रामनरेश पाठक की रचनाएँ

हम न बोलेंगे, कमल के पात बोलेंगे

हम न बोलेंगे, कमल के पात बोलेंगे।

कीच का क्या रंग, क्या है उत्स कादो का
जेठ की है धूप कैसी मेघ भादो का
ये रहस्य वैसे समय के गात खोलेंगे
हम न बोलेंगे, कमल के पात बोलेंगे

किन वनों, मरू प्रांतरों से हवा क्या लायी
देह जूही नाग तन का मन उड़ा लायी
यह भरम दिक्पंख पर जलजात तौलेंगे
हम न बोलेंगे, कमल के पात बोलेंगे

तुहिन का क्या अर्थ, क्या सन्दर्भ भावी का
इड़ा का क्या गीत है, क्या काव्य रावी का
यह मिथक इतिहास के सह

पांच जोड़ बांसुरी कहाँ

एक जोड़ का पता नहीं
पांच जोड़ बांसुरी कहाँ ?

सीपियाँ प्रतीक्षिता रहीं
रेत, रेत, रेत रह गयी
मोतियाँ तिजोरियों पड़ीं
दस्तकें वनालिका गयीं

एक गीत का पता नहीं
पांच जोड़ गीतिमा कहाँ ?

चांदनी पुरंजनी बनी
माघ लो कबीर बन गए
भस्मीपूत वेणु-वन हुए
चौखटे अबीर बन गए

एक गुलमोहर कहीं नहीं
पांच जोड़ गुलमोहर कहाँ ?

राग, विम्ब–केतकी तरी
भाव छंद–नाग की फनी
अर्थमुक्त सृष्टि के प्रतीक
रूप, ताल–स्वेद की कनी

एक साम का पता नहीं
पांच जोड़ सामिका कहाँ ?

एक सिन्धु का पता नहीं
पांच जोड़ सिन्धुमा कहाँ ?

एक बिंदु का पता नहीं
पांच जोड़ बिंदुमा कहाँ ?

जात ढो लेंगे

महुए के पीछे से झाँका है चाँद

महुए के पीछे से झाँका है चाँद
पिया आ

आँगन में बिखराए जूही के फूल
पलकों तक तीर आये सपनों के कूल
नयन मूँद लो, बड़ा बांका है चाँद
पिया आ

बाँट गयी सान्झिल हवाएं पराग
बांकी स्वर लौट गए, शेष वही राग
टेसू के फूल-सा टहका है चाँद
पिया आ

प्रीत से नहाया है तन का हिरन
चुपके से चुनता है क्वाँरी किरण
जीतो तो इससे लड़ाका है चाँद
पिया आ ।

यह शहर

यह शहर
एक लम्बे अरसे से मेरा घर

जब छोड़ रहा हूँ तो
मैं उतना ही उदास हूँ जितना
नैहर छोडती हुई कोई लड़की
उदास हो जाती है

या कोई परदेशी गाँव छोड़ते हुए
अपनी उदासी के समंदर में डूब जाता है

या सोते-सूखने वाले झरने
या पति को विदा देने वाली कुलवधू
या फसल कटे खेत और सूनी चौपाल

बिजली के गुल हो जाने पर शहर
यज्ञ समाप्ति के बाद वेदी
तांत्रिक के न होने पर भैरवी
विसर्जन के बाद मूर्तिपीठ।

हम न बोलेंगे, कमल के पात बोलेंगे।

 

 

एक बूँद जल

मेरे गौशाला के खूंटों पर
दम तोड़ते
तीन जोड़ी बैलों की
आँखों की गहराई में
रुका हुआ एक बूँद जल
हर क्षण दिखता है
मुझे नींद नहीं आती।

टूटी खात पर
हताश पड़े
मेरे बापू की पथरायी, निर्निमेष
आखों की गहराई में
कठिनाई से रिसता हुआ एक बूँद जल
हर क्षण दिखता है
मुझे नींद नहीं आती।

मेरे खेतों में फट आई
दरारों के तलान्त पर
उबलता हुआ एक बूँद जल
हर क्षण दिखता है
मुझे नींद नहीं आती।

फूल लड़ाई

लोग
रौशनी से डरते हैं
सच से कतराते हैं
टेसू कहाँ फूलें ?

देह
देह के आ जाने को डरती है
कोहबर घर से कतराती है
गुलाब कहाँ उगें ?

गीत के पोखर
आदमी से डरते हैं
अपनी ही मेंड़ से कतराते हैं
कमल कहाँ झूमें ?

आओ
जुगनू की छाँव में
प्यार करें और अलग हो जायें

एक बड़ी लड़ाई
छिड़ने वाली है !

 

 

 

Share