संध्या पेडणेकर की रचनाएँ

रिश्ते

स्नेह नहीं
शुष्क काम है
लपलप वासना है
क्षणभंगुर
क्षण के बाद रीतनेवाली
मतलब से जीतनेवाली
रिश्तेदारी है
खाली घड़े हैं
अनंत पड़े हैं
उनके अन्दर व्याप्त अन्धकार
उथला है पर
पार नहीं पा सकते उससे
अन्धकार से परे कुछ नहीं
उजास एक आभास है
क्षितिज कोई नहीं
केवल
आकाश ही आकाश है

सड़क और जूतियाँ

कमसिन कम्मो ने
बुढाती निम्मो के गले में
बाँहें डाल कहा,
‘आख़िर…..
उसने मुझे रख ही लिया!!!’

झटके से उसे अपने से
अलग कर निम्मो बोली,
‘मुए को रसभरी ककड़ी
मुफ्त की मिली….’

कम्मो की सपनीली आँखों ने कहा,
‘मैं उससे प्रेम करती हूँ…. और…
मेरा प्रेम प्रतिदान नहीं माँगता…’

निम्मो बोली, ‘सही है लेकिन,
दुनिया तो तुझे रांड ही कहेगी,
तू कभी उसकी बीवी नहीं बनेगी
घर में उसके आगे बीवी बिछेगी
बाहर उसे तू पलकों पर रखेगी

दो जूतियाँ पैरों में चढ़ा कर
वह सीना तान कर
नई सड़क को कुचलने के लिए
आजाद है!’

महानगरों के अजनबी

एक छत के नीचे रहते हैं
और एक दूसरे से अपरिचित
अजनबियत की बुनियाद पर बनी
रिश्तों की इमारत
बहार से भव्य, सुन्दर, जगमग
अन्दर से दर ओ दीवार उतने ही सुंदर
लेकिन इनमें हक़ की आत्मा नहीं है
लोग यहाँ अपनों से भी
तकल्लुफ से पेश आते हैं
बाहरवालों से लेकिन
बेतकल्लुफी का स्वांग रचाते हैं

यहाँ के सुख निजी हैं
दुःख भी निजी हैं
हंसी निजी है और ख़ुशी भी
आश्चर्य निजी है और हताशा भी निजी है
डर यहाँ निजी हैं और
डर से नजात पाने के तरीके भी निजी हैं
साझा यहाँ सिर्फ शरीर सम्बन्ध हैं
मजबूरी के
कुदरत ने ही यह व्यवस्था की है
वरना
इस मामले में भी निजीपन को वरीयता देना
शहरी अजनबियत को भाता है
बच्चे साझा हैं पर जिम्मेदारी निजी है
बड़े होने के बाद बच्चे भी अजनबी हैं
राह निजी है, सफ़र निजी है और मंझिल भी निजी है.

और कुछ जरूरतें हैं, साझा
खाना, नहाना, नित्य कर्म से निबटना
इनके लिए सहूलियत की जगह हो इसलिए
घर हैं
पर घर भी चूंकि मिल्कियत है
उसमें साझेदारी नहीं होती
वह नातों में होती है, और शहर
नातों-रिश्तों के लिए अजनबी है.

यहाँ कि जमीन, जमीन पर बने मकान, मकान कि चाट
यहाँ तक कि उनके ऊपर घिरा आसमान भी
टुकड़ों में बँटा है निजीपन के
अपने अपने टुकड़ों में सिमटकर पलते जीन
एक दूसरे से हैं अजनबी

यहाँ के बच्चे माँ-बाप को तकलीफ में नहीं डाल सकते
माँ-बाप बच्चों से उम्मीद नहीं रख सकते
सबकी अपनी अपनी राह है
अपनी अपनी मंजिलें हैं
जो छूट जाए वह अपनी जाने
आगे बढ़ने का ज़माना है!!!

एकात्मा

एक से घटा एक
तो बताइए
बचा क्या?

शून्य?

गलत!

सही जवाब है..
एक।

दो जीव मिलकर
जब एक हो जाते हैं
वज़ह कोई भी क्यों न हो,
एक जब हट जाता है, तो
एक तो बचता ही है!!

स्त्रियश्चारित्रम

अस्सी वर्ष की दादी के चरित्र पर
नब्बे वर्ष के दादा ने उंगली उठायी
और
दादी का चरित्र
सबकी शंकित नजरों पर
बलि चढ़ गया

दादी आज भी जीवित हैं
दादा उसके ही हाथ की रोटी तोड़ते हैं
लेकिन बेटे-बहु नाती-पोते दादी को अब
हिकारत की निगाह से देखते हैं
और
पास पड़ोसवालों ने उसे
खिताब बहाल किया है – कुलटा का!

झल्ला कर उसने कहा
इसी खिताब का तकिया लगा कर
मुझे चिता पर चढ़ा देना
हिसाब मेरा ऊपर ही होगा
मुआवजे के तौर पर
अगला जनम मेरा
स्त्री का नहीं होगा

अस्मिता

उसकी बातों में
अनुभव से अधिक
उपदेश है
खुलेपन से ज़्यादा
बनावटीपन है
एक दिन किसी ने कहा

छलछला आई उसकी आँखें सुन कर

कहनेवाले को लगा
आँसुओं के साथ उसका
कोरा उपदेश बह गया
उसका बनावटीपन झर गया
लेकिन आश्चर्य!
उसके नीचे वह थी ही नहीं
एक घडी थी
एक चूल्हा था
परात और बेलन था
छुरी और दरांती थी
सुई-धागा था
झाड़ू था
सीले-सिकुड़े कपड़ों का ढेर था
बाज़ार की थैली थी
अनाज का डिब्बा था
नोन-मिर्च के साथ
बच्चों के स्कूल का हिसाब था
कापियां थीं, पेंसिलें थीं
तहाई हुई, साफ़ धुली चद्दरें थीं
प्रेस किए हुए कपड़ों का ढेर था

गिनती पूरी नहीं हुई थी कहने वाले की
असलियत उस पर खुल गई थी
फिर भी
जबान उद्दंडता से
उसकी पहचान ढूँढ रही थी

और अचानक वह कौंधी
उसकी आँखें चकाचक करते हुए

उसकी असली मुस्कान चौंधियाती हुई
कहनेवाले के दिल तक उतर आई
और वह
उसकी असलियत को नकार न सका

केवल पश्चाताप 

किए हुए पापों का
अनजानी ग़लतियों का
दूसरों से खाए धोखों का
ख़ुद खाई चोटों का
कहे हुए शब्दों के लिए
अनकहे शब्दों के लिए
झुकी आँखों का
उठे हाथों का
लरज़ी जबान का
घुटी साँसों का
अंत में है
केवल पश्चाताप!

सूरज की रश्मियों से
होड़ न ले पाने का
सहस्त्रबाहु से
तुलना किए जाने का
चाँद की कलाओं को
मात न दे पाने का
चाँदनी की शीतलता को
जज्ब न कर पाने का
लू चलाती गर्मी में
झुलस झुलस जाने का
शैशव को खोने का
जवानी की फिसलन का
प्रौढ़ झुर्रियों का
बुढ़ापे की लाठियों के
टूट टूट जाने का
बालों की कालिख में
सफेदी के झांकने का
उजले चरित्र पर
कालिख़ के पुतने का
पड़ोस की गुडिया पर
जवानी चढने का
गठिया की गोली
दिन-रात निगलने का
उभारों को टटोलती
चोर-निगाहों का
हुलसे क्षणों का
फिसले पलों का
भरपूर पाकर भी
कटोरी छूटने का
घिसी साडी में
जर्जर देह का
डपट खाकर
दाँत निपोरने का
आशाएँ जगाकर
निराशाओं को पाने का
पाई ख़ुशियों की
कमियाँ गिनाने का
वरदान पाने का
शाप भोगने का

अंत में है
केवल पश्चाताप!!

तालाब के ठूंठ

दिल लगा कर जाना है
अकेले ही आख़िर जीना है
अकेले आना है
अकेले जाना है
मेले है सब राह के
न सुख के
न दुःख के
न हास के न परिहास के
तालाब के हैं सब ठूँठ
झीनी लहर पर सरकते
पास आते और घिसटकर जाते
उफ़ान नहीं तालाब में
पानी भरे लबालब
तो स्थिर रह कर गुज़र जाने देते
ऊपर ही ऊपर
डूबते-उतराते
न मिलने की आस
न बिछुड़ने का दुःख
आदमी हैं यहाँ सब
तालाब के ठूँठ

रामकहानी

इसकी, उसकी, तेरी, मेरी
सबकी एक-सी राम कहानी
आओ कुछ नया करें
ख़ुद अपने निर्णय लें
और ख़ुद अपनी राहें ढूँढें

हीरों को कराएँ छुटपन से
राह की पहचान
नैनों को दे सामनेवाले को
चीर कर आर-पार देखने की ताक़त
दो गिलास दूध मुन्ने को
तो दो गिलास दूध मुन्नी को भी
नया बस्ता राजू को
तो नया बस्ता रानी को भी
नयी रहे टटोलने की आज़ादी
दोनों को दें
दोनों की आँखों के सपनों को
रंग दें

लेकिन यह सब करने से पहले
समय पर शाम का खाना बना दें
संघर्ष की शुरुआत वर्ना यहीं से होगी
नई यह कहानी भी फिर
शाम के खाने पर कुर्बान हो जाएगी!

कौतुहल 

माँ ने बक्से में रखा था
वह बाहर झाँकता भी
तो माँ फुत्कारती
तब पलटी मार कर वह
मिची आँखों से रेंगते
अपने सहोदरों पर गिर पड़ता
यह लेकिन ज़्यादा समय
तक नहीं चल सका
एक दिन उसकी छलांग
माँ के पीछे उसे
बक्से से बाहर ले आई
डर कर वह
ख़ुद फुफकारा
शरीर उसका अकड़कर
धनुष-सा हो गया
कन्धों के दोनों छोर आपस में मिल गए

लेकिन धीरे धीरे उसे पता चला
अपनी बौख़लाहट के अलावा
यहाँ सब कुछ सामान्य है
तो धीरे-धीरे
उसकी गोटी जैसी गोल आँखों में
कौतूहल जगा
शरीर की कमान ढीली पड़ी
कीलों की तरह खड़े हुए बाल
शरीर से फिर चिपक गए
उभरी पूँछ नीचे आई
उसकी मोटाई भी कम हुई
आस-पास उसने जो देखा
उससे उसका दिल भर आया
पेट ज़मीन से टिका कर
वह धीमे से पसर गया
हलकी खड़क की भी उसके कान टोह लेते
और आँखें
लप-लप कर हर दृश्य को
दिल पर उकेर लेती

लटपट करते चारों पैरों से
ज़मीन पर ज़ोर देकर
वह उठा
लटपट करती चाल से
दस क़दम आगे बढ़ा
फिर अचानक डर के मारे
नन्ही-नन्ही कुदानें मारता
फिर बक्से की ओर लपका आया
अनजाना डर
अनजान स्थितियों से डर
बक्से से चिपक कर घिसटते हुए
उसने चारों पैर फैलाए
और फिर तन कर खड़े होकर टोह ली
कहाँ क्या है? कुछ भी तो नहीं!
पीछे वाले पैर मोड़ कर
पूँछ को व्यवस्थित लपेट कर
वह बैठ गया
विचार-मग्न सा
निर्णय नहीं हो पा रहा था
उत्तेजना के कारण अब उससे
झपकी आई
बैठे बैठे वह झूलने लगा
तभी ….
तभी अचानक
गर्दन से पकड़कर उसे किसी ने उठाया
हलकी गुर्राहट….
हवा में उछला
फिर वह बक्से में था
झिडकी और ममता भरी
गुर्राहट से कान गूँज रहे थे
लार से भरी जीभ के दुलार ने
उसे भिगा दिया था

जायज-नाजायज

अपना है तो
जायज़ है
कभी स्वाभिमान है,
कभी
अस्मिता है
कभी और कुछ
सकारात्मक
जिसका पोषण करना
ज़रूरी है
किसी और का हो
तो
ग़ैरज़रूरी है,
नाजायज़ है
बेमतलब है
अकारण है
इसलिए
येन-केन-प्रकारेण
अपनी इज़्ज़त गिरवी रखकर ही सही
उसे कुचलना चाहिए
कहीं उसका अहंकार
अपने अहंकार के आगे
भारी पड़ा तो?
दिखावटी टुच्ची लड़ाई
सच ने जीत ली तो?
नाक कट जाएगी,
स्वाभिमान मिट जाएगा
इसलिए
नाजायज़ अहंकार को कुचलने के लिए
जायज़ अहंकार को बिछ जाना होगा
बेआबरू का सैलाब बह जाने देना होगा

हो सके तो
उसी सैलाब में
उसके अहंकार को
कुचलना होगा
दफ़नाना होग

स्त्री है मोहताज

अपने आप में संपूर्ण बीज
बीज में कोंपल
अनंत संभावनाएँ
बेल या वृक्ष
फूल, फल यानी
अनंत संतृप्ति
लेकिन बीज है मोहताज

बीज है मोहताज
मिटटी का
पानी का
हवा का
धूप का
सब मिले तो
संभावनाओं का सफ़र
संतृप्ति तक पहुँच कर
सार्थक होता है
वर्ना
बीज नष्ट भी होता है
चूहे खा जाते हैं
सीलन सड़ाती है
उगी हुई कोंपलें
मिटटी की चद्दर पर पड़े भारी पैरों तले
रौंद जाती हैं
धरती पर उगी कोंपलों को
सूरज झुलसा देता है
पानी गला देता है
हवा हमेशा के लिए सुला देती है

और संतृप्ति का एक सफ़र
शुरू होने से पहले ही
समाप्त हो जाता है।
इसी तरह
मोहताज है ज़िंदगी तेरी
प्रेम की, अपनत्व की
गर्भ में प्रत्यारोपण के के पूर्व से
मृत्यु की देहलीज तक
हर क्षण तेरे जीवन का
संतृप्ति पा सकता है अगर
उसे प्रेम और अपनत्व मिले
पर क्या यह सच है?
हर एक की ज़िंदगी
इत्तेभर की मोहताज नहीं होती
औरत जात की तो हरगिज नहीं!!!
रौंदे जाने की दहशत का
उसे हर पल सामना करना पड़ता है
गर्भ में प्रवेश के क्षण से लेकर
अर्थी पर चढ़ने तक

उसका पूरा अस्तित्व ही मोहताजी है
हर चीज़ का मोहताजी
बोलने की छूट का
सोच की आज़ादी का
हँसने के सुख का
रोने के हल्केपन का
खुले गले से तान लेने का
दबी जुबान में गुस्सा करने का
पैदा होते ही लादा जाता है बोझ
घराने की इज़्ज़त का
बाप की अपेक्षाओं का
भाई की उम्मीदों का
पुत्र की और पति की अपेक्षाओं का
ज़िम्मा दिया जाता है
रिश्तों को निभाने का
ज़माने की रीत को निभाने का
वह मोहताज है
समाज में रहते हुए समाज से बचने को
नज़र न उठाते हुए नज़रों से बचने को
बुरा न बोलते हुए बुराई से बचने को
नियम, क़ायदे, कानून सब
उसके ही बलबूते पलते हैं
मुन्नी हो या मुन्नी की नानी हो
सब होती हैं जवाबदेह
मुन्ने को और मुन्ने के नाना को
कब जाती है
कहाँ जाती है
क्यों जाती है
कब आती है
क्या करती है
क्यों करती है
किससे पूछ कर करती है
क्या खाती है
क्या पीती है
कितना खाती है
कितना पीती है?
कितना कमाती है?
कितना ओढ़ती है?
कितना छोड़ती है?
नौकरी से दहेज़ से
सुकुमार देह से या झुर्रियों के जाले से
कितना कमाती है?
कमाई होनी चाहिए लेकिन
ख़र्चा बिलकुल नहीं
औरत को बस
दो जून रोटी मिले
दो जोड़ी कपडा मिले
पैर में जूती और
सर पर छत मिले
और क्या चाहिए?
और इन सब चीज़ों के लिए भी
वह मोहताज तो है ही
बिना कमाई के भी और अपनी कमाई के साथ भी
आज़ाद भारत की विदुषी नारी हो
या ठेठ गाँव की गोरी हो
आधे हाथ का घूँघट काढ़े हो या
अधनंगी देह लिए घूमती हो
नियति सबकी एक है
ज़िन्दगी स्त्री की मोहताज है
पुरुष की मर्ज़ी की
घर टिके हैं
मोहताजी की उनकी स्वीकृति पर
सिसकती आत्मा से
पंक्ति में आख़िरी स्थान देने पर
झुक-झुक कर जी हज़ूरी करने पर
स्त्री दुर्गा है, स्त्री काली है
स्त्री सीता है, स्त्री मंदोदरी है
झाँसी की रानी भी है
कृष्ण की दीवानी भी है
इंदिरा गाँधी भी है और उसकी बहू भी है
इन गिनी-चुनी मिसालों को छोड़ दें तो
आज भी
जीवन भारतीय नारी का
मोहताज है

लेकिन

एक दिन वह अपना
लिहाज़ का चोला उतार कर
अस्मिता का खडग उठा लेगी
आत्मविश्वास के अश्व पर सवार होकर
सब कुछ अपने मुआफ़िक बनाने निकलेगी तो
सारे मील के पत्थर
हरहराकर गिर जाएँगे
मोहताज नहीं रहेगी उसकी भी ज़िंदगी
वह दिन भी आएगा!

असमय मुरझाई कली

तुम कहाँ
वह कहाँ

कान्य-कुब्ज ब्राह्मण कुल की
तुम एक नाजुक खिलती कली हो
वह मरहट्टा, किसान का बेटा
हल ढोता
गाय- भैंस चराता
गोबर उठाता
कुत्ते के पिल्लों संग
उछलता कूदता
बछड़े के संग गाय का दूध पीता
ठण्ड के दिनों में धूप में ले जाकर
भैंस के बदन की जुएँ चुनता
मध्य रात्रि को करुण स्वर में मिमियाती
बकरी का प्रसव कराता
रात ही में गड्ढा खोद कर
मरे मेमने को गाड देता
बैल की लाश पर धाड़ें मार मार कर रोता
भजन गाते हुए
पियक्कड़ों की तरह झूमता
ठठाकर हंसता तो
तो बच्चे सहम जाते

कहाँ तुम
कहाँ वह

न पहनने-ओढ़ने का शऊर
न खाने पीने का शऊर
खानदानी तो है लेकिन
जमीन के छोटे टुकडे के
और दो-चार ढोरों के अलावा
उसके हिस्से
दो बेवा बुवाएं
दादी-दादा
और एक
तलाकशुदा बहन भी है
मां-बाप के साथ उसे
इन सबकी खातिर में
उम्र गुजारनी है
प्यार करने का उसे कोई हक़ नहीं है
दो जून की रोटी का जुगाड़ भर कर ले
और
दिन-रात खटनेवाली
मेहरारू ढूंढ ले
इतना उसके लिए काफ़ी है
क्या है वह तुम्हारे आगे……

पलकों पर पली
माँ-बाप की लाडली
दुनियादारी समझ न सकी
माँ-बाप प्यारे थे लेकिन
उनकी दी सीख निगल न सकी
गुलाब की पंखुड़ियों सी उसकी
जिस नाजुक त्वचा पर
माँ-बाप को नाज था
आक्रोश में उसने वही जला डाली
कुछ इस कदर
कि पलकें उसकी दोनों जुड़ गयीं, और
जिसके लिए उसने यह लड़ाई छेडी थी
उसे देखने को भी
उसकी नजर तरस गयी

उच्च कुल में पैदा हुई उसकी
नंगी, कटी-फटी, और फिर से सिली
देह को
किस निम्न जाती के मेहतर ने
पुआल भरे ठेले पर लादा
यह पूछने क़ी
माँ-बाप क़ी हिम्मत नहीं हुई

अर्थी के साथ चले उसके
बाप और भाई को
पगलाए मरहट्टा ने जब
रोक कर पूछा –
‘इससे भला क्या एक ब्राह्मणी का
‘मरहट्टा’ से ब्याह भला न होता?’
सहसा वे कुछ बोल ना सके
उसके आंसुओं
और अपनी हताशा ने
उनके अहसासों के साथ
उनके अहंकार को भी
तार तार कर दिया था.

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