शेर सिंह नाज़ ‘देहलवी’ की रचनाएँ

बातों में ढूँढते हैं वो पहलू मलाल का

बातों में ढूँढते हैं वो पहलू मलाल का
मतलब ये है कि ज़िक्र न आए विसाल का

क्या ज़िक्र उन से कीजिए दिल के मलाल का
है ख़ामुशी जवाब मिरे हर सवाल का

ता उम्र फिर न तालिब-ए-जलवा हुए कलीम
देखा जो एक बार करिश्मा जमाल का

रूख़ पर पड़ी हुई है नक़ाब-ए-शुआ-ए-हुस्न
मौक़ा नज़र को ख़ाक मिले देख भाल का

हम ना मुराद ए इश्क़ वो हिज्राँ नसीब हैं
देखा न हम ने मुँह कभी शाम ए विसाल का

बूद ओ न बूद कहते हैं अहल-ए-जहाँ जिसे
अदना सा शोबदा है तिलिस्म-ए-ख़याल का

दम-ए-अख़ीर भी हम ने ज़बाँ से कुछ न कहा 

दम-ए-अख़ीर भी हम ने ज़बाँ से कुछ न कहा
जहाँ से उठ गए अहल-ए-जहाँ से कुछ न कहा

चली तो कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ तो चलने दी
रूकी तो कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ से कुछ न कहा

ख़ता-ए-इश्क़ की इतनी सज़ा ही काफ़ी थी
बदल के रह गए तेवर ज़बाँ से कुछ न कहा

बला से ख़ाक हुआ जल के आशियाँ अपना
तड़प के रह गए बर्क़-ए-तपाँ से कुछ न कहा

गिला किया न कभी उन से बे-वफ़ाई का
ज़बाँ थी लाख दहन में ज़बाँ से कुछ न कहा

ख़ुशी से रंज सहे ‘नाज़’ उम्र भर हम ने
ख़ुदा-गवाह कभी आसमाँ से कुछ न कहा

दिल दिया है हम ने भी वो माह-ए-कामिल देख कर

दिल दिया है हम ने भी वो माह-ए-कामिल देख कर
ज़र्द हो जाती है जिस को शम-ए-महफिल देख कर

तेरे आरिज़ पे ये नुक़्ता भी है कितना इंतिख़ाब
हो गया रौशन तिरे रूख़्सार का तिल देख कर

क़त्ल करना बे-गुनाहों का कोई आसान है
ख़ुश्क क़ातिल का लहू है ख़ून-ए-बिस्मिल देख कर

बल्ल्यिों फ़र्त-ए-मसर्रत से उछल जाता है दिल
बहर-ए-ग़म में दूर से दामान-ए-साहिल देख कर

आईने ने कर दिया यकताई का दावा ग़लत
नक़्श-ए-हैरत गए अपना मुक़ाबिल देख कर

देख तो लें दिल में तेरे घर भी कर सकते हैं हम
दिल तो हम देंगे तुझे लेकिन तिरा दिल देख कर

देखिए राह-ए-अदम में और पेश आता है क्या
होश पर्रां हो रहे हैं पहली मंज़िल देख कर

आरज़ू-ए-हूर क्या हो ‘नाज़’ दिल दे कर उन्हें
शम्अ पर क्या आँख डालें माह-ए-कामिल देख कर

हिजाब-ए-राज़ फ़ैज़-ए-मुर्शिद-ए-कामिल से उठता है 

हिजाब-ए-राज़ फ़ैज़-ए-मुर्शिद-ए-कामिल से उठता है
नज़र हक़-आश्ना होती है पर्दा दिल से उठता है

जला जाता हूँ बार-ए-सोज़-ए-ग़म मुश्किल से उठता है
वो अश्कों से नहीं बुझता जो शोला दिल से उठता है

कहाँ ख़ंजर भी दस्त-ए-नावक-ए-क़ातिल से उठता है
नज़ाकत से हिना का बार भी मुश्किल से उठता है

से किस ने डाल दी बहर-ए-तलातुम-ख़ेज़ में कश्ती
ये शोर-ए-हर्चे-बादा-बाद क्यूँ साहिल से उठता है

कशीदा जिस से तुम होते हो कोई रूख़ नहीं करता
गिराते हो नज़र से तुम जिसे मुश्किल से उठता है

ये आँसू कस्म-पुर्सी किस के मातम में बहाती है
जनाज़ा आज किस का कूचा-ए-क़ातिल से उठता है

मगर तासीर पैदा हो गई मजनूँ के नालों में
कि पर्दा आज दस्त-ए-लैला-ए-महमिल से उठता है

रूख़-ए-बे-पर्दा उन का याद आता है शब-ए-हिज्राँ
हिजाब-ए-अब्र जब रू-ए-मह-ए-कामिल से उठता है

लगा दी आतिश-ए-ख़ामोश क्या सोज़-ए-मोहब्बत ने
इलाही ख़ैर दूद-ए-आह-ए-सोज़ाँ दिल से उठता है

किया शर्मिन्दा इतना सख़्त-जानी ने नज़ाकत से
ख़जालत से सर उन के सामने मुश्किल से उठता है

कलेजा थाम लें दीदार-ए-जानाँ देखने वाले
बस अब पर्दा रूख़-ए-रश्क-ए-मह-ए-कामिल से उठता है

चले अहबाब आग़ोश-ए-लहद में छोड़ कर मुझ को
कि हम-दर्दी का जज़्बा पहली ही मंज़िल से उठता है

कसरत-ए-वहदानियत में हुस्न की तनवीर देख 

कसरत-ए-वहदानियत में हुस्न की तनवीर देख
दीदा-ए-हक़-बीं से रंग-ए-आलम-ए-तस्वीर देख

इस क़दर खिंचना नहीं अच्छा बुत-ए-बे-पीर देख
प्यार की नज़रों से सू-ए-आशिक़-ए-दिल-गीर देख

ग़ैर ने मुझ पर सितम ढाए हैं ढाले आज तू
रह न जाए कोई भी तरकश में बाक़ी तीर देख

काम बन बन कर बिगड़ जाते हैं लाखों रात दिन
किस क़दर है मुझ से बर्गश्ता मिरी तक़दीर देख

फिर न ये कहना कि ख़त लिखा है किस ने ग़ैर को
ले ये है मौजूद तेरे हाथ की तहरीर देख

हारना हिम्मत दलील-ए-कामयबाी से है दूर
काम ले तदबीर से फिर ख़ूबी-ए-तक़दीर देख

गुम्बद-ए-गर्दों सँभल ऐ गुम्बद-ए-गर्दों सँभल
कर न दे सद पाश तीर-ए-आह पर तासीर देख

चार दिन की ज़िंदगी पर मुश्त-ए-ख़ाक इतना ग़ुरूर
पीस देगा एक दिन ये आसमान-ए-पीर देख

बे-बुलाए तो नहीं आया तिरी महफ़िल में ‘नाज़’
देख हाँ हाँ देख अपने हाथ की तहरीर देख

कुछ इशारे वो सर-ए-बज़्म जो कर जाते हैं 

कुछ इशारे वो सर-ए-बज़्म जो कर जाते हैं
नावक-ए-नाज़ कलेजे में उतर जाते हैं

अहल-ए-दिल राह-ए-अदम से भी गुज़र जाते हैं
नाम-लेवा तिरे बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर जाते हैं

सफ़र-ए-ज़ीस्त हुआ ख़त्म न सोचा लेकिन
हम को जाना है कहाँ और किधर जाते हैं

निगह-ए-लुत्फ़ में है उक़दा-कुशाई मुज़मर
काम बिगड़े हुए बंदों के सँवर जाते हैं

क़ाबिल-ए-दीद है महशर में ख़जालत उन की
दो क़दम चलते हैं रूकते हैं ठहर जाते हैं

ख़ूब बद-नाम किया अपनी सियह-कारी ने
उँगलियाँ उठती हैं महशर में जिधर जाते हैं

आँख खुल जाती है चौंक उठते हैं सोने वाले
वो दबे पाँव जो तुर्बत से गुज़र जाते हैं

चारागर हाजत-ए-मरहम नहीं उन को असलन
ज़ख़्म-ए-दिल लज़्ज़त-ए-ईसार से भर जाते हैं

आह-ए-सोज़ाँ से जो निकले थे सितारे शब-ए-ग़म
बन के तारे वही गर्दूं पे बिखर जाते हैं

आज तक लौट कर आया न जहाँ से कोई
हम-सफ़ीरान-ए-जहाँ हम भी उधर जाते हैं

बहर-ए-ग़म में वही फँसते हैं जो होते हैं गिराँ
जो सुबुक होते हैं वो पार उतर जाते हैं

कुश्त-ए-नाज़ तिरा क्यूँ न ज़मीं पर लोटे
दाग़-ए-दिल जितने हैं इस तरह वो भर जाते हैं

क्या ख़बर थी कोई रूसवा-ए-जहाँ हो जाएगा

क्या ख़बर थी कोई रूसवा-ए-जहाँ हो जाएगा
कुछ न कहना भी मिरा हुस्न-ए-बयाँ हो जाएगा

अपने दीवाने का तुम जोश-ए-जुनूँ बढ़ने तो दो
आस्तीं दामन गिरेबाँ धज्जियाँ हो जाएगा

आशिक़-ए-जाँ-बाज़ हैं हम मुँह ने मोड़ेंगे कभी
तुम कमाँ से तीर छोड़ो इम्तिहाँ हो जाएगा

टूटी फूटी क़ब्र भी कर दो बराबर शौक़ से
ये भी अपनी बे-निशानी का निशाँ हो जाएगा

शादयाने बज रहे हैं आज जिस जा ‘नाज़’ कल
दम ज़दन में देख लेना क्या समाँ हो जाएगा

क़ुल्ज़ुम-ए-उल्फ़त में तो तूफ़ान का आलम हुआ 

क़ुल्ज़ुम-ए-उल्फ़त में तो तूफ़ान का आलम हुआ
जो सफ़ीना दिल का था दरहम हुआ बरहम हुआ

थामना मुश्किल दिल-ए-मुज़्तर को शाम-ए-ग़म हुआ
याद आते ही किसी की हश्र का आलम हुआ

क्या बताएँ किस तरह गुज़री शब-ए-वादा मिरी
मुंतज़िर आँखें रहीं दिल का अजब आलम हुआ

देखते रहते हैं इस में सारे आलम का ज़ुहूर
आईना दिल का हमारे रश्क-ए-जाम-ए-जम हुआ

वो अदू को साथ लाए हैं मिरे घर देखिए
शर्बत-ए-दीदार के नुस्ख़े में दाख़िल सम हुआ

आप के तीर-ए-नज़र से दिल का बचना है मुहाल
जिस को देखा आँख भर कर बस वही हम-दम हुआ

कि क़दर तस्कीन रंजूर-ए-मोहब्बत को हुई
प्यार से देखा जो उस ने ज़ख़्म को मरहम हुआ

जब उठाया यार ने रू-ए-मुनव्वर से नक़ाब
गिर पड़ा ग़श खा के कोई और कोई बे-दम हुआ

गुलशन-ए-हस्ती में इंसाँ की नहीं कुछ ज़िंदगी
जो हुआ पैदा मिसाल-ए-क़तर-ए-शबनम हुआ

गेसू-ए-पुर-ख़म हुए उन के परेशाँ सोग में
मेरे मरने से दयार-ए-हुस्न में मातम हुआ

बाद मरने के हुआ दुनिया में यूँ मशहूर ‘नाज़’
शान से ताबूत उठा धूम का मातम हुआ

शब-ए-फ़िराक़ जो दिल में ख़याल-ए-यार रहा

शब-ए-फ़िराक़ जो दिल में ख़याल-ए-यार रहा
पस-ए-फ़ना भी तसव्वुर में इंतिज़ार रहा

उड़ा रहे हैं मिरी ख़ाक को वो ठोकर से
इलाही मुझ से तो अच्छा मिरा ग़ुबार रहा

नज़र मिलाते ही हाथों से दिल चला मेरा
किसी को देख के दिल पर न इख़्तियार रहा

किसी की नर्गिस-ए-मस्ताना फिर गई जब से
न वो सुरूर न आँखों में वो ख़ुमार रहा

शब-ए-फ़िराक़ की तन्हाई में था कौन अनीस
ख़याल-ए-यार ही इक अपना ग़म-गुसार रहा

वफ़ा नहीं तो नहीं मूरिद-ए-ज़फा ही सही
हज़ार शुक्र कि मैं दाख़िल-ए-शुमार रहा

ये डोरे डाले हैं किस चश्म-ए-मस्त ने ऐ ‘नाज़’
कि हश्र तक मिरी आँखों में इक ख़ुमार रहा

वो हद से दूर होते जा रहे हैं

वो हद से दूर होते जा रहे हैं
बड़े मग़रूर होते जा रहे हैं

बसे हैं जब से वो मेरी नज़र में
सरापा नूर होते जा रहे हैं

जो फूटे आबले दिल की ख़लिश से
वो अब नासूर होते जा रहे हैं

बहुत मुश्किल है मंज़िल तक रसाई
वो कोसों दूर होते जा रहे ळैं

कहाँ पहली सी राह-ओ-रस्म-ए-उल्फ़त
नए दस्तूर होते जा रहे ळैं

हमारे दाग़-ए-दिल राह-ए-तलब में
चराग़-ए-तूर होते जा रहे हैं

ख़ुदा-हाफ़िज़ है अब बादा-कशों का
नशे में चूर होते जा रहे हैं

पिला दे साक़िया बाद-कशों को
नशे काफ़ूर होते जा रहे हैं

क़रीब-ए-दिल वो क्या ऐ ‘नाज़’ आए
नज़र से दूर होते जा रहे हैं

वो जब तक अंजुमन में जलवा फ़रमाने नहीं आते 

वो जब तक अंजुमन में जलवा फ़रमाने नहीं आते
सुराही रक़्स में गर्दिश में पैमाने नहीं आते

शरीक-ए-दर्द बन कर अपने बेगाने नहीं आते
मय-ए-इशरत जो पीते हैं वो ग़म खाने नहीं आते

लिपट कर शम्अ की लौ से लगी दिल की बुझातें हैं
पराई आग में जलने को परवाने नहीं अतो

उड़ाते ही फिरेंगे उम्र भर वो ख़ाक सहरा की
तिरी ज़ुल्फ़ों के साए में जो दीवाने नहीं आते

जो अपनी आन पर ऐ ‘नाज़’ अपनी जान देते थे
ज़माने में नज़र अब ऐसे दीवाने नहीं आते

वो झंकार पैदा है तार-ए-नफ़स में

वो झंकार पैदा है तार-ए-नफ़स में
कि है नग़मा नग़मा मिरी दस्तरस में

तसव्वुर बहारों में डूबा हुआ है
चमन का मज़ा मिल रहा है क़फ़स में

गुलों में ये सरगोशियाँ किस लिए हैं
अभी और रहना पड़ेगा क़फ़स में

न जीना है जीना न मरना है मरना
निराली हैं सब से मोहब्बत की रस्में

न देखी कभी हम ने गुलशन की सूरत
तरसते रहे ज़िंदगी भर क़फ़स में

कहो ख़्वाह कुछ भी मगर सच तो ये है
जो होते हैं झूठे वो खाते हैं क़समें

मैं होने को यूँ तो रिहा हो गया हूँ
मिरी रूह अब तक है लेकिन क़फ़स में

न गिरता मैं ऐ ‘नाज़’ उन की नज़र से
दिल अपना ये कम-बख़्त होता जो बस में

ज़िंदगी नाम है जिस चीज़ का क्या होती है

ज़िंदगी नाम है जिस चीज़ का क्या होती है
चलती फिरती ये ज़माने की हवा होती है

सैर दुनिया की न कुछ याद-ए-ख़ुदा होती है
उम्र इन्हीं झगड़ों में ताराज-ए-फ़ना होती है

रूह जब क़ालिब-ए-ख़ाकी से जुदा होती है
किस को मालूम कहाँ जाती है क्या होती है

फ़िक्र-ए-दुनिया से सिवा हो जिस उक़्बा का ख़याल
वो तबीअत ही ज़माने से जुदा होती है

दिल-ए-पुर-ग़म अभी बन जाए दवा-ए-तस्कीन
वो नज़र डाल जो मानूस-ए-वफ़ा होती है

सादिकुल-क़ौल की पहचान यही है ऐ ‘नाज़’
दिल में डर होता है आँखों में हया होती है

ज़ुल्फ़-ए-जानाँ पे तबीअत मिरी लहराई है 

ज़ुल्फ़-ए-जानाँ पे तबीअत मिरी लहराई है
साँप के मुँह में मुझे मेरी क़ज़ा लाई है

आज मय-ख़ाने पे घंघोर घटा छाई है
एक दुनिया है कि पीने को उमड़ आई है

ज़ुल्फ़-ए-शब-रंग का है अक्स ये पैमाने में
या परी कोई ये शीशे में उतर आई है

तू बता नावक-ए-जानाँ तिरी क्या है नीयत
ख़ंजर-ए-यार ने तो सर की क़सम खाई है

हूर ओ ग़िल्माँ मिरी आँखों में समाँए क्यूँ कर
किस में तेरी सी अदा तेरी सी रानाई है

कुछ मुदावा न हुआ तुम से मरीज़-ए-ग़म का
क्या इसी बरते पे दावा-ए-मसीहाई है

सुर्ख़ी-ए-ख़ून-ए-शाहीदाँ की झलक है इस में
दस्त-ए-क़ातिल पे ग़ज़ब रंग हिना लाई है

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