अविरल
झरते असफलता में प्रतिपल
तरल दृगों के शुभ्र-पटल पर
शाश्वत नव चीत्कार सजा दूँ।
आ तेरा श्रृंगार सजा दूँ
जला अचंचल प्रातः सोया
स्पप्न मृत्तिका दीपक खोया
प्राण मृत्यु की मूक निशा में
मीठी चुप झंकार सुना दूँ
और चिरंतन पथ विकास को
विस्तृत जब संसार रचा दूँ
प्राण, अरे श्रृंगार सजा दूँ

 

माटी का प्यार अमोल रे

माटी का प्यार अमोल रे
सरग नरक को छोड़-छाड़ कर
माटी के संग डोल रे।
पागल तू दिन-रात ध्यान में
सोचा करता इस-उस जग की
कर्म फांस माया-बंधन की
बुद्धिवाद प्रगति के मग की
अरे, उठ मिट्टी से भेंट कि इसमें
जीवित उर के बोल रे।
माटी का प्यार अमोल रे।

मटमैला धूसर-सा तन हो
माथे पर मेहनत का पानी
मस्ती के संग जीना मरना
धरती अपनी अमर जवानी
ओ, जनवादी बन श्रमजीवी
अग-जग में समरस घोल रे।
माटी का प्यार अमोल रे।

माटी ही इतिहास गढ़ेगा
माटी जीवन भाग्य विधाता
धूल भरा इंसान जगत का
माटी स्वर्मिम विश्व बनाता
कुदरत की भाषा पढ़-पढ़कर
कर ले प्रेम कलोल रे।
माटी का प्यार अमोल रे।

अभिनन्दन है अभिनन्दन है

अभिनन्दन है अभिनन्दन है।।
ओ माटी के पूत तुम्हारा
युग का शतशत वन्दन है
अभिनन्दन है।।

तुम धरती के प्राण, कि
तुमसे इस जीवन का त्राण
तुम्हारे गीतों का अभिमान,
छिपाये मानव का कल्याण
तुम्हारे मुख से मुखरित आज,
युगों का शोषित भीषण क्रंदन है
अभिनन्दन है।।

तुम पीड़ा के प्यार
कि तुमसे वैभव का श्रृंगार
तुम्हारे अधरों का अंगार,
मौन रह करता हाहाकार
तुम्हारी वाणी का स्वर दीन,
स्वरों में आह भरा नित क्रंदन है
अभिनन्दन है।।

तुम थिरप्रज्ञ अजान,
बुद्ध की करूणा के युग-गान
मार्क्स के अर्वाचीन प्रमाण,
गाँधी के जीवनमय वरदान
हे ग्राम देवता विश्व भरण
तुमको प्रणाम भूनन्दन है
अभिनन्दन है।।

तुम इनकिलाब की आग
सुप्त यौवन में भैरव राग
दलित मानवता के अमर सुहाग,
तुम्हारा प्रतिपल विकसित भाग
युग में श्रम का जय घोष लिये
चल पड़ा तुम्हारा स्यंदन है
अभिनन्दन है, अभिनन्दन है।।

माटी का मुझे दुलार मिले

माटी का मुझे दुलार मिले
माटी के दीवानों का बस मटमैला-सा प्यार मिले।
माटी के जलते अधरों पर जीवन का सिंचित प्रेम सुहाना
और सुनहले भ्रम के स्वर में छाये मधुमय अमर तराना
प्राण-प्राण में गीत बसा हो, कर में हो सोंधी-सी माटी
एक लहर मस्ती की जागे एक नजर हो मग्न जमाना
धरती के हँसते रंगों से चिर जीवन को आकार मिले।
माटी का मुझे दुलार मिले।

प्रकृति-सना मानव का शैशव, पीड़ा रंजित यौवन की चाहें
दीप मृत्तिका खो विद्युत से प्रतिपल विकल शरीरी आहें
धरती सुत चित्कार सजाता क्रंदित-प्रतिध्वनि युग बिछोह में
प्रशस्त ज्योति की रेखा मिटती, किंतु आज है कुंठित राहें
तो फिर जीवन में मानव को श्रमिकों का आभार मिले।
माटी का मुझे दुलार मिले।

कोलाहल जनरव के संग साँस छूट रही मानव तक की
और सजी संहार कल्पना, काल बन रही जर्जर क्षण की
चल खेतों की ओर कि जिसका पथ सूना श्रृंगार अधूरा
जहाँ जगी साकार साधना वन्दन हो उस स्वर्णिंम कण की
माटी का जीवन जीकर प्यारे माटी का मौन मजार मिले।
माटी का मुझे दुलार मिले।

भूमिदान कर चलो, जहान जी उठे

भूमिदान कर चलो, जहान जी उठे
प्राण-प्राण में धरा का मान जी उठे।
छा रहा जगत् में आज घोर अंधकार देख
कोई भूख मर रहा, न भर रहा है हाय पेट
और कोई बन अमीर सैकड़ों लुटा रहा
चूस कर गरीब को धान्य-धन जुटा रहा।
भेंट लो गरीब से ईमान जी उठे।
भूमिदान कर चलो जहान जी उठे।

बिछुड़ गई है माँ धरा मिहनती किसान से
लाड़ले सुपुत्र से कि प्रेम के निशान से
इस दरिद्र राम की आज बन्दना करो
पाप जो थे ढो रहे उसकी वर्जना करो।
स्वामित्व दान कर चलो, इंसान जी उठे।
भूमिदान कर चलो जहान जी उठे।

जमीन है बदल रही, बदल रहा है आसमान
तूफान आज चल चुका कि हो रहे हैं सब समान
प्रेम से हर एक की जरूरतों को जान लो
व्यर्थ खून ना बहे गरीब बंधु मान लो
सहस्त्र दीन रूप धर कि राम जी उठे।
भूमिदान कर चलो जहान जी उठे।

उठ पड़ो हे भूमिपति! भूमिदान कर चलो
गाँव के ही बे-जमीन को सप्राण कर चलो
घर का एक मानकर दरिद्र आन रख चलो
कसम तुम्हें है हिंद की कि प्रेमदान कर चलो।
भारतीय धर्म का गुमान जी उठे।
भूमिदान कर चलो जहान जी उठे।

संत विनोबा पुण्य यज्ञ भूदान कराने आये हैं

संत विनोबा पुण्य यज्ञ भूदान कराने आये हैं
गाँव-गाँव में अमर प्रेम की अलख जगाने आये हैं।
ग्राम निवासी भाई-भाई धन वाले और दीन किसान
दोनों धरती पर ही जीते मरते दोनों एक समान
भूख-प्यास दोनों को लगती सबका एक वही भगवान
किन्तु एक है मौज उड़ाता एक सदा होता बलिदान
दो भाई के बीच भेद की भीति ढहाने आये हैं।
बेजमीन मजदूरों को हम भूमि दिलाने आये हैं।
गाँव-गाँव में अमर प्रेम की अलख जगाने आये हैं।

ऐ अमीर तुमको तो प्रभु ने लक्ष्मी का वरदान दिया
किन्तु आज तक तुमने क्या कुछ भी प्रतिदान किया
अरे तुम्हारे ही पड़ोस में भूखा नित प्रभु सोता है
और दरिद्रों की काया में राम हमारा रोता है
आग भरे प्रभु के आँसू से सबक सिखाने आये हैं
हिंसा की खूनी ज्वाला से इंसान बचाने आये हैं।
गाँव-गाँव में अमर प्रेम की अलख जगाने आये हैं।

है अनीति यह धरती पर जो एक बिना श्रम, राज करे
और परिश्रम करके दूजा रोटी को मुहताज फिरे
दो जमीन अब उसको भाई जो भू पर जान निसार रहा
हवा धूप और पानी पर कब किसका है अधिकार रहा?
जियो और जीने दो सबको, यह समझाने आये हैं
जन-मन के घने कुहासे में हम सूर्य उगाने आये हैं
गाँव-गाँव में अमर प्रेम की अलग जगाने आये हैं।

चेत उठो अब नया जमाना आ करके दम लेगा भाई
नहीं चलेगी अब आगे से शोषण की ये मौज कमाई
आज प्रेम से माँग रहे हैं भू-संपति तु दे डालो
धरती का बेटा जागा है उसे प्रेम से गले लगा लो
आज अहिंसक इंकलाब का शंख बजाने आये हैं।
नयी व्यवस्था का देखो निर्माण कराने आये हैं।
गाँव-गाँव मे अमर प्रेम की अलख जगाने आये हैं।

रावण का पुनर्जन्म हो चुका है

रावण का पुनर्जन्म हो चुका है
सिर धुन रहे हैं राम
और दरबारी हो गये हैं
आकर्षक पुरस्कार की लालसा में
सारे तुलसी
अथवा बास से बेस्ट चिट
पाने की टोह में
सीता को पहुँचा रहे हैं
स्वयं अशोक बाटिका में
खीझ कर कुंठा
स्वयं ब्रह्मचारिणी हो गई है।
अग्निपरीक्षा दे रही है
नपंुसकता।
युग का पुरूषार्थ कुंभकरण
बन चुका है।
हमारी विद्वता, मनीषा
जंजीर बँधे
अलसेशियन के समान
संकेत पर भौंक रहे हैं
और अर्धचेतन सूर्पणखा अपनी
दानवीयता से बेखबर हो
कर्म के लक्ष्मण को ग्रसने
आमादा हो गई है।
राम की खड़ाऊँ लेकर भरत
राम के खिलाफ जूडीशियल
इंक्वायरी करा रहा है।

अयोध्यावासी किंकर्तव्यविमूढ़ हैं
कि ऐसे में वे क्या करें?
लोग भय से फिर भी आशा से
कभी कभी सोच उठते हैं कि
क्या तुलसी का भी पुनर्जन्म होगा?
रावण का तो पु

नये वर्ष का नव विहान है 

नये वर्ष का नव विहान है, किन्तु किरण क्या अर्वाचीन?
शाश्वत सिंधु की उर्मि लहरिया, हो सकी नहीं प्राचीन।
कालजयी नश्वरता में नूतन का, होता सत्वर है अभिषेक।
प्राण प्रतिष्ठित होकर मूरत, विनिमज्जित हो, यही विवेक।
युग का समय-चक्र नित संचरे, पल-पल निर्मित अभिनव सृष्टि।
मवंन्तर का समार्थ्य प्रकट हो, गढ़ो सत्य शिव सुन्दर दृष्टि।
अहं-तुष्टि में उलझे, आओ, सब मिल छोटे काम सँवारें।
पल-पल घड़ियाँ से ऊपर उठ हम युग-जीवन को तारें।

नर्जन्म हो चुका है।

छत्तीसगढ़ की माटी से

छत्तीसगढ़ की माटी से
प्रेम भरी परिपाटी से
मेहनत कश के हाथों में
घोर अमा की रातों में
नया दिया जलाओ रे।
जगमग ज्योति जगाओ रे।।

घोर उपेक्षा अन्यायों में
चाहत की मजबूरी मंे
हिंसा घोर पनपती साथी
करूण किरण की दूरी में
व्यवधानों की परिधि रेख से
अंधियारा दूर हटाओ रे।
जगमग ज्याति जगाओ रे।।

मैला माँ का आँचल है
महानदी में आँसू जल है
लाल हमारा भूखा है
वन प्रांतर सब सूखा है
बटमारों से पहरेदार मिले
मुरझाये बिन फूल खिले
झोपड़ियाँ खाली खाली हैं
आई फिर दीवाली है
तम का अजगर पसर न पाये
आओ मशाल उठाओ रे।
जगमग ज्योति जगाओ रे।।

अपना है राज, दुनिया है अपनी
मुन्ना अपना मुनिया है अपनी
धरती पर जितने लाल चले हैं
धरती के भीतर उतने लाल पले हैं
यह हरियाली अपनी है,
यह सारा आकाश है
आज साँस भर जागे हम में,
एक नया विश्वास है
घर-घर गूँजे श्रम का गीत
सुख सपनों का हो संगीत
आज पसीने की बूंदों से
भागीरथ बन जाओ रे।
गंगा नई बहाओ रे।
जगमग ज्योति जगाओ रे।

क्षण भंगुरता के जीवन

क्षण भंगुरता के जीवन को अमर बनाता चल।
नश्वरता में शाश्वत के धुन दोहराता चल।
मुसाफिर गुनगुनाता चल,
बटोही गीत गाता चल।।
सही है नित्य सूरज डूबता है
काली रात आती है।
मगर युग युगों से ऊषा की किरण
जीवन का नया संदेश लाती है।
मरण की कोख से जीवन का उदय हो
ध्वंश को देकर चुनौती जीवन अभय हो
मृत्यु का तू भार लेकर
आनंद से मुस्कराता चल
मुसाफिर गुनगुनाता चल।
बटोही गीत गाता चल।।
फूल घड़ी भर खिलकर
झर जाते वायु झकोरों में
ल्ेकिन उनका अमर हास,
भर जाते दिगंत के छोरों में
क्षण भर का शैशव, दुनिया के नन्हों के
माँ की गोदी में इठलाना, भरना किलकारी
वात्सल्य अमर है शाश्वत है
अस्तित्व मिटे, यह रहता है मनहारी।
दुनिया मिटती है जग वंचन है
जो थिर है उसको पाता चल।
मुसाफिर गुनगुनाता चल,
बटोही गीत गाता चल।।
मानव जीवन की अनवरत श्रंृखला
दृग पट से होते जाते ओझल
मैं जान रहा, दैहिक काया की नश्वरता
कल भी सूरज निकलेगा, तारे चमकेंगे पल-पल
जाने वाले की स्मृति में सूरज नया उगाता चल
पवन के सुखद झकोरों से जीवन पता लगाता चल
मुसाफिर गुनगुनाता चल,
बटोही गीत गाता चल।।
कल तक जो होता था, वह कल भी होगा
मिट्टी का मिट्टी में मिलना यही कहानी है
सत्य तत्व से भरी मृत्तिका, माटी है शिव सौन्दर्य लिए
जीवन माधुर्य का दिव्य पुंज यह तो बात पुरानी है
जो पाया है उसे भुलाता चल,
जो खोया है उसे अपनाता चल।
मुसाफिर गुनगुनाता चल,
बटोही गीत गाता चल।।

गौतम गांधी की धरती वालों

गौतम गाँधी की धरती वालों तुमसे युग का यक्ष प्रश्न हैं
कोटि-कोटि श्वांसो के स्वामी मेरा तुमसे यह सवाल है।
आजादी की इतिश्री मानी तुमने
जब गड़़ा तिरंगा राजभवन में
मतदानों के व्यूह चक्र से
पद पाकर वैभव सर्जन में
किंचित सुविधा के कारण तुमने
सिद्धांतों की है खेली होली
क्या इन्हीं दिनों के लिए जवाब दो
गाँधी ने थी झेली गोली
ओ कर्णधार ओ प्रमाद ग्रस्त जन डूब रहा जग लूट रहा
शत सहस्त्र जो प्राण मिटे क्या उसका कुछ भी ख्याल है।
गौतम गाँधी की धरती वालों तुमसे युग का यक्ष प्रश्न है
ओ सुख आराधक कांचन सेवी
व्यस्त पुरूष जन गण अधिवासी
तेरे संचित मणि मुक्ता से
वैश्वानर जलता रोटी प्यासी
यह तेरा पुरूषार्थ कि भारत
अभाव ग्रस्त है भूखा नंगा
यह तेरा आदर्श कि तट है-
भीगा सूखी है गंगा
भारत करवट बदल रहा श्रम का स्यंदन निकल चला है
उभरी हुड्डी वाले दधीचि लो उठा रहे जलता मशाल है
गौतम गाँधी की धरती वालों तुमसे युग का यक्ष प्रश्न है।
क्या देख सके वीराने उन गाँवों को
जो आजादी में सूख चले हैं
लाख-लाख झोपड़ियों के कान्हा
बुझे दीप जो भूख पले हैं
निर्वाचित सूबेदारों के सीमा बंधन
बोली क्या हो यह विवाद है
दुर्बलता में वैभव विलास
और जनसत्ता पर बारूदी विषाद है
प्रजातंत्र के भग्न सिपाही बोलो क्या तुम आहुति दोगे
सही स्वराज्य के रक्षण का उठ रहा आज यह यज्ञ ज्वाल है
गौतम गाँधाी की धरती वालों तुम से युग का यक्ष प्रश्न है।
उठो अर्चना पूरी कर लो
श्रद्धा के आराधों का
परिभाषा में उलझो मत
यह समय नहीं है वादों का
बलिदानी ऋण से मोक्ष पर्व का
स्ंचित पावन मेला आज
गाँव-गाँव के स्वप्न संजोने
आज अकेला रच लो साज
व्यर्थ तेरी सज्जा साधन है झूठा है श्रृंगार मार्ग का
रक्त उतर आये हाथों में जन जीवन में गहरा उबाल है
गौतम गाँधी की धरती वालों तुमसे युग का यक्ष प्रश्न है।
बंद तिजोड़ी तुम जोड़ रहे
इसलिये कि श्मशानों में अलख जगाओ
सर्वनाश का दरबार लगे तो
महाप्रलय का स्वर दुहराओ
आज नहीं तो कभी नहीं फिर
खूब समझ लो मेरे साथी
विस्मय छोड़ो आगे आओ
प्रेमधार दो बुझती बाती
स्वाभिमान शंख है ध्वनित देश में माता तुमसे मांग रही
व्यर्थ अहं का करो विसर्जन पुनः उठा दो राष्ट्र भाल है
गौतम गाँधी की धरती वालों तुमसे युग का यक्ष प्रश्न है।
कोटि-कोटि श्वासों के स्वामी मेरा तुमसे यह सवाल है।

 

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