तुषार धवल

तुषार धवल की रचनाएँ

छूटती चीज़ों के बीच

छोड़ दिया तुमने भी

जैसे कि

सब चीज़ें छूट रही हैं

नहीं थी पहले भी

अब तो और भी नहीं है

इस लौटती धार में

रेत के कुछ ढूह

ढह कर भी ठहर गए हैं

पैरों के बीच फँसा

एक घोंघा

घास का एक तिनका

और

उन सबको टटोलता मन

अब भी वहीं कहीं भटक रहा है

बाज़ार की थिरकती रोशनी के

बीच

एक पता पूछता

छोड़ दिया तुमने

और

अब समझने लगा हूँ

अन्त भी भ्रम ही है

एक आख़िरी अंगड़ाई का इन्तज़ार

जो फिर नहीं आती

और अब नही आएगा वो सब

जो तुमसे उगा था

सोचता हूँ

ई-मेल के खोखले शब्दों मे कौन सा रस भरूँ

किस लिबास मे पेश करूँ

वह सब

जो अब नहीं है —

जो था ही नहीं

और जिसके पीछे का

एक खुला आकाश और भी सुन्दर हो चला है

देर दोपहर तक

थकी उबासी के बीच

कई बार दरवाज़े पर

वही परछाईं मुस्कुराती दीखी

वही आँखें बोलती रहीं

मैं देखता रहा

सुनता रहा समय के शब्द

जब

तुम नहीं हो

तुम्हें हर कहीं सुन सकता हूँ

उस खुलते आकाश में

देखता हूँ

तुम पतंग सी दीखती हो

चटकीले पीले रंग की

और पीछे

हल्का नीला आकाश

खिलखिला रहा है।

आदमी क्या कहता है

कई आवाज़ों का कानफाड़ू कट्टर कोलाहल उसकी कॉलर पकड़ कर घसीटता हुआ अपनी तरफ खींचता उसके कान उसका गला दबा कर जब तक कि उसकी जीभ बाहर ना लटक जाए उसकी आँखें फट ना जाएँ वह नीला ना पड़ जाए इस स्याह हवा के मौसम में जिसमें वह उबल रहा है
उसकी त्वचा उबाल कर छीली जा रही है उसकी हवा में एसिड है उसकी साँस में अम्ल की चाह
बुरादे भरे जा रहे हैं उसमें अपनी अपनी आवाज़ों के

वह अब एक थकी हुई बोरी है जिसमें शोर भर गया है जो उसकी आवाज़ पी चुका है

कट्टर आवाज़ों का कोलाहल घुमड़ता हुआ फाड़ता हुआ उसकी जड़ों को
कोलाहल नकारता हुआ उसकी आवाज़ों को …. कोलाहल कोला-हल कोला का हल…
आओ आओ आओ ले लो ले लो ले लो सुनो सुनो सुनो वर्ना…अबे सुन साले!
उफ ! घुटन! बेचैनी! उफ! आवाज़ें…. !!
बंद कर दो खिड़कियों को गिरा दो सारे पर्दे कर दो मेरे घर में अन्धेरा
छोड़ दो, रहम करो, माफ़ करो भाई ! जीने दो प्लीज़ मुझे भी !!
अरे अर्रर…अर्रे! ज़रा ध्यान से, ओ भाईसाहब ! प्लीज़…!
मैं जीना चाहता हूँ रहम करो मुझ पर मेरे कान में यह क्या गड़ता रहता है
कुछ गलता है हृदय में कुछ जमता रहता है मेरे भीतर अरे भई ! ऑह्हो ! प्लीज़ यार !
चुप भी करो अब और मत उतरो मेरे कानों में मेरी नाक मत दबाओ साँस लेने दो मुझे बंद करो ना यह सब भई प्लीज़…. प्लीज़ … खदकते एसिड से उठता सा शोर… शोर का रोर

शोर्र का रोर्र… रोर रोर्र् रोर् र्रर्रर्र … समय की घिसन पट्टी पर घिर्र घिर्रर्र घिर्रर्रर्र ….र्र र्र र्र…
आओ आओ आओ ले लो ले लो ले लो सुनो सुनो सुनो वर्ना…अबे सुन साले!

धर्म कट्टर अधर्म कट्टर आस्तिक नास्तिक मार्क्स कट्टर गाँधी कट्टर बाज़ार प्रचार नीति कट्टर सक्सेस सेंसेक्स उदार कट्टर सब कट्टर
कटर कटर कतरते दिन कट्टर
कट कट कट कट कट्ट कट्ट कट्ट कट्टर ट्टर टर टर टर्र टर्र उफ्फ ! बंद करो छोड़ दो मुझे
कटकटाते हैं जबड़े घिस जाते हैं कट् कट्ट कट् कट्ट
सफलता का संघर्ष कट्टर वाद अपवाद विवाद कट्टर
कहीं जगह नहीं थोड़ी भी साँस की
आवाज़ें आवाज़ें आवाज़ें कोलाहल कोला-हल कोला का हल हल्ल… हल टूटा हुआ पुल टूटा हुआ साँस की नली पर फेफड़े जाम कफ़ है बलगम बेलगाम है उफ़्फ़ ! पाग़ल ज़ंजीरें आवाज़ें आवाज़ें आवाज़ें सुनो सुनो सुनो ले लो ले लो ले लो इधर आओ मुझे देखो मुझे मानो वर्ना… अबे सुन साले !… जाता कहाँ है मादरचोद !…

इस बीच एक ब्रेक

हाँफता है
चुप है आँखें नीची नाक बंद कान के पर्दे उजड़े हुए
यह हर एक पल की थर्ड डिग्री है

धक धक्क धक धक्क … अभी ज़िन्दा है
चलो कोई बात नहीं अभी और सुनेगा उसे सुनना ही पड़ेगा जाएगा कहाँ
बॉस बीवी बच्चे परिवार पड़ोसी प्यार टी०वी० ख़बरें विज्ञापन माँगें उचित अनुचित नगाड़े… नगाड़ों की चमड़ी-सा थरथराता है जीवन ख़बरें विज्ञापन शोर-शोर-शोर पुकार चीख़ चीख़ चीख़ तीख़ी होती हुई उतरती कानों में बेरोक उमड़ती बवण्डर-सी तड़कती बिजली-सी ध्वंस ध्वंस ध्वंस के करीब कुछ गरम तेल-सा उतरता है कान में पर्दे जिसके उजड़ चुके है चीख़ चीख़ चीख़ ट्रैफ़िक धुआँ विस्फोट यंत्रणा शोर शोर शोर सिर पर चढ़ कर सिर पर उतर कर सिर में घुस कर नाचता है कनपट्टी पर तमाचे जड़ता थाप ढोल की उसकी चमड़ी पर उफ्फ !!
बस करो भाई ! कह्हाँ घुसे आ रहे हो ? अब रहने दो ना !

साँस लेने दो
थोड़ा रुको …

सन्नाटा चिल्लाता हुआ
बहरा समय

वह ख़ुद क्या है बस यही तय नहीं हो पाता
हे ईश्वर ! कुछ करो

घण्टे मंदिर के
लाउड्स्पीकर पताकाओं के बीच बेसुरी आवाज़ों में मंत्रोच्चार आरती गान
आदिम शिलाष्म-से उसी गूँज में अब तक वहीं
और वही आवाज़ें
अज़ान
अज़ान ऊँची तल्ख़ मीनारों सी आगाह करती अल्लाह से नाफ़रमानी से इस्लाम पर ख़तरों से
जीसस क्राईस्ट !
तुम सब भटके हुए हो यहाँ आओ चैपल में यही एक मात्र महान ईश्वर है हम कोशिश करेंगे उन छोटे ईश्वरों से बचा कर तुम्हें सुधारने की हमारी बात मान लो…
हमारा प्रॉडक्ट ख़रीद लो एक पर एक मुफ़्त… ऑफ़र सीमित जल्दी करो !
बेचो ख़रीदो मारे जाओ…. हमें मुनाफ़ा दो

जिहाद धर्मयुद्ध धर्मांतरण धर्म का मुनाफ़ा सत्ता से सम्भोग आदि ब्रह्मचर्य में

सुनो सुनो सुनो ईश्वर यहीं इसी धर्म में मिलेगा बाकी सब झूठे हैं तुम मुग़ालते में हो
आओ यहाँ हमारे पास तुम शैव हो ? शाक्त हो ? वैष्णव हो ? यह भ्रम है आओ मुस्कुराओ
बाबा जी की शरण में सुख है ज़न्नतें मयस्सर हैं इस नूर में नेस्तनाबूद कर दो काफ़िरों को आओ ईशू तुमसे प्यार करता है पवित्र जल से स्नान करो होली वॉटर माई चाइल्ड ! बैप्टाइज़ करेंगे तुम्हें
बाक़ी सब झूठे सिर्फ़ इसी इमारत में बैठा ईश्वर सच्चा है उसे ज़िन्दा रखना है तो बाक़ियों को ख़त्म करना होगा … यह हत्या ज़रूरी है याद है कृष्ण का उपदेश? उत्तिष्ठ भारत ! मनु पुत्रो आओ ! हमें वोट दो ! भगवा भगवान है और वही तुम हो. उठाओ बारूद और बन्दूकें मिटा दो अधर्मियों को यही पुरुषार्थ है अल्लाह ओ अकबर ! हर हर महादेव ! चीख़ें चीख़ें हिंसा हत्या बलात्कार आग आग ख़ून ख़ून आवाज़ें आवाज़ें आवाज़ें शोर शोर शोर का रोर रोर्र रोर्रर्र र्रर्र…र्रर्रर्र
अब शहर में कर्फ़्यू है ! फ़्लैग मार्च है ! अनाउंस्मेंट है पुलिस की !
इस बीच विज्ञापन जारी है बे-ब्रेक
रिपोर्टिंग है निंदा है आश्वासन है जाँच आयोग है सनसनी है और इन सबके बीच कॉमर्शियल ब्रेक… सबकी अपनी अपनी आवाज़ें हैं अपने अपने एजेंडे अपने अपने तुरुप के पत्ते और सबका शोर है कानफाड़ू शोर नगाड़ों का वहशी शोर कान में भर रहा है
तनाव है मन खिंचता जा रहा है, तनता जा रहा है अब तड़क उठेगा अब फट जाएगा
उफ़्फ़! कोई रोको
एक होड़ है हासिल की ज़रूरत से ज़्यादा की और सब सब को गिरा कर बढ़ रहे हैं
होड़ है — संघर्ष असहिष्णु और तभी कट्टर
धर्म की बाज़ार की दर्शन की उदारता की कट्टरता और सब के कट्टर झण्डे !

एड़ियों तले धड़कनें रौंदता कोई किसी कुर्सी तक बढ़ रहा है
यह शोर है तुमुल है रण का
दुख है निराशा है अशांति है रण-भूमि में
असंतुष्ट है यह सभ्यता जिस नदी पर बसी उसी को पी गई उसे ही मार डाला
गंगा की अस्थियों की डी०एन०ए० जाँच की ख़बर का भी शोर है
बख़्श दो मेरी जान !
मैं हिंदू ना मुसलमान
एक अदना सा इन्सा
मेरी एक ज़िन्दगी है, जीना चाहता हूँ आप से कुछ नहीं माँगता
छोटा आदमी हूँ बीवी बच्चे हैं … साहब ! माई-बाप रहम करो
मुझे छोड़ दो … प्लीज़
यह कट्टरता छोड़ दो सुख मिलेगा रुको ठहरो थोड़ा प्लीज़

तूफ़ान थोड़ा रुका है …
फिर गड़गड़ाहट हो रही है और हर दिशा से शोर उठने लगा है …
कनफ़्यूज़न है संशय है इस वक़्त कहीं कोई रेल तो नहीं गुज़र रही कहीं उसकी पटरी पर कुछ रखा हुआ तो नहीं है उसमें कितने लोग सवार हैं कहीं आग तो नहीं लग गई
अरे देखो तो टी० वी० पर क्या ख़बर है … सब ठीक तो है
फिर कोई सिर-फिरा कुछ कर ना बैठा हो बाज़ार में बेटी अब तक स्कूल से लौटी नहीं है
आवाज़ आवाज़ें आवाज़ों का सैलाब चीख़ चीख़ें चीख़ों का सैलाब अज़ाब शोर का उमड़ने लगता है उठता गिरता पटकता सटकता देह की अन्धेरी खोहों में खींचता हर सानाटे में अपनी तरफ़
सुनो सुनो सुनो ले लो ले लो ले लो आओ आओ आओ सुनो सुन…. अबे सुन स्साले ! जाता कहाँ है सुन मादरचोद ! मेरी बात सुन और मान ले चुपचाप जैसा कहता हूँ कर, मेरा धरम कबूल ले, मैं जो बेचूँ ख़रीद ले, मैं जिसे कहूँ उसे वोट डाल जैसा कहूँ वैसा जी तभी ज़िन्दा रह सकेगा. चल ज्वॉएन कर ले हमें और पीछे पीछे चल… दुनियाँ बदलने वाली है
ले यह कैप्सूल खा
यह टी० वी० पहन
टेक्नॉलोजी घुसा ले
इन गद्दों पर हग टॉयलेट में नहा चूतिए और सुनता रह वर्ना… तेरी माँ की…

वॉल्यूम कम करो ना प्लीज़

एक अंधा बहरा वाचाल समय
अंसतुष्ट अराजक अधीर
उन्मादी समय
एक समय जिसे सब कुछ चाहिए और इसीलिए असंतुष्ट अधीर अराजक है
उसके स्वर का उन्माद है हर तरफ़
धर्म-ग्रंथों से निकलता विश्व की सीमाओं को लाँघता लोभ का उन्माद इक्षाओं का उन्माद
और बेचैन बे-बर्दाश्त हर अन्य उसके लिए
मार्क्स गाँधी फ्रॉएड वेबर फुकुयामा चॉम्स्की
फिलिस्तीन साइप्रस तालिबान रूस बेरूत अज़रबाइजान
अण्णा अयोध्या अहमदाबाद
आवाज़ें आंदोलन अत्याचार
बम बिगुल बलात्कार
ब्रह्म रंध्रों में भ्रमर गुँजार नहीं बस कोलाहल गूँजता है अलग-अलग आवाज़ों का
अलग-अलग चीख़ों का
यह हवस की होड़ का हंगामा है
इक्षाओं और विचारों का अतिरंजित आवेश
हुस्न के हिजाब में छुपी हरामज़ादी हिंसाओं का हुनर बख़ूबी परोसता हुआ
यह शोर प्रचार का यह शोर विद्रोह का यह शोर अपने होने की माँग का
यह शोर बेदर्द मुनाफ़ों का
एक दौड़ है लूट है और यही हिंसा है

आदमी माँगता है ठौर ठहराव थोड़ा भोजन थोड़ी भूख थोड़े सपने
अपने उगने की ज़मीन थोड़ा स्पेस
अवकाश
यह शोर कौन उठाता है कौन मानव है क्या और क्यों चाहता है उसके छल और लोभ और कामनाओं का कैसा इंद्रजाल है जिससे सड़ी हुई लाशों की बू आती है पसीनों से निचोड़े नमक की ब्रैण्डिंग पर युद्ध नज़र आता है उसमें मरी नदियों का एकल विलाप उठता है पानी पर वर्चस्व के नए ब्लू-प्रिंट में ख़ून का समन्दर खिंचा नज़र आता है उसके नक़्शे पर
बेवा बदहाल बदनसीबों
की धरती यह जो हुई जा रही है धुएँ में खाँसती यह किसका गेम प्लान है वह कहाँ
छुपा छद्म छल
से घात लगाए बैठा है?

यार वॉल्यूम कम करो ना प्लीज़
मैं सोना चाहता हूँ थोड़ी देर सब भूलना चाहता हूँ
थोड़ा प्यार कर दो हाल पूछ लो
और हाँ यह शोर अब बंद कर दो
ओ भाई साहब !
ख़ुद ही देख लो चैन से जीने में बड़ा मज़ा आता है
थोड़ा संतोष ज़िद थोड़ी कम अपने अलावा भी थोड़ी जगह औरों के लिए
मज़ा इसी में आता है… भाईसाहब ! बस इतना ही .

तनिमा

(मारी गई और जीते-जी मरती हुई बेटियों के नाम )

तुम्हारी नन्हीं हथेलियों में
मैं कब अपना सारा संसार रख देता हूँ
मुझे पता भी नहीं चलता

तुम्हें गोद में उठाते हुए मेरा सर्वस्व तुम्हारी गोद में होता है बिटिया !
सब कुछ अपना तुम में धर कर तुम्हीं में उड़ता हूँ मुक्त फिर जन्म लेता हूँ तुम्हारी हर पुकार पर

तुम यहाँ नहीं हो
अभी इस संसार में देह लिए लेकिन
मौजूद हो तुम अपनी माँ और मेरे योग के संयोग के उस क्षण में
जिसका अवतरण नहीं हुआ है
लेकिन तुम्हारी कमी जैसा कुछ नहीं लगता मुझे
तुम्हारी किलकारी ! ओह्होय !! देखो-देखो किस तरह पैरों के अँगूठों पर चल रही है !
ताय-ताय, ताय-ताय ! एक पाजेब चाँदी की नन्हीं-सी क़दमतालियों में रख दो
झुन झुन झन झुन
अरे अर्रर्रे ! देखो गिरेगी ! देखो देखो उसको
ओह्हो ! शू शू ! इसकी डायपर बदल दो, कुछ खिला दो दूध पिला दो सो जाएगी

ऊँहूँह ! श्शश ! धीरे से ! जग जाएगी तो रोएगी. उसे मत रुलाओ कोई ! आओ ओ बिटिया मेरी पाखी मेरे कन्धों पर सर रख दो देखो सपने सुन्दर सुनहरे. तुम्हारी नन्हीं हथेलियों पर लकीरें हैं तुम्हारे समय की जाने क्या क्या आएगा तुम्हारे हाथ क्या छूट जाएगा … बलाएँ छूटें तुम्हारी सुख आए हाथ ! सो जा… ऊँssमुच्च्च ! आ री सोनचिरैया…

सूरज चंदा और सितारे
तेरे आँगन खेलें सारे
तेरे संसारों में हरदम
जीयें सुख सम सखा तुम्हारे

देखो सो रही है ! चुप श्शश…
उसकी गुलाबी फ्रॉक पर दूध के दाग ! दो दाँतों ने झाँकना शुरू किया है जस्ट अभी
गुलाब के बदन पर दो तारों की झिलमिल अँगड़ाई
पकी माटी के दीये में चम्पा की दो पंखुड़ी !
बचा रह जाए यह सब वाष्प बनकर उड़ रहे समय के बाद भी रह सको सुरक्षित तुम हमेशा पर
जानता हूँ बिटिया ! तुम सुरक्षित नहीं हो कहीं भी — गर्भ से चिता तक
लेकिन फिर भी आओ इस क्रूर समय संसार में
इसी क्रूर समय संसार में फिर फिर आओ उन्हीं हाथों में जो तुम्हें घोंट देते हैं ! आती रहो आती रहो हर बार जब तक कि हिंसा प्रेम ना सीख जाए उन खूनी सख़्त हाथों में एक कोमल कम्पन भर दो बिटिया ! आओ कि बहुत बीमार है धरती और तुम्हारी राह तकती है हर हत्या में हर गर्भपात हर अपहरण में
वही चीख़
फाड़ती है उसका आकाश और उसका कलेजा
उसके सूखे बाल भूरे बादलों के जंग खाए पंखों से कबाड़ की ढेर की तरह बिखरे हैं
उजड़े हुए हैं ख़ुशी के रास्ते मातम है पृथ्वी पर जिसे कोई नहीं समझता लेकिन मैं कहता हूँ आओ बिटिया !

मेरी गोद में भी आओ मेरी तनिमा !
यही है तुम्हारा नाम
मेरी बेटी !
अणिमा की दुलारी फुलकारी हमारी कल्पना की
तनिमा, कृशांगी सुन्दर, कवियित्री !
तनिमा, युग्म हमारे नामों का
तनिमा, यानि तुम
तनिमा, यानि हम
तनिमा है और यह सब जानते हैं
सिर्फ़ मैं ही नहीं जानता कहाँ हो तुम इस वक़्त
हमारी साँस हमारी धड़कन कब वह क्षण उगाएगी जिसमें तुम हो अभी अवस्थित

आओ और हर घर में हो जाओ हर घर की अपनी तनिमा हर घर की बेटी होना मौत को मुँह चिढ़ाने-सा होता है ख़तरनाक ज़िम्मेदारियों के झोंटों में उलझी पतंग-सा ख़तरनाक होता है बेटी बन कर आना

ख़तरनाक होता है जन्म यहाँ फिर भी आओ तनिमा आओ हर बार ऐसी ही बार बार आओ
आओ फ़तवों की लपलपाती जीभ पर चल कर

फिलिस्तीन साइप्रस के खून में जन्मो तालिबानी बन्दूकों में अपनी टिहुँक भर दो बारूदों में विस्फोटों में हर जगह उतरो चलो इन्हीं नरमुण्डों पर इन उलटते पहाड़ों पर फटते बादलों पर उतरो प्रलय के हाहाकार में मृत्यु की घोर पातकी करतूतों में उतरो बाज़ारों के लोभी छल में उस मोहजाल में उतरो मेरी बेटी वहाँ प्यार भर दो शान्ति भर दो यहाँ वहाँ हर जगह यहीं वहीं होना है तुम्हें इस वक़्त और यह तुम्हीं कर सकती हो क्योंकि तुम स्त्री हो और मेरे कलेजे से निकली हुई एक कोमल कल्पना हो एक विकल्प हो इन लाचार जिजीविषाओं का

आओ फिर फिर आओ मृत होने को कूड़े के ढेरों में फेंके जाने को चिताओं या रसोइयों में झोंके जाने को ठगी जाने को लेकिन आओ और यहीं आओ कि अभी यही है हमारे पास हम कितना भी चाहें, ख़ुश हो लें, लेकिन हाथ खोलेंगे तो यही निकलेगा और इसे ही स्वीकारो इसे ही बदलो और इसीलिए आओ ! आओ ऋचाओं के पुनर्पाठ में मार्क्स और मनु के अन्तर्सम्वाद में स्त्रीवादी विमर्शों के ढकोसले प्रलापों में आओ एक सम्पूर्ण खुरदुरी स्त्री तनिमा !

तुम्हारे जन्म में जन्म लेगी एक माँ जन्मेगा एक पिता जन्म लेगा एक संसार
कितना कुछ जनोगी बिटिया तुम जन्मते ही !
तुम जीवन का उत्सव हो सृजन का संसृति का इसीलिए आओ
डाली पर बैठे कालिदासों के घर आओ
आओ और हिंसक नरों के इस बौराए झुण्ड को प्यार से सहला दो
स्पर्श करके जगा दो उन्हें अपनी माटी में पूरा का पूरा
आओ कि इसी वक़्त विश्व को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है एक माँ की
तुम बेटी हो और तभी तुम पर यह भरोसा करता हूँ बिटिया ! आओ !

तुम अभी नहीं हो और
हर बेटी में
तुम्हारा इन्तज़ार है।

 

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