अशोक रावत की रचनाएँ

हाथ में ख़ंजर रहता है

जब देखो तब हाथ में ख़ंजर रहता है,
उसके मन में कोइ तो डर रहता है.

चलती रहती है हरदम एक आंधी सी,
एक ही मौसम मेरे भीतर रहता है.

दीवारों में ढूँढ़ रहे हो क्या घर को,
ईंट की दीवारो में क्या घर रहता है.

गुज़र रहे हैं बेचैनी से आईने
चैन से लेकिन हर एक पत्थर रहता है.

तंग आ गया हूँ मैं उस की बातो से,
कौन है ये जो मेरे भीतर रहता है.

गौर से देखा हर अक्षर को तब जाना,
प्रश्नों में ही तो हर उत्तर रहता है.

थोडा झुक कर रहना भी तो सीख कभी,
चौबीसों घंटे क्यो तन कर रहता है.

वो ज़माना रहा ही नहीं 

वो समय वो ज़माना रहा ही नहीं,
सच कहा तो किसी ने सुना ही नहीं.

बात ये है हमें क्या मिला अंत में,
हम ने ये कब कहा, कुछ हुआ ही नहीं.

एक रंगीन नक्शों की फाइल तो है,
सिलसला इस के आगे बढ़ा ही नहीं.

खोट चाहत में था या कि तक़दीर में,
जिसको चाहा कभी वो मिला ही नहीं.

ढूंढ्ते ही रहे देवताओं को हम,
कोई पत्थर नज़र में चढ़ा ही नहीं.

कोई इनआम मिलता कहाँ से मुझे,
उनके दरबार में मैं गया ही नहीं.

एक शाइर सुना भूख से मर गया,
इस ख़बर को किसी ने पढ़ा ही नहीं.

कुछ पता तो चले क्यों है नाराज़ वो,
उसने मुझसे कभी कुछ कहा ही नहीं.

घर को हम बचा नहीं सके,

ये तो है कि घर को हम बचा नहीं सके,
चक्रवात पर हमें झुका नहीं सके.

ये भी है की मंज़िलें कभी नहीं मिलीं,
रास्ते मगर हमें थका नहीं सके.

हम किसी की ओट में नहीं थे पर हमें,
आँधियों के सिलसिले बुझा नहीं सके.

देखिए गुलाब की तरफ भी एक बार,
फूल क्या जो ख़ार से निभा नहीं सके.

अंधकार के हज़ार संगठन कभी,
रौशनी के वंश को मिटा नहीं सके.

संघर्षो की गाथा है 

संघर्षो की गाथा है, पीड़ा का गान नहीं
मेरी कविता मौज मनाने का समान नहीं.

मुझ में कोई खोट न हो ये कैसे सम्भव है,
लेकिन इतना अंतर है, मैं बेईमान नहीं.

फ़ुर्सत हो तो ऊपरवाले थोड़ा नीचे देख
इंसां बन कर इस जग में जीना आसान नहीं.

हैरत होती है कांटों पर सब न्यौछावर हैं,
फूलों पर दुनियावालों का कोई ध्यान नहीं.

जाने किसके सपने हैं जो शक्ल ले रहे हैं,
ये गांधी के सपनों का तो हिंदुस्तान नहीं.

दीवारों के उन घेरों को तुम घर कहते हो,
जिन में कोई खिडकी, कोई रोशनदान नहीं.

ज़हन में ख़ार होते हैं

ज़ुबां पर फूल होते हैं, ज़हन में ख़ार होते हैं,
कहाँ दिल खोलने को लोग अब तैयार होते हैं.

न अपने राज़ हमसे बांटती हैं ख़िड़कियाँ घर की,
न हमसे बेतकल्लुफ़ अब दरो-दीवार होते हैं.

ये सारा वक़्त काग़ज़ मोड़ने में क्यों लगते हो,
कहीं काग़ज़ की नावों से समंदर पार होते हैं.

बगीचे में कि जंगल में, बडे हों या कि छोटे हों,
किसी भी नस्ल के हों पेड़ सब ख़ुद्दार होते हैं.

उसूलों का सफ़र कोई शुरू यूँ ही नहीं करता,
मुझे मालूम था ये रास्ते दुश्वार होते हैं.

मैं उसकी इबादत क्यों नहीं करता

शिकायत ये कि मैं उसकी इबादत क्यों नहीं करता,
वो सबका है तो फिर मुझ पर इनायत क्यों नहीं करता.

मैं अपने दोस्तों से आजकल मिलता बहुत कम हूँ,
बुरा लगता है तो कोइ शिकयत क्यों नहीं करता.

न जाने ढूँढ़ता रहता है क्या अक्सर किताबों में,
मेरा दस साल का बेटा शरारत क्यों नहीं करता.

तुझे अपनी खुशी के रास्ते ख़ुद ही बनाने हैं,
अगर तू खुश नहीं है तो बग़ाबत क्यों नहीं करता.

उसूलों की बिना पर ही ये दुनिया खूबसूरत है,
ज़माना फिर उसूलों की हिमायत क्यों नहीं करता.

सीरत ही एक सी नहीं होती

इसलिये कि सीरत ही एक सी नहीं होती,
आग और पानी में दोस्ती नहीं होती.

आजकल चराग़ों से घर जलाये जाते हैं,
आजकल चराग़ों से रोशनी नहीं होती.

कोई चाहे जो समझे ये तो खोट है मुझमें,
मुझसे इन अँधेरों की आरती नहीं होती.

तुमको अपने बारे में क्या बताऊँ कैसा हूँ,
मेरी ख़ुद से फ़ुर्सत में बात ही नहीं होती.

कोई मेरी ग़ज़लों को आसरा नहीं देता,
सोच में अगर मेरे सादगी नहीं होती.

शायरी इबादत है, शायरी तपस्या है,
काफ़िये मिलाने से शायरी नहीं होती.

आज फिर ताले नज़र आये

हर शटर पर आज फिर ताले नज़र आये,
फिर क़वायद में पुलिसवाले नज़र आये.

धूल की परतें दिखीं सम्वेदनाओं पर,
आदमी के सोच पर जाले नज़र आये.

पंक्ति में पीछे हमेशा की तरह हम – तुम,
पंक्ति में आगे पहुँचवाले नज़र आये.

मैं ने किस किस को बिठाया अपने कंधों पर,
किसको मेरे पाँव के छाले नज़र आये.

बूँद भर आकाश से पानी नहीं बरसा,
दूर तक बादल तो घुंघराले नज़र आये.

ध्यान जिनका था कहीं नज़रें कहीं पर थीं,
हमको भी ये ही नज़रवाले नज़र आये.

न गाँधी पर भरोसा है न गौतम पर 

न गाँधी पर भरोसा है न गौतम पर भरोसा है,
ज़माने को मगर बंदूक के दम पर भरोसा है.

तुम्हारी बात तुम जानो, मैं अपनी बात करता हूँ
मुझे अब भी अहिंसा और संयम पर भरोसा है.

ये अपनी साख पर बट्टा कभी लगने नहीं देंगे,
मुझे अपने चिनारों और झेलम पर भरोसा है.

जहाँ तक बात है इन देवताओं पर भरोसे की,
भरोसा तो मुझे भी है मगर कम पर भरोसा है.

हवा नम हो रही है पास ही होंगे कहीं बादल,
किसी को हो न हो पेड़ों को मौसम पर भरोसा है.

उम्र भर कच्चे मकानों में रहे

भले ही उम्र भर कच्चे मकानों में रहे,
हमारे हौसले तो आसमानों में रहे.

हमें तो आज तक तुमने कभी पूछा नहीं,
क़िले के पास हम भी शामियानों में रहे.

उड़ानें भी हमारे सोच में ज़िंदा रहीं,
ये पिंजरे भी हमारी दास्तानों में रहे.

कौन इतना ध्यान देता है

सीरतों पर कौन इतना ध्यान देता है,
ये ज़माना सूरतों पर जान देता है.

सिर्फ़ दौलत की चमक पहचांते हैं लोग,
आदमी को कौन अब पहचान देता है.

आज ये किस मोड़ पर आकर खड़े हैं हम
बाप पर बेटा तमंचा तान देता है.

तू उसे दो वक़्त की रोटी नहीं देता
सोच में जिस शख़्स के ईमान देता है.

फूल हैं या ख़ार अंतर ही नहीं कोई,
तू महकने के जिन्हें वरदान देता है.

जब कोई अरमान पूरा ही नहीं होना,
आदमी को किस लिये अरमान देता है.

ये सच है मैं अंधकार में हूँ 

ये सच है इक मुद्दत से मैं अंधकार में हूँ,
सूरज निकलेगा लेकिन इस ऐतबार में हूँ.

देख सकूँ मैं पूरा सूरज घर के आँगन से,
कब से ऐसी एक सुबह के इंतज़ार में हूँ.

वैसे तो उससे मेरा सम्बंध नहीं कोई,
लेकिन उसकी हर बेचैनी हर करार में हूँ.

आज नहीं तो कल बदलेगी मेरी भी दुनिया
कैसा डर, में आज अगर ग़र्दो- गुबार में हूँ.

मेरी हर पूजा को तू क्यों ठुकरा देता है,
तेरी हस्ती के आगे मैं किस शुमार में हूँ.

हाँ अकेला हूँ 

हाँ अकेला हूँ मगर इतना नहीं,
तूने शायद गौर से देखा नहीं.

तेरा मन बदला है कैसे मान लूँ,
तूने पत्थर हाथ का फैंका नहीं.

छू न पायें आदमी के हौसले,
आसमाँ इतना कहीं ऊँचा नहीं.

नाव तो तूफ़ान में मेरी भी थी,
पर मेरी हिम्मत कि में डूबा नहीं.

जानता था पत्थरों की ख़्वाहिशें,
पत्थरों को इस लिये पूजा नही.

मैं ज़माने से अलग होता गया,
मैंने अपने आपको बेचा नहीं.

चौपल बिठाई जाती है

क्यों छोटी छोटी बातों पर चौपल बिठाई जाती है,
क्यों हमसे अपने घर में ही हर बात छुपाई जाती है.

कुछ लोग हमारी बस्ती पर पेट्रोल छिड़क कर बैठे हैं,
बस इतना बाक़ी है देखो, कब आग लगाई जाती है.

वो अपनी मर्ज़ी पर मेरा हर बार अँगूठा लेते हैं,
हर बार तबाही से पहले ये रस्म निभाई जाती है.

ये कर देंगे वो कर देंगे, कहते तो जाने क्या- क्या है.
मैं उससे बाहर होता हूँ जब नीति बनाई जाती है.

क्या जाने कौन बहारों को चालाकी से ले उड़्ता है,
क़ीमत तो मेरे खाते से हर बार चुकाई जाती है.

क्या जायज़ है नाजायज़ क्या और किसको इसकी चिंता है,
अब पैसे लेकर संसद में आवाज़ उठाई जाती है.

इस भारत की उस भारत से कोई भी बात नहीं मिलती,
जिस भारत की कम्प्यूटर पर तस्वीर दिखाई जाती है.

संकोच अँधेरों से

सूरज करता ही क्यों है संकोच अँधेरों से,
आज नहीं तो कल पूछेंगे लोग सवेरों से.

साहूकारों के मन में जब कोई खोट नहीं,
रखते ही क्यों हैं फिर ये सम्बंध अँधेरों से.

फिर सारे आरोप मढ़ दिये गये मछलियों पर,
पूछ्ताछ भी नहीं हुई इस बार मछेरों से.

विष का जो व्यपार करेगा उसकी हमदर्दी,
हो ही जयेगी सा‌पों से और सपेरों से.

सरस्वती के साधक भी क्या वक़्त आ गया है,
मांग रहे हैं वैभव के वरदान कुबेरों से.

तुमने अब भी खिड़की रौशनदान नहीं खोले,
धूप दे रही है तुमको आवाज़ मुंडेरों से.

डर मुझे भी लगा

डर मुझे भी लगा फ़ासला देखकर,
पर में बढ़ता गया रास्ता देखकर.

ख़ुद ब ख़ुद मेरे नज़दीक आती गई,
मेरी मंज़िल मेरा हौसला देखकर.

मैं परिंदों की हिम्मत पे हैरान हूँ,
एक पिंजरे को उड़ता हुआ देखकर.

खुश नहीं हैं अ‍ॅधेरे मेरे सोच में,
एक दीपक को जलता हुआ देखकर.

डर सा लगने लगा है मुझे आजकल,
अपनी बस्ती की आबो- हवा देखकर.

किसको फ़ुर्सत है मेरी कहानी सुने,
लौट जाते हैं सब आगरा देखकर.

जब देखो तब हाथ में ख़ंजर रहता है

जब देखो तब हाथ में ख़ंजर रहता है,
उसके मन में कोइ तो डर रहता है.

चलती रहती है हरदम एक आंधी सी,
एक ही मौसम मेरे भीतर रहता है.

दीवारों में ढूँढ़ रहे हो क्या घर को,
ईंट की दीवारो में क्या घर रहता है.

गुज़र रहे हैं बेचैनी से आईने
चैन से लेकिन हर एक पत्थर रहता है.

तंग आ गया हूँ मैं उस की बातो से,
कौन है ये जो मेरे भीतर रहता है.

गौर से देखा हर अक्षर को तब जाना,
प्रश्नों में ही तो हर उत्तर रहता है.

थोडा झुक कर रहना भी तो सीख कभी,
चौबीसों घंटे क्यो तन कर रहता है.

संघर्षो की गाथा है, पीड़ा का गान नहीं

संघर्षो की गाथा है, पीड़ा का गान नहीं
मेरी कविता मौज मनाने का समान नहीं.

मुझ में कोई खोट न हो ये कैसे सम्भव है,
लेकिन इतना अंतर है, मैं बेईमान नहीं.

फ़ुर्सत हो तो ऊपरवाले थोड़ा नीचे देख
इंसां बन कर इस जग में जीना आसान नहीं.

हैरत होती है कांटों पर सब न्यौछावर हैं,
फूलों पर दुनियावालों का कोई ध्यान नहीं.

जाने किसके सपने हैं जो शक्ल ले रहे हैं,
ये गांधी के सपनों का तो हिंदुस्तान नहीं.

दीवारों के उन घेरों को तुम घर कहते हो,
जिन में कोई खिडकी, कोई रोशनदान नहीं.

इसलिये कि सीरत ही एक सी नहीं होती 

इसलिये कि सीरत ही एक सी नहीं होती,
आग और पानी में दोस्ती नहीं होती.

आजकल चराग़ों से घर जलाये जाते हैं,
आजकल चराग़ों से रोशनी नहीं होती.

कोई चाहे जो समझे ये तो खोट है मुझमें,
मुझसे इन अँधेरों की आरती नहीं होती.

तुमको अपने बारे में क्या बताऊँ कैसा हूँ,
मेरी ख़ुद से फ़ुर्सत में बात ही नहीं होती.

कोई मेरी ग़ज़लों को आसरा नहीं देता,
सोच में अगर मेरे सादगी नहीं होती.

शायरी इबादत है, शायरी तपस्या है,
काफ़िये मिलाने से शायरी नहीं होती.

न ये तूफ़ान ही अपने कभी तेवर बदलते हैं 

न ये तूफ़ान ही अपने कभी तेवर बदलते हैं
न इनके ख़ौफ़ से अपना कभी हम घर बदलते हैं.

न मन में ख़ौफ़ शीशों के न पश्चाताप में पत्थर,
न शीशे ही बदलते हैं, न ये पत्थर बदलते हैं.

समझ में ये नहीं आता, मंज़र बदलते हैं.

अजी इन टोटकों से क्या किसी को नीद आती है,
कभी तकिया बदलते हैं, कभी चादर बदलते हैं.

रिश्ते हैं पर ठेस लगानेवाले हैं 

रिश्ते हैं पर ठेस लगानेवाले हैं,
सारे मंज़र होश उड़ानेवाले हैं.

अब क्यों माँ को भूखा सोना पड़ता है,
अब तो घर में चार कमानेवाले हैं.

इनको मुझसे हमदर्दी तो है लेकिन,
ये सब गुटखा – पान चबानेवाले हैं.

जनगणमन से इनका क्या लेना- देना,
ये तो बस जनगणमन गानेवाले हैं.

कोई इनमें मेरा साथ नहीं देगा,
सजधज कर जो आने जानेवाले हैं.

इनके जाने इस दुनिया में आग लगे,
ये क्या काम किसी के आनेवाले हैं.

हवाला इस तरह आया मेरा घर की कहानी में

हवाला इस तरह आया मेरा घर की कहानी में,
कि जैसै काँच का टुकड़ा हो पत्थर कहानी में.

बेचारी मछलियों का तो ज़रा सा ज़िक्र है, वरना,
मछेरे ही मछेरे हैं समंदर की कहानी में.

न कोई साल की चौखट, न कोई काँच की खिड़की,
महज़ कुछ बाँस के टुकड़े हैं छप्पर की कहानी में.

न चिड़ियों का कहीं कलरव न कोई भोर की लाली,
अँधेरा ही अँधेरा सिर्फ़, दिनकर की कहानी में.

में उनको याद करता हूँ तो सीना काँप जाता है,
कि इतने हादसे गुज़रे हैं पल भर की कहानी में.

कभी सोचा नहीं लेकिन यही सच लग रहा है अब,
कि पूरी वर्ण्माला एक अक्षर की कहानी में.

सभी की गाड़ियों पर, सुन रहे हैं लालबत्ती है,
बहुतसे नाम आये एक तस्कर की कहानी में.

ये सच है इक मुद्दत से मैं अंधकार में हूँ 

ये सच है इक मुद्दत से मैं अंधकार में हूँ,
सूरज निकलेगा लेकिन इस ऐतबार में हूँ.

देख सकूँ मैं पूरा सूरज घर के आँगन से,
कब से ऐसी एक सुबह के इंतज़ार में हूँ.

वैसे तो उससे मेरा सम्बंध नहीं कोई,
लेकिन उसकी हर बेचैनी हर करार में हूँ.

आज नहीं तो कल बदलेगी मेरी भी दुनिया
कैसा डर, में आज अगर ग़र्दो- गुबार में हूँ.

मेरी हर पूजा को तू क्यों ठुकरा देता है,
तेरी हस्ती के आगे मैं किस शुमार में हूँ.

न गाँधी पर भरोसा है न गौतम पर भरोसा है

न गाँधी पर भरोसा है न गौतम पर भरोसा है,
ज़माने को मगर बंदूक के दम पर भरोसा है.

तुम्हारी बात तुम जानो, मैं अपनी बात करता हूँ
मुझे अब भी अहिंसा और संयम पर भरोसा है.

ये अपनी साख पर बट्टा कभी लगने नहीं देंगे,
मुझे अपने चिनारों और झेलम पर भरोसा है.

जहाँ तक बात है इन देवताओं पर भरोसे की,
भरोसा तो मुझे भी है मगर कम पर भरोसा है.

हवा नम हो रही है पास ही होंगे कहीं बादल,
किसी को हो न हो पेड़ों को मौसम पर भरोसा है.

निगाहों का उजाला ठोकरों से कम नहीं होता

निगाहों का उजाला ठोकरों से कम नहीं होता,
बढ़े चलिए अँधेरों में ज़ियादा दम नहीं होता.

मुझे इतिहास की हर एक घटना याद है,फिर भी,
पड़ौसी पर कभी मेरा भरोसा कम नहीं होता.

भरोसा जीतना है तो ये ख़ंजर फैंकने होंगे,
किसी हथियार से अमनो-अमाँ कायम नहीं होता.

परिंदों की नज़र में पेड़ केवल पेड़ होते हैं,
कोई पीपल, कोई बरगद,कोई शीशम नहीं होता.

नहीं होता मनुष्यों की तरह कोमल हृदय कोई,
मनुष्यों की तरह कोई कहीं निर्मम नहीं होता.

मेरे भारत की मिट्टी में ही कोई बात है वरना,
कोई गाँधी नहीं होता, कोई गौतम नहीं होता.

न जाने क्या गुज़रती होगी उसके दिल पे ऐसे में,
वो रोता भी है, दामन उसका लेकिन नम नहीं होता.

किसी के दर्द का जब तक कोई हिस्सा नहीं बनता

किसी के दर्द का जब तक कोई हिस्सा नहीं बनता,
कभी विश्वास का तब तक कहीं रिशता नहीं बनता.

अगर इंसान का दिल भी दरख़्तों की तरह होता,
परिंदों के लिए शायद कोई पिजरा नहीं बनता.

चमक तो एक दिन आजाएगी पत्थर में,घिसने से,
मगर इस इल्म से पत्थर कभी शीशा नहीं बनता.

किसी तरतीव से ही शक़्ल मिलती है लक़ीरोंको,
लक़ीरें खींच देने से कोई नक़्शा नहीं बनता.

अगर संकल्प मन में हो तो जंगल क्या है दलदल क्या,
बिना संकल्प के कोई नया रस्ता नहीं बनता.

न तुम बेज़ार होते हो, न हम बेज़ार होते हैं 

न तुम बेज़ार होते हो, न हम बेज़ार होते हैं,
बड़ी मुश्किल से लेकिन हम कभी दो चार होते हैं.

पहुँचते ही नहीं है हम कभी नज़दीक फूलों के,
हमारे सोच की तासीर में जब ख़ार होते हैं.

बना लेते हैं चारों ओर अपने एक हम घेरा,
फ़सीलें सात फुट की तीन फुट के तार होते हैं.

तुम्हें हम बख़्श देते हैं कि शायद तुम संभाल जाओ,
ज़माना ये समझता है कि हम लाचार होते हैं.

अमीरों की किसी बस्ती में क्यों लपटें नहीं उठतीं,
हमारे साथ ही क्यों हादसे हरबार होते हैं.

मुहब्बत हो,अदावत हो, इबादत हो, तिजारत हो,
रियायत अब नहीं होती है खुलके वार होते हैं.

पुरानी हेडलाइन की बदल जाती हैं तारीखें,
वही गुंडों के अफ़साने, वही अख़बार होते हैं.

वो जलसे हों सियासत के, कि बारातें दबंगों की,
तमाशे रोज़ ही अब तो सरे बाज़ार होते हैं.

छुपा लेते हैं अपने राज़ नक़ली मुस्कराहट में,
कहाँ दिल खोलने को लोग अब तैयार होते हैं.

जो बादल आसमाँ के थे नदी के हो नहीं पाए

जो बादल आसमाँ के थे नदी के हो नहीं पाए,
तुम्हारे बाद जैसे हम किसी के हो नहीं पाए.

हमारा आख़िरी मक़सद अँधेरों से उलझना था,
कभी हम इसलिए भी रौशनी के हो नहीं हो पाए.

ग़मों के साथ कुछ रिश्ता ही उनका इस तरह का था,
मेरे आँसू पलट के फिर ख़ुशी के हो नहीं पाए.

बना के रख नहीं पाए बहुत दिन ज़िंदगी से हम ,
रहे तो साथ लेकिन ज़िंदगी के हो नहीं पाए.

किसी की दुश्मनी भी फिर उन्हें क्या रास आनी थी,
कि दिल से जो किसी की दोस्ती के हो नहीं पाए.

कभी लफ़्ज़ों ने बहकाया, कभी छंदों ने भरमाया,
सभी एहसास दिल के शायरी के हो नहीं पाए.

सुदर्शन चक्र उनके हाथ में इक बार जब आया,
कभी फिर नन्द नन्दन बाँसुरी के हो नहीं पाए,

अगर हम फायदे नुकसान को ही तोलते रहते 

अगर हम फायदे नुकसान को ही तोलते रहते,
तो क्या बेख़ौफ़ होकर इस तरह सच बोलते रहते.

यही मक़सद रहा होता, हमें पैसा कमाना है,
कहीं भी बैठ कर लफ़्ज़ों में शक्कर घोलते रहते.

हमारे सोच में इंसानियत गर मर गयी होती,
तुम्हारे नाम का बिल्ला लगा कर डोलते रहते.

क़लम का साथ हमको मिल गया तो बच गए वरना,
हमेशा पत्थरों से आइनों को तोलते रहते.

किसी के सोच पर इतना अँधेरा जम नहीं पाता,
अगर हम लोग रौशनदान जब तब खोलते रहते.

जमाने की तरह होते तो पत्थर दिल न हो जाते

जमाने की तरह होते तो पत्थर दिल न हो जाते,
हमारे नाम पर भी कारख़ाने, मिल न हो जाते.

किसी को बेच दी होती अगर हमने भी खुद्दारी,
वजीफे और मैडल हमको भी हासिल न हो जाते.

उन्हें हम हौसला देते, जिन्हें बेसाखियाँ दे दीं,
हमारे साथ वो भी दौड़ के क़ाबिल न हो जाते.

अगर हमदर्द ही होते, तो पत्थर फेंकते ही क्यूँ,
मेरे दुख दर्द में चुपचाप तुम शामिल न हो जाते.

अगर थोड़ा बहुत अपने लिए भी सोच लेते हम
तो अपनों की नज़र में इस क़दर बोझिल न हो जाते,

किनारे पर खड़े होकर तमाशा देखने वालो,
मेरी उम्मीद से जुड़ते तो तुम साहिल न हो जाते.

बड़ों ने बीन कर फेंके हमारी राह से पत्थर,
सफ़र वरना हमारे और भी मुश्किल न हो जाते.

जब एक दीपक जल जाता है

जब एक दीपक जल जाता है,
सोच में सूरज ढल जाता है.

खुश रहते हैं हम थोड़े में,
काम हमारा चल जाता है,

झुक कर चलने वाला जग में,
कैसा भी हो पल जाता है.

जिसमें होती है खुदगर्ज़ी,
कोई भी हो खल जाता है.

दिल से जब देता है कोई,
हर एक आशिष फल जाता है.

भर आती हैं उस पल आँखें,
जब कोई पल टल जाता है.

रह जाते है असली सिक्के,
खोटा सिक्का चल जाता है.

जल जाती है लेकिन इससे,
क्या रस्सी का बल जाता है.

जीना होता है जिसको भी,
एक साँचे में ढल जाता है.

भला अपने कटोरे की मलाई कौन देता है

भला अपने कटोरे की मलाई कौन देता है,
किसी मज़लूम के हक़ में गवाही कौन देता है.

वो तब की बात थी जब लोग प्याऊ भी लगाते थे,
मगर प्यासे को अब अपनी सुराही कौन देता है.

दुआओं के भरोसे छोड़ देते हैं बुज़ुर्गों को,
ग़रीबों के मोहल्ले में दवाई कौन देता है.

सभी ईमेल, मेसेज भेज देते हैं मोबाइल पर,
मेरे घर आके मुझको अब बधाई कौन देता है.

मुझे दो पल अकेले चैन से रहने नहीं देता,
मेरे एहसास को ये बेकरारी कौन देता है.

जला देता है सूरज को सवेरे, कौन है आख़िर,
हर इक दरिया के पानी को रवानी कौन देता है.

ये दुनिया सिर झुकाती है अजी अब भी लुटोरों को,
किसी ईमानवाले को सलामी कौन देता है.

हमदर्द मेरे हर मौके पर, वादों को निभाना भूल गए

हमदर्द मेरे हर मौके पर, वादों को निभाना भूल गए,
दुनिया के फ़साने याद रहे, मेरा ही फ़साना भूल गए.

हर एक शहादत भूल गए सुखदेव, भगत सिंह बिस्मिल की,
हम साठ बरस के भीतर ही, गांधी का ज़माना भूल गए.

क्या याद नहीं आता है किसी को जलियाँवाला बाग कभी,
हर टीस पुरानी भूल गए, हर जख्म पुराना भूल गए.

कुछ बेच रहे हैं ज़ात पात, कुछ मंदिर मस्जिद गुरद्वारे,
सब अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास जताना भूल गए.

ये बीफ मटन की चिनगारी, ये आरक्षण के दांव पेच,
लगता है जैसे बादल भी अब आग बुझाना भूल गए.

क्या सोच था लोगों का लेकिन ये माली बाग बगीचों के,
खारों की हिमायत करते रहे, फूलों को बचाना भूल गए.

ईमान के पथ पे चल कर ही हर मंज़िल हासिल होती है,
हर पाठ पढ़ाया गुरुओं ने, यह पाठ पढ़ाना भूल गए.

जो कसम उठा कर आए थे, हर घर को रौशन कर देंगे,
ये पैरोकार उजालों के क्यों दीप जलाना भूल गए।

कुछ लोग तरसते हैं अब भी रोटी के निवलों के खातिर,
महलों की सियासत में लीडर मुफलिस का ठिकाना भूल गए.

किस मोड पे आके दुनिया की तहज़ीब न जाने ठहर गई,
बस खून बहाना सीख लिया , हम अश्क बहाना भूल गए.

भूल जाने कहाँ कौन सी हो गई

भूल जाने कहाँ कौन सी हो गई,
एक मैदान सी हर नदी हो गई.

वो ही मंज़र निगाहों में ठहरे हुए,
देखते देखते ज़िंदगी हो गई.

दूर जाकर खड़ी हो गई एक दिन,
मुझसे छाया मेरी जब बड़ी हो गई.

हम अलग हो गए हैं पता तब चला,
एक दीवार सी जब खड़ी हो गई.

चाय का एक कप याद आया बहुत,
धूप थोड़ी सी जब गुनगुनी हो गयी.

मेरा बेटा मेरा आइना हो गया.
बेटी हाथों की मेरी छड़ी हो गई.

हौसला मेरा जीने का बढ़ता गया,
जब ग़मों से मेरी दोस्ती हो गई.

वो चला ही गया उसको जाना ही था,
मेरी बेजान सी हर खुशी हो गई.

कृष्ण बेजान क्यों है सुदर्शन तेरा,
और ख़ामोश क्यों बाँसुरी हो गई.

रथ उजालो का जाने कहाँ रह गया,
किस अँधेरे में गुम रौशनी हो गई.

अगर ख़ामोश रह कर अश्क पीना आ गया होता

अगर ख़ामोश रह कर अश्क पीना आ गया होता,
तुम्हें भी सर उठा कर आज जीना आ गया होता.

उलझने में अगर तूफ़ान से देरी न की होती,
किनारे पर तुम्हारा भी सफ़ीना आ गया होता.

निडर हो कर जो अपनी राह पर चलते चले जाते,
तुम्हारी हर मुसीबत को पसीना आ गया होता.

अगर तुम छोड़ देते ख़्वाहिशों की जी हज़ूरी तो,
उसूलों से निभाने का करीना आ गया होता.

कसक को भूल जाते दर्द को मरहम बना लेते.
तुम्हें हर ज़ख़्म अपने आप सीना आ गया होता.

हमें भी क्या ज़रूरत थी कि हर पत्थर परखते हम,
निगाहों में अगर कोई नगीना आ गया होता.

इक तरफ जलता दिया था और उजाlले की सदा थी

इक तरफ जलता दिया था और उजाlले की सदा थी,
इक तरफ आँधी के तेवर, इक तरफ़ मेरी दुआ थी.

उड़ गये आकाश में सब और लौटे ही नहीं फिर,
हर परिंदे को पता था, क्या दरख़्तों की व्यथा थी.

हम अड़े थे अपनी ज़िद पर आदमी बन कर जिएंगे,
उस अहाते में कि जिसकी ईंट हर एक देवता थी.

हमने लेकिन ठीक ये समझा उसूलों से निभाएं,
जानते हम भी थे हमसे किस लिए दुनिया ख़फा थी.

हो गये दुश्मन हमारे जिनकी चाहत थी तिज़ारत,
हम उन्हें समझा रहे थे, बस हमारी ये ख़ता थी.

ये तो मुमकिन ही नहीं था, हम वहाँ से लौट जाते,
इक तरफ मजबूरियाँ थीं इक तरफ उसकी वफ़ा थी.

किसको फुर्सत थी कि कोई झाँकता दिल में किसी के,
ये जो दुनिया है शुरू से सिर्फ सिक्कों पर फ़िदा थी.

वो समय वो ज़माना रहा ही नहीं 

वो समय वो ज़माना रहा ही नहीं,
सच कहा तो किसी ने सुना ही नहीं.

बात ये है हमें क्या मिला अंत में,
हम ने ये कब कहा, कुछ हुआ ही नहीं.

एक रंगीन नक्शों की फाइल तो है,
सिलसला इस के आगे बढ़ा ही नहीं.

खोट चाहत में था या कि तक़दीर में,
जिसको चाहा कभी वो मिला ही नहीं.

ढूंढ्ते ही रहे देवताओं को हम,
कोई पत्थर नज़र में चढ़ा ही नहीं.

कोई इनआम मिलता कहाँ से मुझे,
उनके दरबार में मैं गया ही नहीं.

एक शाइर सुना भूख से मर गया,
इस ख़बर को किसी ने पढ़ा ही नहीं.

कुछ पता तो चले क्यों है नाराज़ वो,
उसने मुझसे कभी कुछ कहा ही नहीं.

ये तो है कि घर को हम बचा नहीं सके

ये तो है कि घर को हम बचा नहीं सके,
चक्रवात पर हमें झुका नहीं सके.

ये भी है की मंज़िलें कभी नहीं मिलीं,
रास्ते मगर हमें थका नहीं सके.

हम किसी की ओट में नहीं थे पर हमें,
आँधियों के सिलसिले बुझा नहीं सके.

देखिए गुलाब की तरफ भी एक बार,
फूल क्या जो ख़ार से निभा नहीं सके.

अंधकार के हज़ार संगठन कभी,
रौशनी के वंश को मिटा नहीं सके.

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